रक्षा सौदों में असहमति जताने की सजा नौसेना अध्यक्ष भागवत ने भुगती..!

असहमति जताने के मूल अधिकार को सर्वोच्च न्यायालय आज अत्यंत महत्वपूर्ण निरूपित कर रहा हैं , परंतु क्या यह अधिकार सिर्फ जनता के चुने प्रतिनिधियों को ही हैं ? अथवा यह सभी नागरिकों और अधिकारियों को भी हैं ?

यह सवाल इसलिए आज महत्वपूर्ण हो गया ,चूंकि एड्मिरल भागवत को तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फेर्नांडीस के निर्देश नहीं मानने के आरोप में बर्खास्त किया गया था ! शायद यह विश्व के सैनिक इतिहास की पहली घटना थी जिसमें एक लोकतान्त्रिक देश में सेना के एक सर्वोच्च अधिकारी को अपमानजनक तरीके से हटाया गया था !

आज इस घटना का ज़िक्र इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता हैं की जार्ज फर्नांडीस की सहयोगी तथा एक आईएएस अधिकारी की पत्नी जया जेटली को सीबीआई की न्यू दिल्ली कोर्ट ने नौसेना के लिए थर्मल इमेजर की खरीद में घोटाले के लिए जया जेटली और मेजर जनरल {अवकाश प्राप्त } एस पी मुरगाई और तत्कालीन जनता पार्टी के नेता गोपाल पचेरवाल को रिश्वत खोरी के जुर्म में अपराधी घोषित किया हैं। 20 वर्ष पूर्व हुए इस घोटाले के समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपायी की सरकार थी , जिसमें आडवाणी जी आदि समेत कई लोग सदस्य थे। कहते हैं की यदि पाप किया गया हैं ,तो वह कभी भी ना कभी उभर कर आता हैं। यह बात आज हो रहे पापो और अनियमितताओ पर भी लागू होगा। ऐसा नैसर्गिक न्याय कहता हैं !

समझा जाता हैं की की तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारयनन ने भी उस समय सरकार की सिफ़ारिश पर पुंहविचर करने की सलाह दी थी। परंतु जार्ज के उग्र स्वभाव को लेकर प्रधान मंत्री अटल जी सरकार के बहुमत को ख्याल रखते हुए , मजबूर हो गए थे। एवं उन्होने राष्ट्रपति से एड्मिरल विष्णु भागवत को बर्खास्त करने का आदेश सेनाओ के सुप्रीम कमांडर की हैसियता से नौसेना एक्ट के तहत जारी किया ! आपातकाल में रेल की पटरियो को डायनामाइट से उड़ाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। केंद्र में गैर काँग्रेस सरकार के गठन के पश्चात उस मामले को सरकार ने वापस ले लिया ! उनके सभी साथी भी छोड़ दिये गए। इतना ही नहीं जॉर्ज की रेल्वे मेंस फेडरेशन के साथी जो इस मामले में अभियुक्त थे वे भी सममानपूर्वक रिहा कर दिये गए।

भागवत की बर्खास्तगी के मामले में प्रैस द्वरा बार कारण या दोष पूछे जाने पर रक्षा मंत्री का जवाब यही रहा था कि वे सरकार के निर्देशों का पालन नहीं करते थे , उनको मानने में ताल मटोल करते थे ! जब भागवत जी से घटना के काफी समय बाद भी बर्खास्तगी का कारण पूछा गया तो उनका उत्तर था की मैं अपने पद की शपथ और मर्यादा का उलंघन नहीं कर सकता। यानहा तक की जब उन्होने अपनी बर्खास्तगी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी , थी , तब भी सरकार की ओर से कहा गया था कि निष्कासन के कारणो का सार्वजनिक क्या जाना -देश की सुरक्षा के लिए उचित नहीं। परिणाम सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के बारे में भागवत से कोई पूछताछ भी नहीं की !

आज बीस साल बाद सीबीआई कोर्ट ने जॉर्ज की सहयोगी जया जेटली और उनके दो साथियो को रक्षा सौदो की खरीद में घोटाले का अपराधी माना ! यह मुकदमा राजीव गांधी के समय के बोफोर्स तोप की खरीदी और मोदी सरकार द्वरा फ्रांस से राफेल विमानो की खरीद की गूंज के साये में आया हैं। हो सकता हैं की भविष्य में इनकी जांच में भी कोई नया गुल खिले !

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