संगठन सब कुछ और बेमौल विचारदृष्टि!

संघ परिवार के साथ मेरे अनुभव–2: आरएसएस बीजेएस से मेरे संपर्क का एक परिणाम यह हुआ कि जब हम ने अपना कम्युनिस्ट विरोधी कार्य बंद किया, तब 1956-67 के दूसरे आम चुनाव में मुझे मध्य प्रदेश में खजुराहो संसदीय क्षेत्र से बीजेएस के टिकट पर चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया गया। मेरे अभियान के संचालक स्थानीय आरएसएस कार्यकर्ता ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पीएसपी) से समर्थन का आश्वासन ले लिया था। हालाँकि अंततः सारी व्यवस्था लड़खड़ा गई, क्योंकि वह कार्यकर्ता दुर्घटनाग्रस्त होकर बिछावन पर पड़ गया। फिर भी मैंने आरएसएस बीजेएस संगठन का काम नजदीक से देखा। इन के पास समर्पित कार्यकर्ता, और अच्छे वक्ता थे। एक मात्र चीज जिस की कमी थी वह थे भौतिक साधन। मेरे लिए विश्वास करना कठिन था कि एक देशभक्त संगठन इतना गरीब हो सकता है। लेकिन तब तक मैं हिन्दू महासभा के लोगों से नहीं मिला था और नहीं जानता था कि गरीबी क्या हो सकती है।

इस चुनाव में कुछ नई बातें जानने को मिली। दिल्ली से छपे बीजेएस के बड़े पोस्टरों में घोषणा थी कि बीजेएस का एक मुख्य लक्ष्य अस्पृश्यता को खत्म करना है। हमारे मैदानी कार्यकर्ता इन पोस्टरों को लगाने के विरुद्ध थे क्योंकि उन्हें लगता था कि इस से मतदाताओं का अनुदार वर्ग मेरे विरुद्ध हो जाएगा। लेकिन मैं अड़ा रहा कि वे पोस्टर लगाए जाएं। मुझे नहीं मालूम कि वे लगे या नहीं।

दूसरे, मैंने देखा कि मेरी आम सभाओं के आयोजक एक ओर कांग्रेस और दूसरी ओर बीजेएस की नीतियों के अंतर पर मेरी बातों को पसंद नहीं करते थे। उन्होंने मुझे बार-बार कहा कि मैं कांग्रेस को बेईमान समाजवादी और सेक्यूलर तथा बीजेएस को ईमानदार समाजवादी और सेक्यूलर कहूँ। तीसरे, आयोजकों ने मुस्लिम इलाके वाली मीटिंगों में मुझे गोहत्या पर प्रतिबंध की माँग न करने और पाकिस्तान के विरुद्ध कुछ न कहने की चेतावनी दी। अंततः, उन्होंने मुझे अपने भाषणों में बीच-बीच में अंग्रेजी शब्दों और मुहावरों का प्रयोग करने के लिए कहा, ताकि लोग मुझे अशिक्षित न समझ लें। मुझे ये सुझाव पसंद नहीं आए।

वह आरएसएस के साथ मेरे संपर्क की पृष्ठभूमि थी जब मैं 1957 में दिल्ली लौटा। समय के साथ संपर्क गहरा हुआ। मैं ‘ऑर्गेनाइजर’ में प्रायः लिखता रहा और आरएसएस के लोगों से बहुधा मिलता रहा। अधिकांश काफी मित्रवत थे। जिस एक अमैत्रीपूर्ण व्यक्ति से मैं मिला वह वही हवाबाज था। वह जब भी मुझे देखता, उस की भौंहें सिकुड़ जाती, और यह प्रायः होता। एक सलाह हरेक आरएसएस बीजेएस नेता को मैं सदैव देता, जिन से बात होती। वह यह कि आंदोलन दूसरों से उधार लिए नारों या मौके पर तुरत जो सूझे वैसे विचार पर चलने के बदले उस की अपनी संपूर्ण हिन्दू विचारदृष्टि होनी चाहिए। जिस से स्वयं वह सभी घटनाओं, आंदोलनों, पार्टियों, और सार्वजनिक व्यक्तित्वों को परख सके।

वे धैर्यपूर्वक मुझे सुनते थे और शायद ही कभी प्रतिवाद करते। लेकिन कुछ समय बाद मैंने महसूस किया कि वे मुझे गंभीरता से नहीं लेते थे। उन में अधिकांश समझते थे कि संगठन ही सब कुछ है, और विचारदृष्टि का मूल्य बहुत कम है। मुझे पूरा विश्वास था कि वे बहुत बड़ी गलती पर हैं। मैं देख सकता था कि अपने विरोधियों द्वारा तय किए गए जमीनी नियमों (विचारों) के हिसाब से चलने में उन की दुर्गति होती थी। लेकिन उन्हें लगता कि विचार-दृष्टि पर मेरे आग्रह का संबंध मेरी कम्युनिस्ट पृष्ठभूमि से है। मैं असहाय महसूस करता। मुझे बड़ी चिढ़ भी होती जब आरएसएस की सभाओं में वक्ता दर वक्ता ‘बुद्धिजीवियों’ का खूब मजाक उड़ाता, कि इन्होंने पुस्तकें तो बहुत पढ़ ली मगर जिन्हें ‘व्यवहारिक समस्याओं’ का कुछ पता नहीं। उन की एक प्रिय कथा एक पंडित के बारे में थी जिस ने पाणिनी को न जानने के कारण एक मल्लाह पर नाक-भौ सिकोड़ी, मगर जब नाव मुश्किल में पड़ी तब मल्लाह ने तैरना न जानने के लिए पंडित जी को उस की जगह दिखा दी।

जो सब से अनोखी बात आरएसएस के लोगों में मैंने पाई कि आम तौर पर वे किसी विचार पर प्रतिक्रिया नहीं करते थे, सिवा अपने संगठन (संघ) और उस के नेताओं के बारे में। हिन्दू धर्म, या हिन्दू संस्कृति, या हिन्दू समाज, हिन्दू इतिहास पर कोई कितनी भी बुरी-बुरी बातें कहे, एक आम आरएसएस व्यक्ति कोई प्रतिक्रिया नहीं करता। वह किसी पर खुश या नाखुश तभी होता जब उस के संगठन या नेताओं, या दोनों पर कोई कुछ कहे। मैं चकित होता कि यह कैसा हिन्दू संगठन है! मैं चाहता कि आरएसएस अपने संगठन की छवि की परवाह करने के बदले हिन्दू मुद्दों पर जीवंतता दिखाता। एक दिन एक बीजेएस नेता ने मुझ से पश्चिमी देशों में बीजेएस को प्रस्तुत करने के लिए एक पुस्तक लिखने को कहा। मैंने कहा कि मैं बीजेएस के बारे में बहुत कम जानता हूँ, और अच्छा हो कि उस का कोई अपना विद्वान यह काम करे। उस ने कहा कि समस्या यह है कि उन के संगठन में कोई विद्वान नहीं है। मैं लिखने के लिए राजी हो गया, पर कह दिया कि वह उन की नीतियों पर काफी आलोचनात्मक होगी।

वह चकित हुआ। उस ने मेरे प्रति बड़े दया भाव से कहा कि मैं एक प्रतिभावान व्यक्ति हूँ और उन के संगठन में ऊँचे जा सकता हूँ, यदि मैं वह पुस्तक लिख दूँ और अपने बारे में लोगों के मन में बचे संदेह दूर कर दूँ। मैंने पूछा, ‘‘कैसा संदेह?’’ वह मुस्कुराया और बोला, ‘‘आपको जानना चाहिए। हमारे अधिकांश लोग समझते हैं कि आप हैं …. ’’। उस ने बात पूरी नहीं की। उस के लिए मैंने पूरा किया, ‘‘एक अमेरिकी एजेंट।’’ मुझे अपने क्रोध पर नियंत्रण करना पड़ा। उसे मैंने कहा कि अगर किसी दिन उस के लोगों में किसी को देशभक्ति के प्रमाण-पत्र की जरूरत हो, तो वह मुझ से आकर ले सकता है। वह मेरे बीजेएस के साथ मेल-जोल का अंत था।

आरएसएस से मोहभंग होने में कुछ समय और लगा। देश लाल चीन के साथ टकराव की ओर बढ़ रहा था। लोग पंडित नेहरू की विदेश नीति से निराश हो रहे थे। लेकिन उन्हें लगता था कि पंडित नेहरू को उन के रक्षा मंत्री और विश्वासपात्र वी. के. कृष्णमेनन ने गुमराह किया है। बहुत कम लोग मानने को तैयार थे कि देश की ट्रेजेडी के वास्तविक रचनाकार खुद पंडित नेहरू थे। मेनन तो नेहरू के हरकारे के सिवा कुछ न थे, जिन की न तो कांग्रेस पार्टी, न देश में अपनी कोई हैसियत थी।

तब तक मैंने पंडित नेहरू का लगभग सभी प्रकाशित लेखन और भाषण पढ़ डाला था, और उन्हें पक्के कम्युनिस्ट के रूप में जान गया था। उन्होंने लाल चीन को अपने देश में ‘समाजवादी निर्माण’ का श्रेय दिया था, और कहते आ रहे थे कि ‘‘समाजवादी देश कभी पड़ोसियों के प्रति शत्रुतापूर्ण भाव नहीं रख सकता।’’ मेरी समस्या यह थी कि अपनी समझ को देशवासियों के सामने कैसे पहुँचाऊँ? भारत में प्रेस कमोबेश पूरी तरह कम्युनिस्टों, या उन के बौद्धिक सहयोगियों, या स्वार्थी चापलूसों के नियंत्रण में था।  (जारी)

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