nayaindia narendra modi 8 years ख़ामोशी की बर्फ़ के नीचे बहता ताताचट लावा
गेस्ट कॉलम| नया इंडिया| narendra modi 8 years ख़ामोशी की बर्फ़ के नीचे बहता ताताचट लावा

ख़ामोशी की बर्फ़ के नीचे बहता ताताचट लावा

अपनी ग़लतियों को सार्वजनिक तौर पर मानने का तो छोड़िए, मन-ही-मन उनका अहसास कर लेने की भी संवेदना आज कितनों में आप को दिखाई देती है? पश्चात्ताप करने की सोचना तो दूर, अपनी ग़लती को चुपचाप सुधार लेने की चाहत भी कितनों में आज रह गई है? इसलिए आज के दुर्दिनों की बात आते ही 1975-1975 चिल्ला कर अपनी छाती पीटने वालों से मौक़ा मिलते ही यह ज़रूर पूछिए कि इन आठ वर्षों के पहले दो साल में जिस छद्म-सुख की गुदगुदी उन्हें हो रही थी, क्या बाद के छह बरस में सचमुच वह पायदान-दर-पायदान नीचे नहीं खिसकी है?

देश के अर्थवान लोगों को एक बात लग तो आठ साल से रही थी कि भारत के प्रधानमंत्री की गद्दी पर शायद एक ऐसा व्यक्ति आ बैठा है, जिसमें प्रधानमंत्री के लिए ज़रूरी अज़मत, ज़ीनत और ख़ाकसारी की ख़ूबियों की ज़रा कमी है; लेकिन इस हफ़्ते तो यह अंतिम तौर पर तय हो गया कि प्रधानमंत्री की मसनद पर बैठे नरेंद्र भाई मोदी के मन में सकल-भारत दूर-दूर तक कहीं नहीं है। उनका मन संघ की शाखाओं में बिताए अपने बचपन के दिनों में अंकुरित मगरमच्छी-विचारों से ही लिपटा हुआ है। सो, अपने राजनीतिक दल, अपने पितृ-संगठन, अपने कारोबारी-लंगोटियों और अपने हमख़्याल-लठैतों के अलावा बाकी सब के लिए उनके हृदय की धमनियों और मस्तिष्क की तंत्रिकाओं में शत्रुता के अंगारे अनवरत सुलगते रहते हैं।

ऐसा न होता तो क़ानून के राज का तमाम शिष्टाचार प्रतिशोध के पतनाले में तिरोहित कर भारतीय जनता पार्टी की राज्य-सरकारों को बुलडोज़र पर चढ़ कर ऐसा तांडव करते आप ने इस सप्ताह नहीं देखा होता। ऐसा न होता तो सारी नियमावलियों को निर्लज्जता की खूंटी पर लटका कर पुलिस को विपक्ष के सबसे बड़े राजनीतिक दल कांग्रेस के राष्ट्रीय मुख्यालय में इस तरह घुसते आप ने इस हफ़्ते नहीं देखा होता। सब-कुछ अपने ठेंगे पर रखने वाला ऐसा रहनुमा भारत में आप ने क्या पहले कभी देखा था? प्रधान-सेवकाई के अपने ऐलान को देखते-ही-देखते शहंशाही में तब्दील कर लेने वाला ऐसा महामना आप ने क्या पहले कभी देखा था? जनतंत्र की स्थापित परंपराओं के लिए ऐसा घनघोर तिरस्कार-भाव रखने वाला कोई प्रक्रिया-मर्दक आप ने क्या पहले कभी देखा था?

मैं जानता हूं कि मेरी इस बात पर नरेंद्र भाई के पुजारियों के मुंह से तपाक से इंदिरा गांधी के नाम की बौछार शुरू हो जाएगी। इसलिए मैं कुछ बातें आपको बता दूं। एक, 634 दिन के आपातकाल में जो हुआ, वह पिछले आठ बरस से चल रही हुकूमत के दौरान हमारे सियासी आसमान पर छाए डर का पासंग भी नहीं था। दो, भूदान आंदोलन के सबसे बड़े पुरोधा संत विनोबा भावे, उस वक़्त के सबसे बड़े हिंदू हृदय सम्राट बाला साहेब ठाकरे, दक्षिण भारत की सियासत में उन दिनों के सबसे बड़े सम्मोहक एम. जी. रामचंद्रन और हमें एयर इंडिया देने वाले तब के सबसे बड़े उद्योगपति जहांगीर रतनजी दादाभॉय टाटा जैसे लोग दिग्गजों की उस लंबी सूची में शामिल थे, जिन्होंने खुल कर आपातकाल का समर्थन किया था। बावजूद इसके, और बावजूद अपनों के विरोध के, इंदिरा गांधी ने रातों-रात चुनाव कराने का ऐलान कर दिया और अपने ही लगाए आपातकाल से देश को बाहर ले आईं। तीन, आपातकाल लगाने के लिए तात्कालिक परिस्थितियां कितनी ही ज़िम्मेदार रही हों, मगर कांग्रेस ने आपातकाल को कभी सही नहीं ठहराया और राजीव गांधी से लेकर राहुल गांधी तक ने यह ग़लती सार्वजनिक तौर पर स्वीकार की। जिन्होंने आपातकाल के दिनों में इंदिरा गांधी के रोज़मर्रा के कामकाज से जुड़े दस्तावेज़ों और औपचारिक-अनौपचारिक घटनाओं का ठीक से अध्ययन किया है, वे जानते हैं कि आपातकाल लगाने के बाद एक बरस बीतते-बीतते इंदिरा जी के भीतर का अपराध-बोध कितना गहरा हो गया था और उनकी मनःस्थिति क्या थी? संजय गांधी से लेकर अपने गुप्तचर-प्रमुख की सलाहों के ख़िलाफ़ जा कर, जानते हुए भी कि वे चुनाव हार रही हैं, आपातकाल हटा कर उन्होंने अपनी ग़लती का पश्चात्ताप किया था।

अपनी ग़लतियों को सार्वजनिक तौर पर मानने का तो छोड़िए, मन-ही-मन उनका अहसास कर लेने की भी संवेदना आज कितनों में आप को दिखाई देती है? पश्चात्ताप करने की सोचना तो दूर, अपनी ग़लती को चुपचाप सुधार लेने की चाहत भी कितनों में आज रह गई है? इसलिए आज के दुर्दिनों की बात आते ही 1975-1975 चिल्ला कर अपनी छाती पीटने वालों से मौक़ा मिलते ही यह ज़रूर पूछिए कि इन आठ वर्षों के पहले दो साल में जिस छद्म-सुख की गुदगुदी उन्हें हो रही थी, क्या बाद के छह बरस में सचमुच वह पायदान-दर-पायदान नीचे नहीं खिसकी है? जीवन भर सीने पर आड़ा हाथ रख कर ‘नमस्ते सदा वत्सले’ गुनगुनाने वाले भी आज अगर ईमानदारी से अपने दिल पर हाथ रख कर आपके इस सवाल का जवाब देंगे तो, अपने निजी अनुभव से बताता हूं कि, या तो खुसुर-पुसर अंदाज़ में कुछ कहेंगे या एकदम चुप हो जाएंगे।

नरेंद्र भाई के पास अगर राहुल गांधी के ख़िलाफ़ ऐसे मामलों के सबूत हैं कि उन्हें जेल भेजा जा सकता है तो इंतज़ार किस बात का? भेज दें। इस-उस को उनके पीछे छू लगा कर तमाशा खड़ा करने में इतनी दिलचस्पी क्यों है? बार-बार उन्हें बुला कर पूछताछ-घेराबंदी में हो रहे सवाल-जवाबों की मीडिया-रिसन का मतलब क्या है? क़ानून से बड़ा कोई नहीं है। राहुल गांधी तो कतई नहीं। होते तो मेहुल भाई की तरह कहीं निकल लिए होते। उनकी अलमारी में कुछ गड़बड़-सड़बड़ कंकाल पड़े होते तो नीरव भाई की तरह दफ़ा हो गए होते। उनकी गठरी में सेंधमारी से इकट्ठा किया माल होता तो विजय भाई की तरह कार्रवाई से दो दिन पहले आराम से खिसक लिए होते। बहुत-से हैं, जो क़ानून से बड़े हैं। वे किसानों को कुचल कर अब भी सीना ताने खड़े हैं। शरणागत को अभयदान भारत की प्राचीन परंपरा है। विश्व-गुरु बनने के लिए इस परंपरा का पालन अनिवार्य है। अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए हर तरह के छल-कपट का सहारा लेने की मिसालों से भी हमारा प्राचीन इतिहास भरा पड़ा है। सो, आज ऐसा करने के लिए भी आप किसी को कैसे दोष दे सकते हैं?

आठ साल से सब-कुछ चुपचाप अपने ऊपर से गुज़र जाने देने का जैसा सब्र भारतीय समाज ने दिखाया है, मुझे नहीं लगता कि दुनिया का कोई और समाज परोक्ष-अपरोक्ष दमन के दौरान इतना धैर्य दिखाता। लेकिन मुझे इस ख़ामोशी की बर्फ़ के नीचे बहते ताताचट लावे की धड़कन भी सुनाई दे रही है। लोग ख़ामोश हैं या ख़ामोशी ओढ़े हुए हैं? वे डरे हुए थे। यह डर पिघल रहा है। लेकिन लोग अभी भी सहमे हुए तो हैं। व्यवस्था सिर्फ़ सहमे हुए ज़खीरे से चौकन्नी रहती है। उसे पूरी तरह भयभीत जमावड़े से ही चैन मिलता है। इसलिए नए सिरे से भय फैलाने के आदिम तरीके भी अपनाए जा रहे हैं और आधुनिक तरीके भी। सो, हर सामाजिक-राजनीतिक प्रतिमा को खंडित किया जा रहा है। माहौल बनाया जा रहा है कि जब उन्हें नहीं छोड़ा तो तुम तो चीज़ क्या हो?

जिन्हें लगता है कि भय राजकाज चलाने की कुंजी है, उन्होंने इतिहास या तो पढ़ा नहीं या वे उसकी यादों को अपनी पेशानी से झटक देने में लगे हैं। राजा को राजदंड इसलिए नहीं सौंपा जाता है कि वह उसे बनैटी की तरह घुमाता घूमता फिरे। राजदंड प्रतीक है। राज तो स्नेह-बंधन से ही चलता है। लोकप्रियता का पैमाना सोशल मीडिया के अनुयाइयों की तादाद नहीं होती है। लोकप्रियता बाज़ार-प्रबंधन का विषय नहीं है। लोकप्रियता तिकड़मों से हासिल नहीं की जा सकती। लोक-भावना साथ जुड़े तो कोई लोक-प्रिय होता है। डंडे के ज़ोर पर फ़र्शी सलामियां जुटा लेना अलग बात है, लोग श्रद्धानत हों, यह एकदम दूसरी बात है। इसीलिए जवाहरलाल नेहरू और नरेंद्र भाई मोदी में फ़र्क़ है। और-तो-और, इसीलिए अटलबिहारी वाजपेयी और नरेंद्र भाई में अंतर है। इस खाई को पाटने के लिए जितनी मशक़्कत की ज़रूरत है, वह नरेंद्र भाई के वश की बात नहीं। सो, सामूहिक चुप्पी के टूटने का इंतज़ार कीजिए। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया और ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर के संपादक हैं )

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

Leave a comment

Your email address will not be published.

3 + fourteen =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
श्वेत पत्र जारी हो
श्वेत पत्र जारी हो