जनता पार्टी में हवाबाज और हैसियत

संघ परिवार के साथ मेरे अनुभव – 4: इस प्रकार, आरएसएस-बीजेएस पूरी तरह नेहरूवादी विचारों के अनुरूप हो गए और तदनुरूप जनता पार्टी [जिस में बीजेएस ने अपना विलय 1977-1980 के दौरान कर दिया था]  में कांग्रेसियों और समाजवादियों से भरपूर नीचा व्यवहार पाया। इस के बावजूद कि आपातकाल में आरएसएस-बीजेएस के लोग सब से अधिक प्रताड़ित हुए और सर्वाधिक संख्या में जेल गए, और संसद में भी उन की उपस्थिति सब से बड़ी थी, उन की हैसियत जनता पार्टी में नौकरों से बेहतर नहीं थी जिन्हें कोई भी ठोकर मार सकता था।

सब से पहले तो पार्टी में फुसफुसाहट अभियान चला कि ‘सांप्रदायिकों’ द्वारा पार्टी पर कब्जा करने का खतरा है। दूसरे, समाजवादियों ने खुली माँग की कि या तो आरएसएस जनता पार्टी का आज्ञाकारी सेवक बने, या फिर पार्टी में जनसंघ के लोग आरएसएस से अपना संबंध तोड़ लें। अंततः, आरएसएस से माँग की गई कि वह अपने संविधान में ‘हिन्दू’ शब्द हटाए और अपने संगठन में मुसलमानों को आने दे।

उस हवाबाज ने, जो जनता पार्टी में जनसंघ ग्रुप का नेता था, समाजवादियों की माँग का समर्थन किया। उस ने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा कि आखिरकार आरएसएस एक राजनीतिक आंदोलन है, इसलिए उसे अपनी ‘सांस्कृतिक भंगिमा’ छोड़ने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। जनसंघ ग्रुप में श्री लाल कृष्ण अडवाणी एक मात्र थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्हें आरएसएस से अपने संबंध पर गर्व है। लेकिन उन्होंने अपने आकलन में आरएसएस के सर्वोच्च नेताओं को नहीं जोड़ा था, जिन्होंने अपने अगले सम्मेलन में समाजवादियों की माँग पर विचार करना तुरत स्वीकार कर लिया। स्थिति केवल इसलिए सँभली क्योंकि 1979 में जनता सरकार गिर गई।

जनता पार्टी के अंदर के एक मित्र ने बताया कि जनता सरकार के दौरान जब सोवियत राष्ट्रपति कोसीगिन भारत आए थे, वे दुविधा में थे कि भारतीय विदेश मंत्री से उन की मुलाकात कैसी रहेगी। उन्हें अंदाजा था कि यह मंत्री तो ‘प्रतिक्रियावादी’ आंदोलन का व्यक्ति है। किन्तु वे जब मंत्री से मिले तो वे यह  पाकर खुशी से आश्चर्यचकित हो गए कि ‘‘यह व्यक्ति तो भारत में हमारे कम्युनिस्ट कामरेडों से भी अधिक प्रगतिशील है।’’ उस समय मॉस्को में भारतीय राजदूत को वापस बुलाने की बात चल रही थी, जिसे इंदिरा गाँधी शासन के दौरान नियुक्त किया गया था। उसे भारत के राजदूत के बदले मॉस्को का आदमी समझा जाता था। लेकिन मंत्री अड़ गया, ‘‘बिलकुल नहीं। वह मेरे सब से अच्छे मित्रों में से है।’’

उस ने एक जाने-माने स्तंभ-लेखक को राज्य सभा में लाने की कोशिश भी की, जो आजीवन हिन्दू-निंदक रहा था और हर इस्लामी उद्देश्य का समर्थक था। उस कोशिश में विफल होने पर, उस ने तब विदेश मंत्रालय में कार्यरत अधिकारी सैयद शहाबुद्दीन को राज्य सभा में भेज दिया, यह कहकर कि वह ‘‘सही प्रकार का मुस्लिम नेता है जिसे हम ढूँढ रहे हैं।’’ सैयद ने अपने संरक्षक को भारतीय राजनीति में निराश नहीं किया।

हालाँकि, उस हवाबाज की सर्वोच्च उपलब्धि थी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का निर्माण, और गाँधीवादी समाजवाद को उस का दर्शन तय कराना। नई पार्टी के झंडे में इस्लामी जिहाद का हरा रंग हिन्दुत्व के भगवा के साथ बराबर सम्मानित किया गया। आरएसएस या बीजेपी में किसी को शायद जानकारी नहीं थी या याद करने की परवाह न थी, कि भारत के इतिहास में इस इस्लामी रंग ने क्या भूमिका दिखाई है, और भारत के भविष्य के लिए इस का क्या संकेत है। सो, हमारे पास नेहरूवादी नारे लगाने का एक और मंच तैयार हो गया। बस 1984 के आम चुनाव में यह अनावश्यक एक और साबित हुआ। लोगों ने सोचा कि मूल और असली कांग्रेस ही ठीक है, न कि उस की कार्बन कॉपी।

कुछ अजीब बात थी कि ऑर्गेनाइजर के संपादक श्री के. आर. मलकानी ने एक लेखक के रूप में मुझे कभी नहीं छोड़ा था। इन तमाम वर्षों में वे मुझे पत्र लिखते रहते थे, विषय सुझाते जिन पर मैं उन के साप्ताहिक में लेख लिख सकता था। मैं सोचता था कि यह उन की उदारता थी, यद्यपि मैंने उन पत्रों का कभी उत्तर नहीं दिया। अब मैं उन के ऑफिस गया, और पूछा कि क्या वे कुछ लेख-मालाओं पर विचार करेंगे जो मेरे मन में हैं। वे तुरत राजी हो गए।

इस तरह लेखों की माला आरंभ हुई, एक के बाद एक – ‘हाउ आई बिकेम ए हिन्दू’, ‘हिन्दू सोसायटी अंडर सीज’ (हिन्दू समाज संकटों के घेरे में), ‘एन एक्सपेरिमेंट विथ अनट्रुथ’, ‘डिफेंस ऑफ हिन्दू सोसायटी’, ‘हिस्टरी ऑफ हिरोइक हिन्दू रेसिस्टेंस टु इस्लामिक इन्वैडर्स’। अब मैं हरेक सप्ताह कई दिन दोपहर बाद  ऑर्गेनाइजर के कार्यालय में प्रूफ देखते, लोगों से मिलते, और श्री मलकानी से बात-चीत करते बिताता था। एक बार फिर मैं अपने पुराने स्वरूप में आ गया था। मेरे लिए अब विश्वास करना कठिन था कि पंद्रह सालों से भी अधिक समय मैं केवल व्यवसायी रहा था।

समय के साथ मैंने पाया कि ऑर्गेनाइजर में मेरी लेख-माला पर सेक्यूलर हलकों की नजर जा रही है। किसी मित्र के यहाँ एक सेक्यूलरवादी लेखक से आकस्मिक भेंट में उस ने नाराजगी से पूछा, ‘‘और कितनी लेख-मालाएं लिखने की योजना है?’’ मैंने कहा, ‘‘एक सौ, यदि इस बीच मैं चल न बसूँ या बिछावन पर न पड़ जाऊँ।’’ और मैं इस पर गंभीर था। मेरे मन में कई विषय थे। मैं अपने लिखने की डेस्क पर स्त्रोत सामग्रियाँ पढ़ते और लेख लिखते घंटों बिताता था।

जिस चीज ने उस दौरान मुझे प्रोत्साहित किया वह थे मुझे मिलते पाठकों के पत्र। वे मेरे पते और ऑर्गेनाइजर के संपादक के पते पर पहुँचते। वे देश के सभी भागों से, और विदेशों विशेषकर यू.के. और संयुक्त राज्य अमेरिका से भी आए। सब में मेरी तथ्यों की जानकारी, और उन्हें उचित परिप्रेक्ष्य में रख सकने की मेरी क्षमता की भरपूर प्रशंसा थी। मैं पाठकों के प्रति बड़ा आभारी हुआ। बीच-बीच में कभी मैं अटपटा भी महसूस करता जब हाल के हिन्दू नवजागरण के किसी महापुरुष से मेरी तुलना की जाती। एक पत्र बड़ा संक्षिप्त, और संपादक को संबोधित था। इस में लिखा था  कि ऑर्गेनाइजर के लिए सीता राम गोयल सब से कमाल की घटना साबित हुए हैं (‘सीता राम गोयल इज द मोस्ट वंडरफुल थिंग हैपेन्ड टु द ऑर्गेनाइजर’)। मैं स्वीकार करूँगा कि मैं बड़ा तुष्ट-प्रसन्न हुआ।  (जारी)

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