nayaindia Narendra modi rahul gandhi नरेंद्र भाई के बरामदे से राहुल की ड्योढ़ी तक
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नरेंद्र भाई के बरामदे से राहुल की ड्योढ़ी तक

जिन्हें लगता है कि नरेंद्र भाई देवदूत हैं और उन्होंने आठ बरस में भारत को विश्वगुरु बना दिया है, उन्हें इस भाव से भीगने का हक़ है। वे भीगते रहें। लेकिन अगर मुझे लगता है कि हमारे प्रधानमंत्री नर-इंद्र नहीं, सामान्य मनुष्य हैं और आठ साल में उन के हाथों कई ग़लतियां हुई हैं तो उन तथ्यों को उजागर करने का हक़ मुझे भी मिलना चाहिए।

बहुत से मित्र-परिचित मुझ से कहते हैं कि सार्वजनिक तौर पर आप कहने को कुछ भी कहते हों, लेकिन ईमानदारी से बताइए कि क्या आप को सचमुच लगता है कि 2024 में केंद्र से भारतीय जनता पार्टी की सरकार बेदख़ल हो जाएगी? यह भी कि क्या आप को दूर-दूर तक ऐसी कोई संभावना नज़र आती है कि दो बरस बाद केंद्र में कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार बैठी होगी और राहुल गांधी उस के मुखिया होंगे? मेरे शुभचिंतक मुझे यह भी उलाहना देते हैं कि मैं नरेंद्र भाई मोदी, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नाहक ही इतनी आलोचना क्यों करता हूं?

मैं जानता हूं कि ये सवाल मुझ से क्यों किए जाते हैं। लोगों को लगता है कि मैं अपने लेखों में, टेलीविजन बहसों में, अपने ट्वीट में और सोशल मीडिया के दूसरे मंचों पर अपनी टिप्पणियों में कांग्रेस और राहुल गांधी की तरफ़दारी शायद इसलिए करता हूं कि मुझे लग रहा है कि अब तो केंद्र में कांग्रेस की सरकार बस बनने ही वाली है और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना ही समझो। सो, मोटी बुद्धिधारी इस के अलावा और क्या सोच सकते हैं कि मैं जानीबूझी चाटुकारिता में लगा हूं।

सोशल मीडिया पर मेरी टिप्पणियों के जवाब में मेरे लिए असामाजिक, असभ्य और गालीगलौज भरी भाषा का इस्तेमाल करने वालों की भी ठीक-ठाक तादाद है। उन में से कभी-कभार किसी-किसी को जवाब देना ज़रूरी हो जाता है तो दे देता हूं, लेकिन आमतौर पर इसलिए ख़़ामोशी बरतता हूं कि मुझे लगता है कि जो जहां भी है, वतन के काम पर है। जिन्हें लगता है कि नरेंद्र भाई देवदूत हैं और उन्होंने आठ बरस में भारत को विश्वगुरु बना दिया है, उन्हें इस भाव से भीगने का हक़ है। वे भीगते रहें। लेकिन अगर मुझे लगता है कि हमारे प्रधानमंत्री नर-इंद्र नहीं, सामान्य मनुष्य हैं और आठ साल में उन के हाथों कई ग़लतियां हुई हैं तो उन तथ्यों को उजागर करने का हक़ मुझे भी मिलना चाहिए।

नरेंद्र भाई मोदी की, भाजपा की और संघ-कुनबे की नाहक आलोचना मैं ने कभी नहीं की। जब भी कुछ लिखा-कहा, नीतियों के बारे में, कार्यशैली के बारे में और सोच के बारे में लिखा-कहा। मुझे लगता है कि नरेंद्र भाई बेहद मेहनती हैं, उन में ग़ज़ब की ऊर्जा है, उन के पास हिलोरें मारता जज़्बा है और वे ऊपर से टपक कर नहीं, सियासी कोल्हू में जुत कर रायसीना की पहाड़ी पर पहुंचे हैं। लेकिन यह भी तो है कि उन का परिश्रम आमतौर पर नकारात्मक लक्ष्यों के लिए है; उन की ऊर्जा से देश जुड़ा कम, टूटा ज़्यादा है; उन के जज़्बे ने देशवासियों की मुसीबतें फ़ना करने के बजाय उन्हें और घना कर दिया है; और, उन्हें जन्म देने वाला राजनीतिक कोल्हू तो लगता है कि उलटे फेरे लगाने के लिए डिज़ाइन किया गया था।

सो, नरेंद्र भाई के प्रशंसकों को भले ही उन में गुण-ही-गुण नज़र आते हों, मगर बावजूद इस के कि कुछ गुण उन में हैं, देश-दुनिया में उन के निजी व्यक्तित्व की छाप तीन तार की चाशनी इसलिए नहीं बन पाई है कि वे अक्खड़ हैं; कि वे स्वकेंद्रित हैं, कि वे आत्म-मुग्ध हैं, कि उन में सर्वज्ञाता-भाव है। मुझे नहीं लगता कि नरेंद्र भाई ने संघ-साहित्य के अलावा कुछ ज़्यादा पढ़ा है। हिंदू धर्म ग्रंथों के उन के अध्ययन को ले कर भी मैं ज़्यादा आशान्वित नहीं हूं। बाकी धर्मों के अध्ययन का तो उन्हें शायद ही समय मिला हो। आठ साल में दिए उन के उद्बोधनों से मुझे तो लगता है कि विभिन्न धर्मों के बारे में उन की समझ एकांगी, सतही और प्रतिस्पर्धी लगती है।

भारतीय और विश्व साहित्य के बारे में नरेंद्र भाई कितना जानते हैं, कौन जानता है? साहित्यिक कृतियों ने देश-दुनिया के राजनीतिकों की अर्थवान दृष्टि विकसित करने में महती भूमिका अदा की है। साहित्य, संगीत और संस्कृति की थोड़ी-बहुत समझ रखने वाले बेहतर राजनीतिक साबित होते हैं। वे संकीर्णता के जाल से काफी-कुछ मुक्त हो जाते हैं, उन का दिल दूसरों से बड़ा हो जाता है और उन में समदर्शी-भाव के अंकुर आकार ले लेते हैं। इसलिए मुझे लगता है कि अगर नरेंद्र भाई अपना थोड़ा-सा अटलबिहारी वाजपेयीकरण कर लें तो उन की सकल-स्वीकार्यता का सूचकांक तीसरी पायदान से ऊपर बढ़ने की संभावना बन जाएगी। लेकिन मैं जानता हूं कि ऐसा करना उन के इस जन्म के प्रारब्ध में नहीं है। शुरू में, ख़ासकर संघ ने और कुछ-कुछ भाजपा ने भी, अपने हाथ-पैर पटके थे, लेकिन पिछले छह-सात साल में दोनों की पूरी तरह नरेंद्रीकरण हो गया है, इसलिए इन सभी से मेरे भीतर की बुनियादी असहमति और धारदार ही होती जा रही है।

अब इस पर आइए कि मैं कांग्रेस और राहुल का गुणगान क्यों करता हूं? कांग्रेस का इसलिए करता हूं कि वह मोशा-युग में वैकल्पिक विचार की सब से प्रमुख धुरी है और वह नहीं होगी तो लोकतंत्र के कुम्हारों का चक्का किस पर घूमेगा? कांग्रेस इसलिए अब और भी ज़रूरी है कि वह भरतखंड के चिरंतन विचारों की राह पर चलने का काम कर रही है। इस शाश्वत विचार से विलग हो कर भारत जीवित कैसे रहेगा? सो, भारत की धड़कनों को कायम रखने के लिए कांग्रेस की सांसों का चलते रहना अनिवार्य है। ठीक है कि कांग्रेस हांफ रही है, ठीक है कि उसे अपनी कई ख़ामियों को दुरुस्त करने की ज़रूरत है, मगर उसे मुमुक्षु भवन में छोड़ कर जाने का पाप कोई कैसे कर सकता है?

रही राहुल की बात तो राहुल को भले ही मैं ठीक से नहीं जानता हूं, लेकिन इतना जानता हूं कि वे वैचारिक मक्कारी में विश्वास नहीं रखते हैं, वे राजनीतिक लंपटता में भरोसा नहीं करते हैं और वे सत्ता हासिल करने के साधनों की शुचिता का समूचा चीरहरण करने के हामी नहीं हैं। इसलिए उन का रास्ता ज़रा लंबा हो गया है। लेकिन हो गया है तो हो गया है। इस रास्ते को छोटा करने के लिए जिस दिन वे अपने सियासी सतीत्व का सौदा करेंगे, उस दिन यह तय हो जाएगा कि वे अब कभी भारत के प्रधानमंत्री नहीं बन पाएंगे। मैं ने एक बार नहीं, दर्जनों बार लिख-बोल कर कहा है कि राहुल को अपनी कार्यशैली में कई संशोधन करने की ज़रूरत है। बावजूद इस के कि वे ऐसा नहीं कर रहे हैं, मैं इसलिए उन के कसीदे पढ़ता हूं कि वे जैसे भी हैं, कांग्रेस के लिए ज़रूरी हैं, क्योंकि उन-सा भी कांग्रेस के पास कोई और नहीं है।

जिन्हें लगता है कि मैं किसी पर अपनी भांडगिरी के फूल बरसा रहा हूं और किसी और पर नुकीले ढेलों की अनावश्यक बरसात कर रहा हूं, उन से मैं निवेदन करना चाहता हूं कि दोस्तियां मैं रखता हूं, निभाता हूं, लेकिन ‘ना काहू से बैर’ को शुरू से अपने जीवन का बीज-मंत्र मानता हूं। मैं जानता हूं कि जो मुझे नहीं जानते हैं, उन के गले यह बात नहीं उतरेगी। न उतरे! जो है, सो है। भारतमाता के मस्तक पर बैठ कर जो ग़लत कर रहे हैं, वे भी जानते हैं कि वे ग़लत कर रहे हैं। ग़लतियों का ज़िक्र तो ज़रूरी है – उन की ही नहीं, सब की। इसीलिए अपना यह हाल है कि नरेंद्र भाई के बजरंगी मुझे परे धकेलते हैं और राहुल के द्वारपाल मुझे गले लगाते नहीं। (लेखक न्यूज़ व्यूज इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

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