‘नवंबर’ में लगेगा म.प्र कांग्रेस के कायाकल्प का ‘नंबर’..!

दिल्ली में कांग्रेस के अंदर मची उठापटक के बीच एक बार फिर मध्य प्रदेश चर्चा में आ चुका है। वजह कमलनाथ दिग्विजय सिंह के नेतृत्व के संकट पर दिए गए बयान,कांग्रेस कार्यसमिति ने सोनिया गांधी से अगली व्यवस्था होने तक अंतरिम अध्यक्ष बने रहने का अनुरोध किया.. जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है… पार्टी में सुधार को लेकर 23 नेताओं की चर्चित चिट्ठी के बारे में प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि पार्टी ने तय किया है कि अब हमें इसे भूलकर आगे की ओर बढ़ना है.. कांग्रेस नेतृत्व में बदलाव की मांग तब उठी जब बिहार, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज हो चुकी है.. तो मध्यप्रदेश में उपचुनाव कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की प्रतिष्ठा से जुड़ चुके हैं.. राजस्थान में सत्ता बचा लेने के बावजूद पार्टी के अंदर विवादित चिट्ठी चर्चा का विषय बनी हुई है.. इससे पहले मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार का तख्तापलट हो चुका है।

तो इससे पहले मध्यप्रदेश में कमलनाथ की सरकार रहते लोकसभा चुनाव में 29 में से सिर्फ 1 सीट कांग्रेस के खाते में आई थी.. उस वक्त भी राहुल गांधी के इस्तीफे के साथ लिखी गई चिट्ठी को लेकर पार्टी में बवाल मचा था.. कांग्रेस के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्वाचन से पहले सोनिया गांधी को संगठन में बदलाव के अधिकार कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने दे दिए.. समझा जा सकता है नए अध्यक्ष की सहमति के लिए राज्य से लेकर केंद्र तक संगठन में बदलाव सोनिया गांधी द्वारा किया जाएगा.. सोनिया ने खुद चिट्ठी पर आहत होने लेकिन परिवार का हिस्सा और उसे लोकतंत्र व्यवस्था से जोड़कर ज्यादा तूल नहीं दिया.. राहुल गांधी ने जरूर इस चिट्ठी की टाइमिंग पर सवाल खड़ा किया.. इस बहस में कई नेताओं के बयान, ट्विटर सफाई भी विवाद के साथ चर्चा का विषय बने ..अब जब पार्टी संविधान के तहत सामंजस्य बनाने की कोशिशें तेज हो गई है ..तब भी सवाल खड़ा होना लाजमी जिन्होंने चिट्ठी में हस्ताक्षर किए और उन्होंने जो सवाल खड़े किए अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी इस विवाद से कांग्रेस को कैसे बाहर निकालेगी।

राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय नेताओं के बीच मत भिन्नता की खबरों के साथ राज्यों की राजनीति में महत्वाकांक्षाओं के चलते नेताओं के बीच मनभेद से भी इनकार नहीं किया जा सकता.. ऐसे में सवाल मध्य प्रदेश को लेकर भी खड़ा होना लाजमी है.. क्योंकि केंद्रीय नेतृत्व ने जो दिलचस्पी सचिन पायलट और राजस्थान में दिखाई आखिर वह मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार के रहते ज्योतिरादित्य और उनकी बगावत के दौरान क्यों नहीं दिखाई .. कांग्रेस के नेतृत्व संकट पर कमलनाथ पूरी तरह से सोनिया गांधी के साथ खड़े नजर आए.. तो दिग्विजय सिंह ने सोनिया के नेतृत्व पर भरोसा जताते हुए बदलाव पर राहुल गांधी की पैरवी की.. ज्योतिरादित्य जिनकी गिनती कभी राहुल गांधी के भरोसेमंद नेताओं में होती रही.. उनके कांग्रेस छोड़कर जाने के बाद दिग्विजय सिंह को जब भी मौका मिलता भविष्य की कॉन्ग्रेस को राहुल के हाथ में सुरक्षित बताते रहे हैं.. राहुल गांधी ने भले ही कभी लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा दे दिया था ..लेकिन उस वक्त राज्य जिसमें मध्य प्रदेश भी शामिल किसी ने भी लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार की जिम्मेदारी नहीं ली थी ..यही नहीं प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व सिंधिया की बगावत रोकने में नाकामयाब रही।

कांग्रेस के सत्ता और संगठन के नीति निर्धारकों ने भी अपनी जवाबदेही का एहसास नहीं कराया ..मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा जिस तरह कमलनाथ को नेता प्रतिपक्ष से लेकर प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा जमाए रखने के लिए कोस रही उसे नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता.. कांग्रेस में बदलाव के नाम पर तत्कालीन प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया को हटाकर मुकुल वासनिक को मध्य प्रदेश सौंप दिया गया है.. इस दौरान राज्यसभा के लिए दिग्विजय सिंह निर्वाचित किए गए.. जो अब राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे.. जिन्हें केंद्र में पांच वरिष्ठ नेताओं की बनाई गई कमेटी का सदस्य बना दिया गया.. मध्यप्रदेश में दूसरे वरिष्ठ नेता सुरेश पचौरी.. अजय सिंह ,अरुण यादव की पूछ परख पहले ही कम हो चुकी है.. मध्य प्रदेश में नेतृत्व चाहे फिर सदन में नेता प्रतिपक्ष हो या फिर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर जोर आजमाइश के बीच कमलनाथ को नेता प्रतिपक्ष की अधिकृत जिम्मेदारी सौंपी जा चुकी है.. इस बीच मध्यप्रदेश में युवा नेतृत्व को लेकर नकुल नाथ से लेकर जयवर्धन सिंह जमावट भी खूब चर्चा का विषय बनी।

उधर जीतू पटवारी और कुणाल की जोड़ी भी भाजपा के खिलाफ सीधा मोर्चा खोलकर अपनी प्रभावी मौजूदगी दर्ज कराने में जुटे.. सवाल दिल्ली में मची उठापटक के बीच क्या आलाकमान की नजर मध्य प्रदेश पर पड़ेगी.. जहां सरकार गंवा देने के बाद भी कांग्रेस के विधायकों द्वारा इस्तीफे का सिलसिला पार्टी नेतृत्व के लिए चुनौती बन चुका है ..उपचुनाव की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ कुछ और कांग्रेस विधायकों के पार्टी छोड़कर जाने की चर्चा जोर पकड़ती रही है.. ऐसे में जब कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी मुकुल वासनिक मध्यप्रदेश में डेरा डालने को तैयार नहीं .. कमलनाथ दिग्विजय सिंह की जोड़ी पार्टी से बगावत नहीं रोक पा रहे ..तब सवाल राष्ट्रीय नेतृत्व मध्यप्रदेश में किस फार्मूले के तहत आगे बढ़ेगा.. क्या विधानसभा उपचुनाव के बाद मध्यप्रदेश के लिए कोई स्क्रिप्ट सोनिया गांधी द्वारा आगे बढ़ाई जाएगी ..या फिर कमलनाथ कांग्रेस में बदलाव की संभावनाएं खत्म मान ली जाए.. या फिर हाईकमान को उपचुनाव के परिणाम का इंतजार रहेगा।

यदि कांग्रेस सत्ता में लौटी तो कमलनाथ के नेतृत्व का डंका दिल्ली तक बजना तय.. लेकिन यदि कांग्रेस की करारी हार हुई तो फिर बड़े बदलाव से इनकार नहीं किया जा सकता.. सोनिया गांधी को अगले छह माह में जिन राज्यों में नए सिरे से संगठन को खड़ा करना उसमें मध्य प्रदेश किस शामिल होने से इनकार नहीं किया जा सकता.. क्योंकि कांग्रेस ने न सिर्फ मध्य प्रदेश में लोकसभा चुनाव में बड़ी मात खाई .. उसके बाद कांग्रेस की सरकार भी डेढ़ साल में ढेर हो गई ..यही नहीं कांग्रेस का उभरता युवा नेतृत्व ज्योतिरादित्य को भी पार्टी ने खो दिया… ऐसे में जब अनुभवी पुरानी पीढ़ी और वरिष्ठ नेताओं के जिम्मेदार नेतृत्व पर सवाल खड़ा हो चुका है.. युवा नेतृत्व को लेकर कांग्रेस में किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन पा रही।

तब राष्ट्रीय नेतृत्व का हस्तक्षेप लाजमी.. सवाल यदि सोनिया गांधी के बाद कांग्रेस का नेतृत्व राहुल गांधी को सोंपे जाने की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है ..तो क्या राहुल गांधी की पसंद के नेता मध्य प्रदेश के जिम्मेदार पदों पर नजर आएंगे.. तो ऐसे में वरिष्ठ नेताओं का क्या होगा.. जबकि दिग्विजय सिंह अगले 6 साल के लिए राज्यसभा में पहुंचकर केंद्रीय राजनीति में अपनी नई संभावनाएं टटोल रहे.. तो सवाल कमलनाथ उप चुनाव के बाद मुख्यमंत्री की शपथ लेंगे या फिर नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी निभाने का मानस बनाएंगे… कमलनाथ क्या प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ देंगे… नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष के पद पर कमलनाथ का उत्तराधिकारी कौन होगा.. इस पर अंतिम फैसला अब राष्ट्रीय नेतृत्व को करना होगा ..सवाल अंतरिम अध्यक्ष रहते सोनिया गांधी मध्यप्रदेश में कांग्रेस के कायाकल्प का इंतजार क्या नवंबर तक करेंगी ..जब उपचुनाव के परिणाम सामने आ चुके होंगे.. तो क्या यह मान लिया जाए नेतृत्व के संकट से जूझ रही कांग्रेस में मध्यप्रदेश में किसी बड़े बदलाव के लिए अभी लंबा इंतजार करना होगा.. जिसका नंबर कायाकल्प के लिए नवंबर में ही लगेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares