जनसंघ के ‘हवाबाज’ ने रूकवाई नेहरू सीरिज

संघ परिवार के साथ मेरे अनुभव -3: मैं बड़ा प्रसन्न हुआ जब उस आरएसएस नेता ने, जिन से मैं कलकत्ते में मिला था और जो अब संगठन में बड़े ऊँचे पहुँच गए थे, मुझे आर्गेनाइजर में एक लेख-माला में नेहरू के विचार-तंत्र (आइडियोलॉजी) पर लिखने के लिए आमंत्रित किया। इस के 5 जून 1961 के अंक से आरंभ कर ‘इन डिफेंस ऑफ कॉमरेड कृष्ण मेनन’ (कॉमरेड कृष्ण मेनन के बचाव में) शीर्षक से मैंने 17 लेख लिखे। मैं ‘एकाकी’ के छद्म-नाम से लिख रहा था। बहुत कम लोग जानते थे कि लेखक कौन है। कम से कम मेरे बॉस नहीं जानते थे कि मैंने उन से अपनी प्रतिज्ञा भंग की है। वे लेख उन लोगों द्वारा बड़े पैमाने में पढ़े गए जो सामान्यतः आर्गेनाइजर नहीं पढ़ते थे।

इसलिए, मैं चकित हुआ जब एक दिन बीजेएस के उस हवाबाज ने मुझे पकड़ा, और ‘‘देश के नेता के बारे में वह सारी बकवास लिखने’’ के लिए मुझे बड़ी कड़ाई से खूब खरी-खोटी सुनाई। मैंने संपादक से बात की, जिस ने कहा कि वह (लेख-श्रृंखला के) लेखक की जानकारी बीजेएस के सर्वोच्च नेता से गोपन नहीं रख सकता था। उस ने यह भी कहा कि उस नेता ने ‘‘उस बदनाम आदमी’’ से कोई संबंध नहीं रखने के लिए कहा है। मैं उस हवाबाज के पास जाकर पूछना चाहता था कि कम्युनिज्म के चरित्र और उस के औजारों को उजागर करने के सिवा मैंने कौन सा अपराध किया है। लेकिन मैंने परवाह नहीं की, जब तक कि मुझे उन आरएसएस नेता का समर्थन हासिल था, जिन से मेरी भेंट हर सप्ताह होती थी।

मेरा सोलहवाँ लेख तब तुरत प्रकाशित ही हुआ था। आरएसएस नेता ने मुझे कहा कि मैं लिखता जाऊँ, तब तक जब तक मैं ‘वर्तमान स्थिति में नेहरू की नीति’ तक न पहुँच जाऊँ। उस ने यह भी कहा कि मेरे उन लेखों ने ‘‘हमारे लोगों के चिंतन में एक क्रांति कर दी है’’, और वे उसे एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की योजना बना रहे हैं, जैसे ही वह लेख-माला पूरी हो जाए। वे भारत की सभी भाषाओं में लाखों की संख्या में उसे उपलब्ध करवाएंगे। मैं अपने काम से बड़ा संतुष्ट हुआ। मेरा सत्रहवाँ लेख प्रेस में जा चुका था। और मैं अब नेहरू की चीन नीति पर लिखने की तैयारी कर रहा था।

लेकिन मेरे भाग्य में उस लेख-माला को पूरा करना नहीं लिखा था। अगले सप्ताह जब मैं आरएसएस नेता से मिला, मैंने उस से ठीक उलटा सुना जिस की मैं उम्मीद कर रहा था। जैसे ही मैंने उन के कमरे में प्रवेश किया, उन्होंने रुखे और नपे-नपाए स्वर में कहा, ‘‘सीताराम जी, आपको नेहरू के सिवा कोई काम नहीं है? आखिर नेहरू ने ऐसा क्या कर दिया जो आप हाथ धोकर उस के पीछे पड़ गए?’’ मैं अवाक रह गया, और कुछ समझ न सका कि क्या कहूँ। संयोगवश आर्गेनाइजर के संपादक ठीक उसी समय कमरे में आए। नेता उस पर भड़के, ‘‘ये क्या नेहरू-नेहरू लगा रखा है? अपने पेपर का यह क्या बना डाला तुम ने? बन्द करो यह नेहरू-नेहरू? क्या और कोई टॉपिक नहीं बचा?’’ संपादक ने एक शब्द भी नहीं कहा। वह आरएसएस के अनुशासन में बँधा था। मैं मानो आकाश से गिरा। मेरे लिए विश्वास करना कठिन था कि मेरे सामने बैठा कड़े मुँह और अमैत्रीपूर्ण आँखों वाला आदमी वही है, जिस ने बस एक सप्ताह पहले मेरी लेख-माला की उतनी प्रशंसा की थी। मगर वही कड़वा सच था। …

मेरा आरएसएस-बीजेएस के नेताओं से संपर्क 1962 वाले अनुभव के बाद टूट गया था। किन्तु मैंने उस  में रुचि लेना बंद नहीं किया था जिसे एक मात्र जीवित हिन्दू आंदोलन के रूप में देखा जाता था। आर्य समाज और हिन्दू महासभा लगभग सूख चुके थे। रामकृष्ण आश्रम और श्रीअरविन्द आश्रम अपने को हिन्दू के बजाए ‘सार्वभौमिक’ साबित करने में व्यस्त थे। पर आरएसएस-बीजेएस में हो रही बातों के जो समाचार मुझे मिल रहे थे, काफी निराश करने वाले थे।

बीजेएस को उस हवाबाज ने कमो-बेश पूरी तरह अपने कब्जे में कर लिया था। वह न केवल पंडित नेहरू के विचार-तंत्र से सहमत था, बल्कि अपने पार्टी सहयोगियों से निपटने में उन जैसे मिजाज का भी था। वह बीजेएस में वैसे कुछ लोगों को चुप करने या भगाने में सफल रहा, जिन में यह कहने का साहस था कि वे समाजवाद, सेक्यूलरिज्म, गुटनिरेपेक्षता, आदि पर नेहरूवादी सहमति नहीं रखते। मैं सोचता कि क्या यह सब आरएसएस के सर्वोच्च नेताओं की सक्रिय या निष्क्रिय सहमति से हो रहा है? कुछ लोगों ने कहा कि हाँ। दूसरों ने कहा कि उस हवाबाज की जनता में लोकप्रियता को देखते हुए आरएसएस नेता विवश हैं।

दिसंबर 1971 में उस हवाबाज की एक आम सभा में जाने का मुझे अवसर मिला। बंगला देश की मुक्ति के लिए हमारी पाकिस्तान से लड़ाई चल रही थी। नवीनतम समाचारों के अनुसार बैंकाक से अमेरिकी नौसेनिक बेड़ा चल चुका था और बंगाल की खाड़ी की ओर आ रहा था। यह चिन्ता का समय था। पर हवाबाज ने ललकारा, ‘‘अमेरिका का जो बेड़ा बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ रहा है, उस का एक जहाज भी वापस न जाने पाए।’’ उस पर उपस्थित जनसमूह ने खड़े होकर जबर्दस्त तालियाँ बजाई। मैं सोच में पड़ गया कि क्या वह जानता है कि अमेरिकी बेड़े का मतलब क्या है, और मैं वापस लौट आया। यह उस हवाबाज की पहली सभा थी, जिस में मैं गया था। वही अंतिम भी रही।

आरएसएस का संपूर्ण रूपान्तरण भी ध्यान देने योग्य था। इस्लाम और भारत में इस की गतिविधि समझने की आरएसएस ने कभी चिन्ता नहीं की। मैंने अपने कानों से गुरू गोलवलकर को एक सार्वजनिक मंच से बोलते सुना था कि वे इस्लाम का आदर हिन्दू धर्म से जरा भी कम नहीं करते, कि कुरान उन के लिए उतना ही पवित्र है जितना वेद, और वे प्रोफेट मुहम्मद को मानव इतिहास में ज्ञात महानतम पुरुषों में एक मानते हैं। इसलिए, आपातकाल के दौरान जेल में जब कुछ आरएसएस नेता जमाते इस्लामी के मुल्लों के संपर्क में आए और मिले-जुले तो बड़े गदगद हुए। मैंने स्वयं उन में से कुछ को बोलते हुए सुना, ‘‘जब तक हम मुस्लिम मुल्लाओं से नहीं मिले थे, तब तक हम इस्लाम के बारे में अंधेरे में थे। अब हम जानते हैं कि इस्लाम वस्तुतः क्या है।’’ मैंने उन में से एक से पूछा, ‘‘क्या आपने इस्लाम की मूल किताबों को स्वयं कभी पढ़ा? आप कैसे समझते हैं कि आप को मुल्ला जो बता रहे थे, वह केवल आपको भरमाने के लिए न था?’’ वे मुस्कुराए, और मुझे पुराना नासमझ मानकर खारिज कर दिया। मैं देख रहा था कि मुल्लों ने इस्लाम को जैसे प्रस्तुत किया, वही विश्वास करने की उन की अपनी ही प्रबल इच्छा थी। यदि इस्लाम इतना सुंदर है तो फिर कोई समस्या ही नहीं! यह उन के लिए इतना सरल था। (जारी)

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