अपना अलग बनाया रास्ता

संघ परिवार के साथ मेरे अनुभव – 5: … और फिर वही दुबारा घटित हुआ। इस बार धक्का उतना तेज और आकस्मिक न था, जितना पिछली बार। फिर भी यह धक्का तो था ही। फर्क यह था कि इस बार इस ने मुझे तोड़ा नहीं, जैसा पिछली बार हुआ था।

मैं अपनी लेख-माला में एच. वी. शेषाद्रि की पुस्तक ‘द ट्रैजिक स्टोरी ऑफ इंडिया’ज पार्टीशन’ (भारत विभाजन की करुण कहानी) की समीक्षा कर रहा था। यह लेख-माला थी मुस्लिम सेपरेटिज्मः कॉजेज एंड कॉन्सिक्वेंसेज (मुस्लिम अलगाववादः कारण और परिणाम)। जब एक दिन प्रूफ आए, तो मैंने पाया कि सूफियों के बारे में कुछ अंश प्रेस के कंपोजीशन से गायब हैं। मैंने टाइप की हुई प्रति उठाई, और देखा कि उस में वे अंश लाल पेंसिल से काटे हुए हैं। मैंने श्री मलकानी से पूछा कि क्या उन्होंने वैसा किया। उन्होंने मुझ से नजर नहीं मिलाई, पर बुदबुदाए, ‘‘हमें उन के साथ रहना है।’’ मैंने उत्तर दिया, ‘‘मैं भी यही देखने की कोशिश कर रहा था कि वे हमारे साथ रहना सीखें।’’ उन्होंने उत्तर नहीं दिया।

जल्द ही श्री मलकानी पद से हटा दिए गए। मैं पूरी बात नहीं जानता था। बहुत बाद मुझे कुल इतना मालूम हुआ कि ऑर्गेनाइजर में मेरा नियमित लेखन बंद न करना उस दुखद परिणति का एक कारण था। लेकिन तब मुझे यह आशंका नहीं हुई थी कि मेरा भी उन्हें उस अखबार से हटाने से कुछ संबंध है, जिस की उन्होंने इतने वर्षों तक सेवा की। इस हद तक कि ऑर्गेनाइजर को मलकानी से और मलकानी को ऑर्गेनाइजर से जाना जाने लगा था। पार्टी आकाओं के तरीके समझना सदैव कठिन है।

अगले संपादक का स्थान लेने वाले श्री वी. पी. भाटिया भी श्री मलकानी की तरह ही बड़े सज्जन व्यक्ति निकले। लेकिन नेताओं के दबाव के सामने वे क्या कर सकते थे? उन्होंने मेरे लेखों के अंश नहीं काटे। लेकिन उन्होंने इस का काफी संकेत दिया कि मेरा लेखन अब वांछित नहीं है। संकेतों को समझने में मेरी खोपड़ी थोड़ी मोटी रही है। फिर भी मैं समझ गया कि कहीं कुछ गड़बड़ है। मैंने श्री भाटिया को कह दिया कि मैं बंद कर दूँगा जैसे ही मेरी चालू लेख-माला ‘परवर्सन ऑफ इंडिया’ज पोलिटिकल पार्लान्स’ (भारत की राजनीतिक विमर्श-भाषा की विकृति) का अंत होगा। मैंने बंद कर भी दिया। लेकिन मैं जानना चाहता था कि हुआ क्या था।

कुछ महीने बाद आरएसएस के एक बड़े नेता अकस्मात सामने पड़ गए। मुझे मालूम हुआ था कि मेरे लेखन पर प्रतिबंध लगाने से कुछ उन का भी कुछ लेना-देना है। मैंने उन से सीधे पूछा, ‘‘आप ने ऑर्गेनाइजर में मेरी लेख-माला बंद क्यों कराई?’’ उन्होंने कहा, ‘‘कभी कभी लिखिए।’’ मगर असली बात सामने आ गई जब कुछ महीने बाद मैं आरएसएस के एक अन्य बड़े नेता के सामने पड़ गया। वे अमेरिका में विश्व हिन्दू परिषद की एक रैली में भाग लेने जा रहे थे। जब वही प्रश्न मैंने उन के सामने रखा तो उन्होंने मुझे ऊँगली दिखाई, और जोर से बोले, ‘‘आप … आप बस उठते हैं और इस्लाम पर हमला कर देते हैं। तब कोई मुसलमान हमारे पास कैसे आएगा?’’ उन का स्वर तीखा था। वस्तुतः, उन की आवाज में क्रोध था।

मैं एकाध बार उन से पहले भी मिला था, और मुझे लगा था कि वे विनम्रता की साक्षात मूर्ति हैं। अब मानो मैं किसी भिन्न व्यक्ति से मिल रहा था – हिन्दू आंदोलन का बड़ा भारी नेता। फिर भी मैंने पूछा कि ‘‘मगर क्या आप सचमुच चाहते हैं कि मुसलमान आप के पास आएं?’’ उन्होंने शुरू किया, ‘‘एक रणनीति के रूप में …’’। मैंने उन्हें आगे सुनने की जरूरत महसूस नहीं की, और कमरे से बाहर निकल गया। कम्युनिज्म से दूर होने के बाद से ही मैं इस ‘रणनीति’ शब्द से क्षुब्ध हो चुका था। मार्क्सवादी-लेनिनवादी साहित्य में मैंने यह शब्द पतझड़ में सूखे पत्तों की तरह हर जगह बिखरा देखा था। हर हाल में, अब शिकायत की कोई गुंजाइश न थी, जब मैं पार्टी लाइन स्पष्ट जान चुका था। जो एक बात मुझे फिर भी अस्पष्ट लगती थी वह आरएसएस-बीजेपी का शोर कि सेक्यूलरवादी पार्टियाँ वोट के लिए मुसलमानों का तुष्टीकरण कर रही हैं। यह मुझे चलनी द्वारा सूप की निंदा का ही मामला लगा।

मैंने पार्टी आकाओं और धन्नासेठों की कभी परवाह नहीं की थी, क्योंकि वैसे काफी लोगों को मैं नजदीक से देख चुका था। प्रायः वे सत्ता या पैसे के लोभी होते हैं। न ही मुझे किसी बड़े पद की आकांक्षा रही थी। सो मैं आगे बढ़ गया। मैं जानता था कि हिन्दू समाज आरएसएस-बीजेपी से बहुत बड़ा है। मैं अपने लोगों के पास उस सत्य को पहुँचाना चाहता था जो मैंने देखा था। मैं अपनी किसी भूल सुधार के लिए तैयार था, लेकिन धूर्त्तता को रणनीति कहकर महिमा-मंडित करने के लिए नहीं। इस के परिणाम बहुत उत्साहजनक रहे।

इस बार मैं अपना काम करते रह सकता था क्योंकि मेरे पास अपना पैसा था। दिल्ली, कलकत्ता और मद्रास से कुछ मित्रों ने कुछ और दिया। अब मुझे केवल ऐसे विद्वानों की तलाश थी जो सच कह सकें। सौभाग्यवश, जल्द ही मुझे कुछ ऐसे लोग मिले – डॉ. हर्ष नारायण, आभास कुमार चटर्जी, प्रो. के. एस. लाल, कोएनराड एल्स्ट, राजेन्द्र सिंह, संत आर. एस. निराला, और श्रीकान्त तलागेरी। समय के साथ कुछ और विद्वान हमें मिलने वाले थे। इस बीच, गिरिलाल जैन, अरुण शौरी, स्वपन दासगुप्त तथा कुछ अन्य भी अपने बल पर ज्योति जलाए हुए थे। उन्हें सिर झुका कर नमस्कार!   (समाप्त)

2 thoughts on “अपना अलग बनाया रास्ता

  1. माननीय तत्ववेत्ता श्री. सीता राम गोयल जी के ये अनुभवोंके ऊपर हिंदू समाज ने विचार, चिंतन तथा भविष्य में आक्रांताओंसे संरक्षण की नीति तय करनी होंगी!!
    बहुत ही मूल्यवान आकलन हैं !!

  2. आदरणीय सीताराम गोयल जी को सत् सत् नमन।। इन लेखों को प्रकाशित करने वालों का भी धन्यवाद। आपसे एक नीवेदन की उनकी सभी पुस्तकों और लेखों को हिन्दी भाषा में आम जनता के लिए सरल तरीके से उपलब्ध कराए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares