‘नाथ’ कांग्रेस पर भारी ‘राजा’ की गैर राजनीतिक मुहिम..! - Naya India
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‘नाथ’ कांग्रेस पर भारी ‘राजा’ की गैर राजनीतिक मुहिम..!

पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में सदन में अपने सहयोगी विधायकों के साथ लगातार सक्रिय। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष होते हुए भी पीसीसी में पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि समारोह में नहीं पहुंचे.. बाद में कमलनाथ छिंदवाड़ा रवाना हो गए ..पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह गैर राजनीतिक मोर्चे पर आगे बढ़ते हुए रतलाम किसान महापंचायत में नजर आए.. अपने वादे के अनुरूप ना उन्होंने किसानों के साथ मंच साझा किया और ना ही कोई राजनैतिक बयान दिया.. महापंचायत के सामने तने पंडाल में दिग्विजय सिंह के साथ विधायक और आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव भी नजर आए।

विधानसभा सत्र से दूरी बनाते हुए कांतिलाल ने किसानों की लड़ाई के साथ दिग्विजय सिंह के प्रति निष्ठा और समर्पण जताते हुए उनकी गैर राजनीतिक मुहिम के लिए कदम ताल किया.. किसानों की लड़ाई कांग्रेस द्वारा मध्यप्रदेश में लड़ी जाए और उसका हिस्सा अरुण यादव नहीं बने इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती.. कांग्रेस ने भले ही इस चेहरे का इस किसान आंदोलन में अभी तक अरुण यादव का न तो बेहतर उपयोग किया और ना ही उन्हें फ्री हैंड दिया ..लेकिन किसानों की लड़ाई के लिए अरुण यादव भी गैर राजनीतिक मोर्चे का हौसला बढ़ाने के लिए रतलाम जा पहुंचे.. कांग्रेस की राजनीति में सबसे बड़ा अनुभवी ओबीसी चेहरा अरुण यादव जो एक बार फिर कमलनाथ के उत्तराधिकारी के तौर पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के दावेदार है।

जो शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ बुधनी से पिछला विधानसभा चुनाव हारने से पहले नंदकुमार सिंह चौहान से खंडवा लोकसभा का चुनाव भी हार चुके.. बावजूद इसके अरुण यादव के एक बार सिर्फ खंडवा लोक सभा उप चुनाव लड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.. इस उपचुनाव में अरुण यादव के लिए लगातार चुनाव हारने के बावजूद दो बड़े विकल्प जरूर खोल दिए.. पहला लोकसभा उप चुनाव जो उनके लिए ज्यादा बेहतर विकल्प साबित हो सकता है.. तो सवाल क्या कमलनाथ के उत्तराधिकारी के तौर पर वो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की उस कुर्सी की दौड़ से वह बाहर हो जाएंगे.. जो कभी उन्हें कमलनाथ के लिए छोड़ना पड़ी थी.. फिलहाल अरुण यादव यदि चर्चा में है तो उसकी वजह है प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के उस फैसले का सैद्धांतिक विरोध जिसमें उन्होंने नाथूराम गोडसे की आरती उतारने वाले बाबूलाल चौरसिया के कांग्रेस में प्रवेश पर में सिर्फ आपत्ति दर्ज कराई और एक बहस पार्टी के अंदर छेड़ दी थी।

अरुण यादव उन दिग्गी राजा के साथ किसानों को समर्थन देने पहुंचे.. जिन्होंने बाबूलाल चौरसिया कौन वह नहीं जानते का बयान देकर कमलनाथ के फैसले से जुड़े मामले पर अनभिज्ञता जाहिर की थी.. सवाल क्या कमलनाथ की नाराजगी के बावजूद अरुण यादव को दिग्विजय सिंह का साथ मिलेगा.. जब नए प्रदेश अध्यक्ष की तलाश शुरू होगी.. किसान महापंचायत का जो सिलसिला मध्यप्रदेश में देर से ही सही शुरू हुआ उसे दिग्विजय सिंह ने मंच वाला माइक से दूरी बनाकर एक नई दिशा दी.. तो आखिर इसके पीछे उनकी अपनी भी कोई ना कोई रणनीति जरूर होगी ..सवाल क्या दिग्विजय सिंह सिर्फ मध्यप्रदेश में किसानों को आगे रखकर कांग्रेस को मजबूती दे रहे या फिर यह साबित कर रहे की प्रदेश अध्यक्ष कमल नाथ और उनकी कांग्रेस जो काम अभी तक कर देना चाहिए वह नहीं कर पाए.. शिवराज सरकार के मंत्री विश्वास सारंग तो यह कहकर चुटकी लेने में बाज नहीं आए कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस को किसानों का समर्थन नहीं इसलिए दिग्विजय कांग्रेस को आंदोलनकारी किसानों की शरण में गैर राजनीतिक मुहिम के जरिए जाना पड़ा।

सारंग द्वारा खड़े किए गए सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि कमलनाथ के प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष रहते किसान ना तो आंदोलन के लिए सड़क पर उतरे न ही इतनी एकजुटता उनके बीच नजर आई जो आंदोलनकारी किसानों की ताकत बन पाते.. अब जब आंदोलनकारी किसानों के नेता दिल्ली बॉर्डर छोड़कर राज्यों में किसानों को भरोसे में ले रहे तब कांग्रेस उन्हें समर्थन दे रही.. रतलाम के जिस मंच पर किसान नेता गुरनाम सिंह और उसके सामने दिग्विजय सिंह मौजूद थे वहां प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमल नाथ की गैरमौजूदगी भी कांग्रेस के इंटरनल पॉलिटिक्स पर सवाल जरूर खड़े करती है… आखिर क्या वजह है कि आंदोलनकारी किसानों के पहले प्रदर्शन में कमलनाथ नहीं पहुंचे.. यदि उनकी प्राथमिकता विधानसभा का फ्लोर थी तो फिर कुछ घंटे बाद उन्होंने छिंदवाड़ा का रुख कर आखिर क्या संदेश दिया.. क्या कमलनाथ समझ गए कि यदि प्रदेश अध्यक्ष रहते वह किसानों के मंच के नीचे नजर आए तो फिर पार्टी के अंदर ही उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए जाएंगे।

सवाल तो प्रदेश कांग्रेस दफ्तर में पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में जिम्मेदार नेताओं की गैरमौजूदगी भी खड़े कर गई.. यहां पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी सबसे बड़ा चेहरा बनकर नजर आए.. जिन्हें प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण नेता के तौर पर क्षत्रिय नेताओं का विरोधी माना जाता है.. जिन्होंने रतलाम जाने की बजाए संगठन कार्यालय और वहां आयोजित कार्यक्रम को प्राथमिकता दी.. प्रदेश कांग्रेस और उसके नेताओं की राजनीति और गैर राजनीतिक मुहिम के बीच पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह भी अपने एक नए बयान के कारण चर्चा में आ गए.. जिन्होंने पिछले दिनों कमलनाथ के विंध्य दौरे के दौरान मंच साझा किया था.. अजय सिंह राज्यसभा सांसद विवेक तंखा के बाद मध्य प्रदेश के दूसरे नेता है जिन्होंने G 23में शामिल नेताओं के साथ हस्ताक्षर कर कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र की मुहिम को आगे बढ़ाया था.. अजय सिंह ने इस बार फिर चुप्पी तोड़ते हुए अपना नजरिया स्पष्ट कर दिया.. अजय सिंह का कहना है कि जिस पत्र में उन लोगों ने हस्ताक्षर किए थे वह पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र के लिए था.. और मैं उस बात के साथ आज भी खड़ा हूं ..लेकिन बाकी जो बातें हैं वह दूसरे नेताओं की निजी राय है।

मध्य प्रदेश की राजनीति से जुड़े अजय सिंह ने सोनिया गांधी के नेतृत्व पर भरोसा जताते हुए कहीं ना कहीं हस्ताक्षर करने वाले उन नेताओं से दूरी भी बना ली.. जो वीरप्पा मोइली और सलमान खुर्शीद जैसे नेताओं के निशाने पर आ चुके हैं.. चाहे फिर वह आनंद शर्मा से लेकर गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल ही क्यों ना हो.. तो सवाल क्या अजय सिंह ने सोनिया गांधी पर भरोसा जताकर हस्ताक्षर मुहिम से मुद्दा आधारित ही सही दूरी बना कर 10 जनपद के भरोसे ही प्रदेश अध्यक्ष के अपने दावे को और पुख्ता किया है.. तो क्या आने वाले समय में अजय सिंह खुलकर राहुल गांधी के समर्थन में आगे आएंगे… कांग्रेस अध्यक्ष के लिए कमलनाथ के उत्तराधिकारी के द्वार पर अरुण यादव, अजय सिंह जैसे जो नाम चर्चा में है ..क्या दिग्विजय सिंह गैर राजनीतिक मुहिम इन दोनों के दावों पर भारी पड़ेगी.. यह सवाल इसलिए यदि नगरी निकाय चुनाव के पहले किसान आंदोलन को पर्दे के पीछे दिग्विजय सिंह और उनके समर्थकों की मुहिम बड़ी ताकत साबित होती है.. तो फिर सवाल क्या राजा को नजरअंदाज करना राज्य और केंद्र दोनों नेतृत्व के लिए आसान नहीं होगा.. तो क्या सोनिया और कमलनाथ की पसंद बनकर अनुभवी दिग्विजय सिंह लंबे अरसे बाद ही सही प्रदेश कांग्रेस की एक बार फिर आने वाले समय में कमान संभालेंगे.. जो लगातार बदलती कांग्रेस में दिल्ली में अपने दखल का एहसास करा रहे तो प्रदेश में जनता के बीच जाकर लड़ाई का संदेश दे अपनी उपयोगिता साबित कर रहे।

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