nayaindia Mulayam Singh best Defense Minister बेहतरीन रक्षा मंत्री के रूप में याद रहेंगे मुलायम सिंह
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बेहतरीन रक्षा मंत्री के रूप में याद रहेंगे मुलायम सिंह

1996 से 1998 के बीच देश के रक्षा मंत्री के तौर पर उन्होंने जो काम किया उसने उनको देश का बेहतरीन रक्षा मंत्री बनाया। इस दौरान देश की सशस्त्र सेनाओं के तमाम लंबित मुद्दों का समाधान हुआ, फौजियों की तमाम दिक्कतों का हल निकाला गया और सेना को मजबूत बनाने के लिए सुखोई से लेकर तमाम साजो सामान देश में आए। उनके जैसा सक्रिय रक्षा मंत्री उसके पहले शरद पवार को ही माना गया, जिनकी रक्षा मंत्री के तौर पर पारी बहुत छोटी रही।

अरविंद कुमार सिंह

उत्तर प्रदेश में 1967 में विधानसभा चुनाव जीत कर मुलायम सिंह यादव ने संसदीय राजनीति में कदम रखा और तबसे लगातार प्रांत की राजनीति में छाये रहे। तीन बार मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश विधानसभा और विधान परिषद में नेता विपक्ष और एक चर्चित सहकारिता मंत्री के तौर पर उन्होंने काफी छाप छोड़ी। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनकी पारी भी बहुत शानदार रही। उन्होंने संसद में तमाम भूमिकाओं में काम किया और संसदीय समितियों में भी काफी सक्रिय रहे लेकिन 1996 से 1998 के बीच देश के रक्षा मंत्री के तौर पर उन्होंने जो काम किया उसने उनको देश का बेहतरीन रक्षा मंत्री बनाया। इस दौरान देश की सशस्त्र सेनाओं के तमाम लंबित मुद्दों का समाधान हुआ, फौजियों की तमाम दिक्कतों का हल निकाला गया और सेना को मजबूत बनाने के लिए सुखोई से लेकर तमाम साजो सामान देश में आए। उनके जैसा सक्रिय रक्षा मंत्री उसके पहले शरद पवार को ही माना गया, जिनकी रक्षा मंत्री के तौर पर पारी बहुत छोटी रही।

मई 1996 में उत्तर प्रदेश की मैनपुरी संसदीय सीट से विजयी होकर मुलायम सिंह ने पहली बार केंद्रीय राजनीति में कदम रखा। एचडी देवगौड़ा सरकार में वे एक जून 1996 को रक्षा मंत्री बने। कुल मिला कर वे सात बार संसद में विजयी होकर पहुंचे। उनके भाई रामगोपाल यादव उनसे पहले और 1992 में ही राज्यसभा में पहुंच गए थे। लेकिन मुलायम सिंह यादव ने रक्षा मंत्री के दौरान काफी बेहतरीन काम किया और देश के तमाम दुर्गम और जटिल इलाकों में दौरा करके फौजियों का मनोबल बढ़ाया और उनकी दिक्कतों को भी दूर किया। रक्षा मंत्रालय जैसे अंग्रेजीदां विभाग में पहली बार हिंदी में कामकाज भी उनके आने के बाद होने लगा था। सारे अफसर अब अंग्रेजी से हिंदी में उतर आए थे। वे फौजियों से भी हमेशा हिंदी को प्रोत्साहन की बात करते थे। 26 जून 1997 को सेना की 3, कोर के जवानों के बीच उन्होंने कहा था कि सेना के लोग विभिन्न इलाकों के रहने वाले हैं। भाषाएं और धर्म अलग हैं लेकिन पूर्ण सामंजस्य और एकता के साथ रहते हैं। हमारी राष्ट्रीय एकता के ज्वलंत उदाहरण है। राष्ट्रभाषा हिंदी को देशव्यापी बनाने में सेना ने जो महान योगदान दिया है वह अद्वितीय है। वे मुलायम सिंह यादव ही थे जिनके रक्षा मंत्री काल में शहीद सैनिकों का शव सम्मान के साथ उनके घर पहुंचाने की व्यवस्था आरंभ हुई।

मुलायम सिंह यादव देश के पहले रक्षा मंत्री थे, जो सियाचिन ग्लेशियर पर गए और बंगाल की खाड़ी से लेकर कश्मीर और पूर्वोत्तर के उग्रवाद प्रभावित इलाको में भी। मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में पाकिस्तान ने सीजफायर का उल्लंघन नहीं किया। उनके कार्यकाल में भारतीय सेना ने चीन को भी चार किलोमीटर पीछे धकेल दिया था। वे खुल कर चीन को ललकारते रहे और उसके हिसाब से रक्षा तैयारियों को गति भी देते रहे। उनके ही रक्षा मंत्री काल में सुखोई विमान समझौते को जमीन पर उतारा गया जिस पर राव सरकार में हस्ताक्षर हो चुके थे लेकिन भाजपा काफी विरोध कर रही थी। विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी और अन्य नेताओं को भरोसे मे लेने के बाद वे रूस गए और उस दौर के सबसे ताकतवर लड़ाकू विमान को भारतीय वायुसेना में जुड़ने का मौका मिला।

मैने उनके रक्षा मंत्री रहने के दौरान उनके साथ बहुत से रणनीतिक इलाकों का दौरा किया। वे जहां भी जाते थे फौजियों से तो मिलते ही थे, सीमा पर सीमा सुरक्षा बल के जवानों को भी संबोधित करते और निजी तौर पर भी मिलते थे। वे यह बताना नहीं भूलते थे कि उनके परिवार में सेना में कोई अफसर तो नहीं लेकिन फौज में सिपाही रहे हैं। खुद उनके बड़े भाई रतन सिंह यादव 60 के दशक में फौज में नौकरी करते थे। वे सिपाहियों की दिक्कतों को जानते थे और तत्काल जहां तक संभव हो पाता था उसका समाधान निकाल देते थे। उनके कार्यकाल में देश भर के तमाम क्षेत्रीय अखबारों को सेना के कामकाज को करीब से देखने और उनकी चुनौतियों को समझने का मौका मिला। असम में उल्फा के आतंक से निपटने में भी उनकी अहम भूमिका थी। मैं उस दौरे में उनके साथ था जिसमें भूटान में उल्फा के कैंप चलते हुए उन्होंने देखे थे। बाद में विदेश मंत्रालय के संज्ञान में ला कर भूटान सरकार की मदद से उनको समाप्त किया गया।

केंद्रीय राजनीति में 1996 में आने के बाद मुलायम सिंह ने अपनी अहमियत लगातार बनाए रखी। कम लोग जानते हैं कि भारत रत्न सम्मान एपीजे अब्दुल कलाम को मुलायम सिंह यादव के कारण ही मिला था। वे मुलायम सिंह ही थे, जिन्होंने 2002 में भारत के 11वें राष्ट्रपति बनने के लिए अटलजी को कलाम का नाम सुझाया था। हालांकि तब वामदलों ने कैप्टन लक्ष्मी सहगल को उम्मीदवार बनाया था। वामदल मुलायम के इस कदम से नाराज थे।

1992 में उन्होंने चंद्रशेखरजी से मतभेदों के बाद समाजवादी पार्टी बनाई थी, जिसने पहली बार 1996 के चुनाव में 13 सीटें जीती। 1998 में 20,1999 में 26 और 2004 में रिकार्ड 35 सीटों तक सपा पहुंची, जिसने मुलायम की ताकत बढ़ायी। हालांकि 2009 में कल्याण सिंह के साथ हाथ मिलाने के बाद भी सपा 23 सीटें ही जीत सकी। 1997 में मुलायम सिंह का नाम प्रधानमंत्री की दौड़ में भी काफी आगे था। लेकिन बाजी इंद्रकुमार गुजराल ने मार ली।

वे कहीं भी किसी पद पर रहे हों लेकिन अपने गांव सैफई को कभी भूले नहीं। 1989-90 तक सैफई छोटा सा असुविधाजनक गांव था। यह 1993 में ब्लॉक और 1994 में तहसील बन गया। वे केंद्र मे रक्षा मंत्री बने तो वहां हवाई पट्टी भी बन गई। 1997 में तहसील भवन का उद्घाटन करने वे राज्यपाल रोमेश भंडारी के साथ अमिताभ बच्चन को भी लेकर पहुंचे थे। उनके नाते तमाम दिग्गजों के पांव वहां पड़े। वे केवल मैनपुरी तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि अपने आधार इलाकों कन्नौज, संभल और आजमगढ़ से भी विजयी होकर लोकसभा में पहुंचे।

दिल्ली हो या लखनऊ, मेलजोल में उनका कोई मुकाबला नहीं रहा। उनको संघ के नेताओं से भी मिलने में कोई समस्या नहीं थी। संघ प्रमुख केएस सुदर्शन के साथ 2005 में मुख्यमंत्री रहते वे मिले तो एक घंटा 20 मिनट लंबी मुलाकात रही। कहा गया कि गौ संवर्द्धन और स्वदेशी जैसे विषयों पर उनकी चर्चा हुई थी। वे चित्रकूट में नानाजी देशमुख से मिलने गए। पांचजन्य के पूर्व संपादक भानु प्रताप शुक्ल की श्रद्धांजलि सभा में उन्होंने मोहन भागवत, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल और साध्वी ऋतंभरा के साथ मंच साझा किया और यह उल्लेख किया कि भानुजी के साथ उनके किस कदर गहरे निजी संबंध थे। लेकिन हमारे विचार अलग थे।

हालांकि स्वास्थ्यगत कारणों से 2014 के बाद उनकी सक्रियता वैसी नहीं थी। 2014 में सपा लोकसभा चुनाव में महज पांच सांसद जिता पाई जी सपा की स्थापना के बाद सबसे कम संख्या थी। 16वीं लोक सभा के आखिरी सत्र में मुलायम सिंह ने सदन में मोदी के पक्ष में बोल कर सबको हतप्रभ कर दिया था। बाद में 2019 में जब सपा-बसपा गठबंधन हुआ तो संपा संरक्षक मुलायम सिंह सहज नहीं थे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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