अब सुप्रीम कोर्ट तय करेगा फ्लोर टेस्ट

मध्यप्रदेश की राजनीति में इस समय अजीबोगरीब स्थिति है। आपस में नेताओं की मुलाकात हो रही है, लेकिन भरोसा टूटता जा रहा है। हरेक को संदेह की निगाहों से देखा जा रहा है।

यही कारण है कि राज्यपाल के निर्देशों के बावजूद सोमवार को विधानसभा में फ्लोर टेस्ट नहीं कराया गया और भाजपा सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे चली गई और अब सुप्रीम कोर्ट ही तय करेगा कि फ्लोर टेस्ट कब होगा। इस बीच राज्यपाल ने एक बार फिर मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर फ्लोर टेस्ट कराने के लिए निर्देशित किया है।

दरअसल जीवन का कोई भी क्षेत्र हो भरोसा सबसे ज्यादा जरूरी है खासकर जो जिम्मेदार पदों पर है उनका भरोसा बना रहना बहुत जरूरी है लेकिन इस समय मध्यप्रदेश में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे अधिकांश लोगों से भरोसा उठ चुका है। कोई किसी की बात सुनने को तैयार नहीं है। अनसुनी करने के बहाने ढूंढे जा रहे हैं लेकिन अभी भी व्यवस्था में कोर्ट ही एकमात्र विकल्प है जिसका आदेश सभी को मानना पड़ता है।
यही कारण है कि तमाम प्रयासों के बावजूद जब भाजपा मध्यप्रदेश विधानसभा में फ्लोर टेस्ट नहीं करा पाई तब वह सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर दस्तक दी है लेकिन कांग्रेस यहां भी अपना पक्ष रखेगी। भाजपा ने फिर से ज्ञापन दिया और राज्यपाल ने भी एक बार फिर मुख्यमंत्री को फ्लोर टेस्ट कराने के लिए आदेशित किया है। बहरहाल प्रदेश के दोनों ही दलों के लगभग 200 विधायक ना तो अपने घर पर रुक पा रहे हैं और ना ही अपने परिजनों से मिल पा रहे हैं, क्योंकि भाजपा और कांग्रेस ने अपने-अपने विधायकों को विभिन्न जगहों पर होटलों पर ठहराया हुआ है वहीं 22 बागी विधायक बेंगलुरु में डेरा डाले हुए हैं।

कर्नाटक की तरह ही मध्यप्रदेश का राजनीतिक घटनाक्रम आगे बढ़ रहा है। सोमवार को विधानसभा में फ्लोर टेस्ट नहीं होने के कारण मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सभी की निगाहें बजट सत्र की शुरुआत में राज्यपाल के अभिभाषण के बाद फ्लोर टेस्ट पर टिकी थी और जैसे ही राज्यपाल का अभिभाषण समाप्त हुआ नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने फ्लोर टेस्ट की मांग के समर्थन में राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री को लिखा पत्र पढ़ना शुरू किया तो कांग्रेस के सदस्यों ने हो हल्ला करना शुरू किया और वे विरोध करने लगे। तब नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने पत्र को जोर-जोर से पढ़ना शुरू किया और पूरा पत्र पढ़कर ही विधानसभा अध्यक्ष से फ्लोर टेस्ट कराने की मांग की। भार्गव की तेज आवाज में सत्ताधारी दल के सदस्यों की आवाज तो दब गई लेकिन विधानसभा अध्यक्ष नर्मदा प्रजापति पर इसका कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने व्यवस्था देते हुए कहा कि आपने जितनी भी बातें कही उसका सार केवल यही है कि यह पत्राचार राज्यपाल और सरकार के बीच हुआ है। मुझे इस तरह के आशय का कोई पत्र नहीं मिला और कोरोना का उल्लेख करते हुए विधानसभा की कार्रवाई 26 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी।

इसके बाद सत्ताधारी दल के सदस्य जोर-जोर से नारे लगाने लगे लेकिन विपक्षी दल भाजपा के सदस्यों ने निलंबन के डर से धैर्य धारण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और बात-बात पर खड़े होकर बोलने वाले भाजपा सदस्य चुपचाप सीट पर बैठे रहे और कोई उठने की कोशिश भी करता तो पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एवं नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव उन्हें बैठने का इशारा कर देते। थोड़ी देर में रणनीति बनाकर भाजपा विधायक राजभवन पहुंचे जहां 106 भाजपा विधायकों की परेड कराई गई और राज्यपाल को बताया गया कि सरकार बहुमत खो चुकी है इसके बावजूद फ्लोर टेस्ट नहीं करा रही। आपके आदेश की भी अवहेलना हो रही है।

प्रतिनिधिमंडल को राज्यपाल ने आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया है और शाम तक उसका असर भी दिखाई दिया जब राज्यपाल ने एक बार फिर मुख्यमंत्री कमलनाथ को सख्त लहजे में पत्र लिखकर मंगलवार को ही फ्लोर टेस्ट कराने का निर्देश दिया। पत्र मिलने के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ देर शाम राजभवन पहुंचे। राज्यपाल से मुलाकात के बाद मीडिया से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि बीजेपी सदन में अविश्वास प्रस्ताव हम बहुमत साबित कर देंगे। उन्होंने फिर दावा किया कि कांग्रेस की सरकार के पास बहुमत है। उन्होंने कहा कि वो राज्यपाल को अभिभाषण के लिए धन्यवाद देने आए थे।

कुल मिलाकर सत्ताधारी दल जहां इस उम्मीद में फ्लोर टेस्ट डालने की कोशिश कर रहा है कि कैसे भी बेंगलुरु के विधायक भोपाल आ जाएं या फिर कुछ भाजपा विधायक का समर्थन हासिल हो जाए जबकि भाजपा की रणनीति के अनुसार बेंगलुरु के विधायक फ्लोर टेस्ट हो जाने के बाद ही भोपाल आएंगे और पार्टी अति शीघ्र फ्लोर टेस्ट कराने के प्रयास में है। इसके लिए एक ओर जहां पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट की शरण में गया है वहीं प्रादेशिक नेतृत्व बार-बार राज्यपाल के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।

जाहिर है पिछले एक पखवाड़े में इतनी मुलाकात मुख्यमंत्री की विधायकों से, दोनों ही दलों के नेताओं की राज्यपाल से, अपने-अपने दल के राष्ट्रीय नेताओं से हुई है उतना ही अविश्वास का वातावरण बना है और अब सुप्रीम कोर्ट ही एकमात्र विकल्प बचा है जिसके सुप्रीम फैसले पर फ्लोर टेस्ट हो सकता है।

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