nayaindia mulayam singh yadav funeral ‘नेताजी’ के ‘राजकीय सम्मान’ की घोर अव्यवस्था!
kishori-yojna
देश | उत्तर प्रदेश | गेस्ट कॉलम| नया इंडिया| mulayam singh yadav funeral ‘नेताजी’ के ‘राजकीय सम्मान’ की घोर अव्यवस्था!

‘नेताजी’ के ‘राजकीय सम्मान’ की घोर अव्यवस्था!

देश से अनेक बड़े नेता, मुख्यमंत्री, उद्योग और फ़िल्म जगत की हस्तियाँ और लाखों लोग ‘नेताजी’ को श्र्द्धांजली अर्पित करने सैफ़ई पहुँचे। पर भारी अव्यवस्था के कारण बेहद परेशान हुए। धक्कामुक्की के तमाम नेता शिकार हुए। अनेकों को चोटें भी लगी। मानना चाहिए कि इस अव्यवस्था के पीछे कोई वैर की भावना नहीं रही होगी। इसलिए योगीजी को पूरे मामले की जाँच करवानी चाहिए।

समाजवादी पार्टी के संस्थापक, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के स्वर्गवास पर सोशल मीडिया शोक संदेशों से भरा रहा। उनका अंतिम सरकार उनके गाँव सैफ़ई (इटावा) में योगी सरकार द्वारा पूर्ण राजकीय सम्मान से होना घोषित हुआ था। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन दिन का राजकीय शोक भी घोषित किया। बीते मंगलवार को सैफ़ई में उनका अंतिम संस्कार हुआ। देश भर से अनेकों मुख्यमंत्रियों, नेताओं व केंद्रीय मन्त्रियों के सैफ़ई आने की सूचना भी समय से आई। वहा पहुंचे लोगों में उत्तर प्रदेश सरकार के कई मंत्री, फ़िल्म व उद्योग जगत की बड़ी हस्तियाँ भी थीं। परंतु इन सभी को जिस अव्यवस्था का सामना करना पड़ा है उससे योगी सरकार की व प्रशासन की मंशा पर सवाल उठे है। ध्यान रहे केंद्र सरकार में मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति की तो धक्कामुक्की में हाथ की हड्डी टूट गई।

राजकीय सम्मान का ऐलान संबंधित राज्य का मुख्यमंत्री अपने वरिष्ठ कैबिनेट सहयोगियों के परामर्श के बाद ही करता है। फैसला लेने के बाद इसे मुख्य सचिव व पुलिस महानिदेशक की मार्फ़त उस ज़िले के ज़िलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक सहित सभी अधिकारियों को सूचित किया जाता है। जिससे कि वे राजकीय अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक व्यवस्थाएँ कर सकें।

राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि के दौरान पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटा जाना, पूर्ण सैन्य सम्मान दिया जाना, मिलिट्री बैंड द्वारा ‘शोक संगीत’ बजाना और इसके बाद बंदूकों की सलामी देना आदि शामिल हैं। इसके साथ ही अंतिम संस्कार स्थल पर समुचित सुरक्षा, क़ानून व्यवस्था बनाना बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी होती है। अंत्येष्टि में भाग लेने वाले अतिविशिष्ट व्यक्तियों को भीड़ से अलग बैठाने की व्यवस्था करना इस व्यवस्था का अंग होता है। जिसमें इन सभी अति विशिष्ट व्यक्तियों के लिए समुचित प्रोटोकॉल उपलब्ध करना भी शामिल होता है। इस पंडाल में बैठने वाले अतिविशिष्ट लोग दाह संस्कार पूरा होने तक वहीं बैठे रहते हैं। संस्कार की समाप्ति पर पहले इन अतिविशिष्ट व्यक्तियों को सुरक्षित मार्ग से, बिना व्यवधान के, बाहर पहुँचाया जाता है और तब तक आम जनता को रोके रखा जाता है।

‘नेताजी’ से मेरा बहुत पुराना सम्पर्क था। इसके चलते मंगलवार को मैं भी सैफ़ई गया और ‘नेता जी’ के परिवार को अपनी श्रद्धांजलि व्यक्त की। परंतु सैफ़ई में जो हाल मैंने देखा वो काफ़ी विचलित करने वाला था। लाखों लोगों के लोकप्रिय ‘नेताजी’ के देहावसान पर उत्तर प्रदेश की सरकार ने सैफ़ई में ऐसा कुछ भी नहीं किया जो ‘नेताजी’ की गरिमा के अनुकूल होता। सारे देश से अनेक बड़े नेता, मुख्यमंत्री, उद्योग और फ़िल्म जगत की हस्तियाँ और लाखों लोग ‘नेताजी’ को श्र्द्धांजली अर्पित करने सैफ़ई पहुँचे। पर भारी अव्यवस्था के कारण बेहद परेशान हुए। धक्कामुक्की के तमाम नेता शिकार हुए। अनेकों को चोटें भी लगी। खुद अखिलेश यादव तक अपने पिता के पार्थिव शरीर के पास सीधे खड़े नहीं रह पा रहे थे। उन्हें बार-बार भीड़ के धक्के लग रहे थे।

पुलिस बड़ी संख्या में सैफ़ई में मौजूद थी पर खड़ी तमाशा देखती रही। न तो यातायात की व्यवस्था सुचारु की और न ही अंतिम संस्कार स्थल पर भीड़ को निर्देशित और नियंत्रित करने का काम किया। प्रशासन केवल औपचारिकता निभा रहा था। आसपास के ज़िलों से बुलाए गए दर्जनों मजिस्ट्रेट व अन्य अधिकारी, जिनमें से कुछ को अतिविशिष्ट व्यक्तियों की अगवानी करनी थी, वे भी भ्रमित से नज़र आ रहे थे। जबकि ‘नेताजी’ का देहांत हुए 24 घंटे हो चुके थे। इतना समय काफ़ी होता है प्रशासन के लिए व्यवहारिक योजना बनाना और उसे क्रियान्वित करना। इसलिए इसे अनुभवहीनता कह कर बचा नहीं जा सकता। प्रशासन की ऐसी लापरवाही के कारण लाखों लोग बदहवास हो धक्के खाते रथे। अपने घोर दुश्मन रावण की मृत्यु पर भगवान श्री राम ने उसका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करवाया और लक्ष्मण जी को ज्ञान दिया कि मरने के बाद सारा वैर समाप्त हो जाता है। इसलिए मानना चाहिए कि इस अव्यवस्था के पीछे कोई वैर की भावना नहीं रही होगी। इसलिए योगीजी को पूरे मामले की जाँच करवानी चाहिए और दोषी अधिकारियों को सज़ा देनी चाहिए।

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि इस अव्यवस्था के लिए समाजवादी दल के कार्यकर्ता भी कम ज़िम्मेदार नहीं है। अनेक राजनैतिक दलों के समर्पित कार्यकर्ता ऐसे मौक़ों पर खुद अनुशासित रह कर अपने लाखों समर्थकों को भी अनुशासित रखने का प्रयास ज़िम्मेदारी से करते हैं। फिर वो चाहे शपथ ग्रहण समारोह हो या कोई अन्य अवसर। ‘नेताजी’ के जाने के बाद समाजवादी दल का सारा बोझ अखिलेश यादव के कंधों पर आ गया है। इसलिए दल के अनुभवी और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं, विशेषकर फ़ौज या पुलिस में नौकरी कर चुके कार्यकर्ताओं को बाक़ायदा शिविर लगा कर अपने कार्यकर्ताओं को अनुशासित रहने का प्रशिक्षण देना चाहिए। जिससे भविष्य में ऐसी अव्यवस्था देखने को न मिले।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

two + six =

kishori-yojna
kishori-yojna
ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
केंद्र खबरों को परखने वाले संशोधन वापस ले
केंद्र खबरों को परखने वाले संशोधन वापस ले