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मोहल्ले के दंबगों को सीखाएं सबक़

स्थानीय निवासी ऐसे ‘नेताओं’ के झूठे दावों को सच मान कर उन्हें वास्तव में किसी बड़े दल का नेता मान लेते हैं। ऐसे आत्मघोषित नेताओं द्वारा नियमों और क़ानूनो की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाना उनके राजनैतिक रुतबे का हिस्सा मान लिया जाता है। ऐसा व्यक्ति जिस राजनैतिक दल का नेता होने का दावा करता है, यदि वो दल सत्ता में हो तो सोने पे सुहागा।

नोएडा की एक बहुमंज़िला सोसाइटी में एक राजनैतिक दल के नेता की दबंगाई पर पिछले हफ़्ते काफ़ी बवाल मचा। ऐसे दबंग हर गली मोहल्ले में पाए जाते हैं। परंतु स्थानीय निवासी उनके दबदबे के आगे मौन रह जाते हैं। कोई भी नागरिक फ़िज़ूल के बवाल में नहीं उलझना चाहता। स्थानीय निवासी ऐसे ‘नेताओं’ के झूठे दावों को सच मान कर उन्हें वास्तव में किसी बड़े दल का नेता मान लेते हैं। ऐसे आत्मघोषित नेताओं द्वारा नियमों और क़ानूनों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाना उनके राजनैतिक रुतबे का हिस्सा मान लिया जाता है। ऐसा व्यक्ति जिस राजनैतिक दल का नेता होने का दावा करता है, यदि वो दल सत्ता में हो तो सोने पे सुहागा।

वर्षों से श्रीकांत त्यागी ने खुद को सत्तारूढ़ दल का नेता बता कर इस बात का फ़ायदा उठाया और सोसाइटी के लोगों को परेशान करता रहा। सोसाइटी के निवासियों की माने तो वहाँ के सुरक्षाकर्मियों से त्यागी की आए दिन झड़प होती रहती थी। कभी-कभी हाथापाई भी होती थी। परंतु मामले ने तूल तब पकड़ा जब उसी सोसाइटी की निवासी एक जागरूक महिला ने हिम्मत दिखाई और त्यागी के तीन साल पुराने ग़ैरक़ानूनी अतिक्रमण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। इस पर त्यागी बौखला गया और उसने इस महिला से काफ़ी बदसलूकी की। जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। फिर तो टीवी के राष्ट्रीय चैनलों ने भी मामले को तूल दे दिया। नतीजन उस महिला से बदतमीज़ी करना त्यागी को बहुत भारी पड़ा। उसके विरुद्ध स्थानीय थाने में केस दर्ज हो गया।

तीन-चार दिनों की आँख मिचौली के बाद आख़िरकार पुलिस ने त्यागी को मेरठ से गिरफ़्तार कर लिया। इस विवाद में सत्तारूढ़ दल भाजपा का त्यागी से फ़ौरन पल्ला झाड़ना और फिर त्यागी के ग़ैरक़ानूनी अतिक्रमण पर सरकारी बुलडोज़र का चलना ऐसा संदेश हैं जो त्यागी जैसे सैंकड़ों स्वघोषित नेताओं पर भविष्य में शायद लगाम कसेगा।

सवाल उठता है कि चाहे अपनी गाड़ी पर झंडा लगाकर किसी राजनैतिक दल का प्रचार करना हो या अपने मोहल्ले में अपनी दबंगाई का दिखावा करना हो, क्या इन लोगों को इस बात की छूट उनका राजनैतिक दल देता है? जवाब है नहीं, कोई भी दल इस बात अनुमति नहीं देता कि उसके कार्यकर्ता आम लोगों से बदतमीज़ी करें। दरअसल ये असामाजिक तत्व हैं जो राजनीति की खाल ओढ़ लेते हैं। पर ये थाली के बैंगन ही होते हैं और मौक़ा देखते ही अपना दल बदल लेते हैं। इनका मक़सद राजनीति का चोला ओढ़ कर गुंडागर्दी से केवल पैसा कमाना होता है। तभी तो ऐसे स्वघोषित नेता अपने पैसे से वो सब दिखावा कर लेते हैं जिससे सामने वाले को यह यक़ीन हो जाता है कि इसके राजनैतिक रिश्ते बहुत ऊपर तक हैं। त्यागी ने पुलिस को दिए अपने बयान में बताया है कि अपनी हर गाड़ी पर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का वीआईपी पंजीकरण नम्बर लेने के लिए ही उसने लाखों रुपए खर्च किए।

हालाँकि त्यागी के मामले में भाजपा के पल्ला झाड़ने के बावजूद इस दल के शीर्ष नेताओं के साथ त्यागी के फ़ोटो भी सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में हैं। इन तस्वीरों को लेकर विपक्ष भी भाजपा को घेरने में जुटा है। जब तक त्यागी की गिरफ़्तारी नहीं हुई थी, तब तक विपक्षी नेता नोएडा पुलिस और प्रशासन द्वारा की गई कार्यवाही को महज़ दिखावा बता रहे थे।  दरअसल ये  स्वघोषित नेता अपनी दबंगाई के चलते स्थानीय पुलिस और प्रशासन को भी क़ाबू में रखते हैं। ज़ाहिर है इसमें धनलक्ष्मी की भी ख़ास भूमिका रहती है। जिससे पुलिसकर्मी और प्रशासन इनके प्रभाव में रहता है। नतीजतन स्थानीय लोगों को परेशान करने का हर ज़िले में एक पूरा तंत्र व्यवस्थित है। जिसमें और रंग जमाने के लिये ये आत्मघोषित नेता अपने दल के बड़े-बड़े नेताओं के करीबी होने का प्रदर्शन करने के लिए उनको हर मौक़े पर बधाई देने वाले होर्डिंग लगवाते हैं। जिनकी कोई अनुमति स्थानीय शासन से नहीं लीं जाती। इन पर ये अपने भी फ़ोटो लगवाते रहते हैं। या फिर उन नेताओं के सम्मान में अपने खर्च पर जलसे भी करवाते रहते हैं। जिसका फिर ये खूब नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं।

राजमार्गों पर टोल बूथ के कर्मचारी हों या किसी सोसाइटी के गार्ड, इन नेताओं की गाड़ी को नियम और क़ानून का पालन करने के लिए कहना इनको काफ़ी नागवार लगता है। नेता जी के साथ चलने वाले इनके चमचे इन ग़रीबों की काफ़ी अच्छी ख़ातिर करते हैं। ऐसे में इन कर्मचारियों का इनके दबाव के आगे झुकना एक सामान्य सी बात है। इसके विपरीत आचरणवाद के लिये आज देश भर में उस साहसी महिला की मिसाल दी जा रही है जिसने हिम्मत दिखाई और त्यागी और उसके झूठे रुतबे को धूल चटवाई।

मोटर वाहन अधिनियम के तहत केवल सरकारी वाहन पर ‘भारत सरकार’ या ‘प्रदेश सरकार’ लिखा जा सकता है। किसी भी निजी वाहन पर ‘प्रदेश सरकार’ या ‘भारत सरकार’ नहीं लिखा जा सकता। नोएडा पुलिस ने श्रीकांत त्यागी की कई महंगी गाड़ियाँ भी ज़ब्त की हैं। इनमें से एक गाड़ी पर ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से ‘उत्तर प्रदेश शासन’ का चिन्ह भी छपा है। क़ानून की इस अवहेलना पर भी त्यागी पर केस चलेगा। लेकिन उसकी सज़ा तो मामूली सा जुर्माना ही होगी। अच्छा तो यह हो कि एक मिसाल क़ायम करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को उस गाड़ी को ज़ब्त कर लेना चाहिए। वो भी उस अवधि की दुगनी अवधि तक जिस समय से त्यागी उसपर राज्य सरकार के चिन्ह गैरक़ानूनी रूप से इस्तेमाल कर रहा था।

नोएडा के त्यागी प्रकरण के बाद सोशल मीडिया पर देश भर से तमाम ऐसे और भी विडीयो चर्चा में आ रहे हैं जहां ऐसे स्वघोषित नेता या तो किसी गरीब पर या किसी प्रशासनिक व्यक्ति पर अपने रुतबे का आतंक दिखाते नज़र आ रहे हैं। इस बीमारी का एक ही इलाज है। जैसे उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने त्यागी मामले में किया वैसा ही योगी जी को हर ज़िले के अपने दल के ऐसे नेताओं के विरुद्ध करना चाहिये। इसी तरह अन्य प्रदेशों के मुख्य मंत्रियों को भी अपने शहरों में करना चाहिए।सार्वजनिक जीवन शुद्धि के इस अभियान से जनता के बीच एक सकारात्मक संदेश जाएगा कि कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो लेकिन कानून सब से ऊपर है। एक कहावत है कि यदि डाल पर दस पक्षी बैठे हैं और शिकारी एक पर निशान साधता है तो बाक़ी के नौ डर कर उड़ जाते हैं। नोएडा प्रकरण में योगी जी की इस पहल से ऐसा ही कुछ होने की आशा की जानी चाहिए। साथ ही इसका आम लोगों में भी एक संदेश जाएगा कि यदि कोई व्यक्ति त्यागी की तरह अपने राजनैतिक संबंधों का नाजायज़ फ़ायदा उठाए तो उसके ख़िलाफ़ आप आवाज़ ज़रूर उठाएँ। उसे सोशल मीडिया पर खूब वाईरल करें। इससे हर गली-मोहल्ले के इन आत्मघोषित नेताओं की खाल में छिपे गुंडों को सबक़ मिलेगा और जनता को उनकी दबंगाई से राहत।

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