अब शिवराज, नरेंद्र, नरोत्तम, उमा के ‘सब्र’ का इंतिहान..

विधानसभा चुनाव परिणाम सामने आने के बाद सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और दूसरे सहयोगियों से विचार विमर्श के बाद राहुल गांधी ने कभी जिस ‘समय’ और ‘सब्र’ को कमलनाथ और ज्योतिरादित्य से जोड़कर सामने रखा था.. एक बार फिर वह प्रासंगिक है ..बस पार्टी और उसके नीति निर्धारकों के चेहरे बदल गए.. मोदी, शाह, नड्डा बीजेपी में ऐसा कोई संदेश घोषित तौर पर नहीं दिया गया

लेकिन फैसले बताते समय यदि ज्योतिरादित्य का अच्छा शुरू हो चुका है ..तो कई दूसरे नेताओं को सब्र का परिचय देना पड़ रहा है . पहले जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी तब सिंधिया को सब्र रखने को कहा गया था और उस वक्त कमलनाथ का अच्छा समय मुख्यमंत्री बनने के साथ शुरू हो गया था.. सवा साल बाद सरकार बदल गई..उसका मुखिया भी बदला यही.. नहीं सेनापति और उसके किरदार बदल जाने के साथ मायने ही बदल गए ..मुख्यमंत्री की शपथ लेने के साथ कमलनाथ की कार्यशैली उनका रसूख जिस तरह चर्चा का विषय बना था।

हालात बदले अब बीजेपी की सरकार के लौटने के साथ समय सिंधिया का शुरू हुआ जिनका सत्ता में दखल और वर्चस्व दिखाई भी देने लगा है.. सरकार बीजेपी की उसके नेता शिवराज लेकिन चर्चा बीजेपी में ‘अबकी बार सिंधिया सरकार’ की शुरू हो चुकी.. सरकार बदली किरदार बदले लेकिन बड़ा सवाल जस का तस.. कांग्रेस की तरह आस्थिरता के संकट से जूझ रही भाजपा सरकार भी अंतर्द्वंद से कब और कैसे बाहर निकलेगी.. कमलनाथ सरकार में जिस तरह दिग्विजय को सुपर सीएम माना गया… क्या शिवराज सरकार में भी ज्योतिरादित्य सुपर सीएम साबित होंगे…. उस वक्त कमलनाथ सरकार का केबीनेट विस्तार और सभी मंत्रियों को कैबिनेट का दर्जा …तो अब शिवराज सरकार में उप चुनाव लड़ने जा रहे लगभग सभी सिंधिया समर्थक पूर्व विधायकों को दिलाई गई मंत्री की शपथ .. सवाल खड़ा होता इस सरकार के लिए यह फैसला मजबूत या कमजोर कड़ी साबित होगी..शिवराज सरकार के 100 दिन पूरे होने के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों के बढ़ते कदम विरोधियों से ज्यादा भाजपा के पुराने नेताओं को भी चोंका रहे।

चाहे इसे मंत्रिमंडल विस्तार में उनके दबदबे से जोड़ कर देखा जाए या फिर विभाग वितरण को ले कर दिल्ली से लेकर भोपाल तक जारी कवायद… पब्लिक परसेप्शन भी यह बन चुका है कि सिद्धांत और विचारधारा की राजनीति करने वाली बीजेपी एडजस्टमेंट से आगे बड़े बदलाव को मजबूर है… सत्ता बचाने और चलाने के लिए समझौतों से जो हालात और धारणा बनी उसे राष्ट्रीय नेतृत्व की मंशा और उसका दूरगामी लक्ष्य माना जा रहा.. जो महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया को मजबूत देखना चाहते.. जिस पर किसी को एतराज भी नहीं होगा .. लेकिन यहीं पर सवाल खड़ा होता है क्या शिवराज को कमजोर साबित करने की भी कोशिश है जारी है।

ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है यदि संयम, धैर्य और सब्र की कसौटी पर खरा उतर कर दिखाने के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया का अच्छा समय शुरु हो गया.. तो क्या इसके साथ ही मुख्यमंत्री रहते शिवराज हो या फिर केंद्रीय मंत्री रहते नरेंद्र सिंह तोमर डिप्टी सीएम के दावेदार नरोत्तम मिश्रा और पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को अपने सब्र इम्तिहान देना होगा.. दिल्ली मैं बैठकर एक झटके में लिए गए कई बड़े फैसले भाजपा के मूल नेताओं के किस हद तक गले उतरेंगे .. नेता यदि समझौता कर भी लेते तो क्या गारंटी है कि उनके समर्थक कार्यकर्ता भी यह लाइन मानने को तैयार होंगे.. बड़ा सवाल भाजपा की मध्य प्रदेश की सत्ता में वापसी फिर भी सिंधिया फैक्टर के चलते उन महत्वपूर्ण नेताओं को जिन्होंने विचारधारा की लंबी लड़ाई लड़ी उन्हें अपने अच्छे दिन आने का एहसास कब और कैसे होगा।

शिवराज सिंह चौहान का अच्छा समय चौथी बार मुख्यमंत्री की शपथ लेने के साथ ही शुरू हो गया था.. जब तमाम चुनौतियों के बीच राष्ट्रीय नेतृत्व ने उनके अनुभव और वरिष्ठता को ध्यान में रखते हुए सरकार की कमान सौंप दी ..100 दिन का जश्न मनाने के साथ सामने आई केबिनेट ने इस बीच जरूर बदलती बीजेपी का एहसास कराया .. जब 24 विधानसभा सीटों पर फोकस बनता चला गया.. सारे महत्वपूर्ण फैसले इन सीटों पर भाजपा की जीत उपचुनाव में सुनिश्चित करने को लेकर लिए जाने लगे ..13 साल से ज्यादा के मुख्यमंत्री रह चुके चौहान ने अपनी इस नई पारी में सरकार बनाने का श्रेय ज्योतिरादित्य सिंधिया और इस्तीफा देकर आए उनके समर्थक विधायकों को दिया है .. भाजपा संगठन का मंच हो या फिर मीडिया के मार्फत भोपाल से लेकर दिल्ली के सभी जिम्मेदार नेताओं ने कार्यकर्ताओं को यही समझाने की कोशिश की कि सभी महाराज और उनके समर्थकों की स्वीकार्यता को लेकर अपना मानस बना ले ..कैबिनेट में कौन शामिल होगा .. किससे दूरी बनाई जाएगी.. मध्य प्रदेश की सत्ता और संगठन के शीर्ष नेतृत्व के बीच कई दौर के विचार विमर्श के बावजूद इसे दिल्ली दरबार में अंतिम रूप दिया गया.. लिए गए फैसलों से ज्यादा उसके तौर तरीके और अनावश्यक हस्तक्षेप और दिलचस्पी से यही धारणा बनी कि सरकार के लिए समझौते जरूरी है।

देश में गिने-चुने टॉप 10 भाजपा के शीर्ष नेताओं में शामिल शिवराज सिंह के कमजोर दिखने उन्हें कमजोर किए जाने या उन्हें कमजोर साबित करने की चर्चा बहस का मुद्दा बन गया.. फैसलों में लेट लतीफी के बावजूद शिवराज ने अपनी नाराजगी का एहसास नहीं होने दिया ..13 साल मुख्यमंत्री रहते चौहान ने जो पुण्याई कमाई और दूसरे नेताओं के मुकाबले अपनी लाइन आगे बढ़ाई और नई पहचान बनाई वह इस कार्यकाल में कसौटी पर लग गई.. सवाल खड़े किए जाने लगे क्या मुख्यमंत्री की विनम्रता को कमजोरी साबित किया जा रहा है ..या खुद बदलते राजनीतिक परिदृश्य में दूरदर्शी शिवराज ने पार्टी नेतृत्व और संगठन को सर्वोपरि मानते हुए सत्ता के अमृत मंथन में निकला सारा बिष खुद पीने का फैसला मजबूरी में लिया .. तो आखिर क्यों.. क्या शिवराज का सब्र रंग लाएगा यानी उपचुनाव के बाद यह सरकार स्थिर होकर उभरेगी.. आखिर शिवराज और महाराज की मजबूत नजर आने वाली केमिस्ट्री भाजपा की इंटरनल पॉलिटिक्स को कौन सी दिशा देगी।

शिवराज ने मुख्यमंत्री रहते मध्यप्रदेश में कोरोनाकाल में जो फैसले लिए उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. चाहे फिर वह बंद कर दी गई उनकी पूर्ववर्ती सरकार की योजनाएं नए सिरे से शुरू करना.. हितग्राहियों के खाते में पैसे जमा करना.. यही नहीं प्रवासी मजदूरों की सुध लेने के साथ कोरोना पीड़ितो के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार… फंड की समस्या नहीं आने के बावजूद इसके फैसलों की जमीनी हकीकत उनके क्रियान्वयन पर सवाल खड़े किए जा सकते ..लेकिन नीति और नियत पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करना आसान नहीं है.. जिन परिस्थितियों में यह सरकार अस्तित्व में आई उसके बाद बने माहौल में नई चुनौतियों से निपटना भाजपा के लिए किसी समस्या से कम नहीं… तो यह मानने वाले भी खूब मिल जाएंगे शिवराज के लिए उनके लंबे राजनीतिक जीवन यह पड़ाव उनके सियासी भविष्य के लिए किसी टर्निंग प्वाइंट से कम साबित नहीं होगा.. मध्य प्रदेश से लेकर केंद्रीय नेतृत्व में यदि उनके शुभचिंतक और मुरीद मौजूद तो बदलती बीजेपी में उनके प्रतिस्पर्धी और दिल दिमाग में रखने वाले नेताओं की कमी नहीं.. 24 विधानसभा सीट के उपचुनाव के परिणाम कई दूसरे नेताओं के साथ शिवराज के लिए भी इस बार कुछ अलग मायने रखते.. जिनमें चुनाव जिताने का माद्दा रखने का राष्ट्रीय नेतृत्व कई बार स्वीकार कर चुका है।

मोदी कैबिनेट में लगातार दूसरी पारी खेल रहे नरेंद्र सिंह तोमर का भले ही अच्छा समय चल रहा.. जो राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी जिम्मेदारी भी निभा रहे ..लेकिन उनके अपने क्षेत्र ग्वालियर चंबल से लेकर गृह प्रदेश में बदलते हालात ने उन्हें भी सब्र, संयम और धैर्य की कसौटी पर खरा उतरने को मजबूर कर दिया है.. कभी प्रदेश अध्यक्ष रहते जिस भाजपा को बहुत करीब से देखा उसमें आए अचानक इतने बदलाव की कल्पना तो उन्होंने भी नहीं की होगी… कब.. कहां.. कितना बोलना जिस नरेंद्र सिंह से भाजपा के कार्यकर्ता सीख रहे ..उनकी कंप्रोमाइज पॉलिटिक्स कहें या फिर भाजपा के प्रति समर्पण और सेवा के अपने उसूल समझौते को वह भी बाध्य नजर आ रहे.. समर्थकों का भारी दबाव लेकिन पार्टी लाइन और राष्ट्रीय नेतृत्व की मंशा को जमीन पर उतारना उनका भी लक्ष बन चुका है.. सबसे ज्यादा चुनाव तोमर के प्रभाव वाले ग्वालियर चंबल क्षेत्र में ही होने जा रहे.. जिनकी जीत और हार उनके सियासी हितों को भी प्रभावित करेगी..नरेंद्र सिंह जिन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में केंद्रीय मंत्री रहते अपनी निकटता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह और जेपी नड्डा के साथ साबित की.. राज्य की राजनीति में शिवराज के साथ वह हमेशा कदमताल करते हुए नजर आ चुके ।

अब जब प्रदेश भाजपा सरकार के फार्मूले फैसले दिल्ली से तय किए जा रहे तब नरेंद्र सिंह एक अहम किरदार के साथ महत्वपूर्ण कड़ी के तौर पर निभा रहे..जो भाजपा के उन गिने-चुने नेताओं में शामिल होकर सामने आए.. जिन्हें भाजपा की नई शिवराज सरकार की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी समन्वय और संतुलन बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई.. चाहे फिर निर्णायक फैसले महाराज के हक में उनसे किए गए वादों के अनुरूप हो.., स्वीकार्यता बनाने की जिम्मेदारी तोमर को ही सौंपी गई है.. सत्ता संचालन का फार्मूला प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व के बीच सामंजस्य बनाने में उन नरेंद्र सिंह का बड़ा किरदार चर्चा में है जो खुद शिवराज के उत्तराधिकारी माने जाते रहे.. जिनके दिल्ली स्थित आवास पर बैठकर ही कभी उनके प्रतिद्वंदी रहे ज्योतिरादित्य की नई भूमिका पर रजामंदी की स्क्रिप्ट को अंतिम रूप दिया गया.. नरेंद्र सिंह जो कभी प्रदेश अध्यक्ष से लेकर केंद्रीय मंत्री रहते ग्वालियर चंबल क्षेत्र में ज्योतिरादित्य की घेराबंदी के लिए ताना-बाना बुना करते थे ..अब उन्हें मजबूत उनकी स्वीकार्यता साबित करने में जुटे.. नरेंद्र सिंह की संगठन क्षमता के उनके विरोधी भी कायल रहे हैं ..यानी क्षेत्र और प्रदेश की राजनीति में नरेंद्र सिंह तोमर के लिए अब व्यक्तिगत हित कोई मायने नहीं रखते.. जिनके लिए बदलती बीजेपी में सभी को एक फोरम पर लाकर खड़ा करना किसी समस्या से कम नहीं ..अब तक की उनकी सबसे बड़ी चुनौती साबित होने वाली.. देखना दिलचस्प होगा अपनी चुप्पी मौन के दम पर अपने धैर्य ,संयम और सब्र के लिए पहचाने जाने वाले नरेंद्र सिंह की साख भी उपचुनाव में जब दांव पर लग चुकी उनके महत्वाकांक्षी समर्थक बूथ स्तर पर कितना खरा उतर कर दिखाएंगे।

कैबिनेट के विस्तार के बाद यदि चर्चा महाराज के एजेंडे हो रही.. तो इससे पहले सरकार के गठन मुख्यमंत्री शिवराज की शपथ ..पहले पांच मंत्रियों में शामिल नरोत्तम मिश्रा का किरदार भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. जिन्होंने सरकार के 100 दिन में विपक्षी कांग्रेस को उनके अंदाज में जवाब दिया तो 15 महीने की कमलनाथ सरकार में व्यक्तिगत सियासी प्रताड़ना भी खूब सही.. लेकिन मैदान नहीं छोड़ा.. जोड़-तोड़ की राजनीति को भी एक नई दिशा दी और कमलनाथ विरोधियों को लामबंद किया.. महाराज की धमाकेदार एंट्री भाजपा में उनके बढ़ते कदम उनकी स्वीकार्यता और सियासी जमावट ने भी नरोत्तम को चौंकाया होगा.. सिंधिया फैक्टर के पहले ऑपरेशन लोटस के सूत्रधार बनकर सामने आ चुके नरोत्तम पर भी दबाव रहा होगा कि सपा, बसपा, निर्दलीय विधायकों को वह संतुष्ट करें और करवाएं.. जिन्हें एकजुट कर शिवराज के नेतृत्व में भाजपा से उन्होंने जोड़े रखाज्योतिरादित्य को भी राज्यसभा में पहुंचाने में कभी कमलनाथ के खास रहे इन विधायकों ने भाजपा का साथ दिया… यह स्क्रिप्ट भी नरोत्तम ने शिवराज और राष्ट्रीय नेतृत्व को लेकर सब आगे बढ़ाई थी जब सिंधिया सामने नहीं आए थे…. कांग्रेस के दूसरे कई विधायक भी इनके साथ आगे बढ़े थे।

इनमें से कई कैबिनेट विस्तार में मंत्री की शपथ ले चुके है ..लेकिन समर्थन देने वाले दूसरे विधायकों में से किसी को कैबिनेट में शामिल नहीं किया गया.. सवाल जो गलती कभी कमलनाथ और कांग्रेस ने की थी .. आगे कभी यह भाजपा की गलती बनकर तो सामने नहीं आ जाएगी.. शिवराज ने नरोत्तम को गृह मंत्री के तौर पर दूसरे बड़े मंत्रालय से नवाजा तो कोरोना काल में उन्हें स्वास्थ्य विभाग की चुनौती पूर्ण जिम्मेदारी सौंपी… खुद नरोत्तम का नाम डिप्टी सीएम के नाम पर भी खूब उछाला गया.. नरोत्तम भी उस ग्वालियर चंबल क्षेत्र के दतिया का प्रतिनिधित्व करते हैं.. जहां से ज्योतिरादित्य से लेकर नरेंद्र तोमर केंद्रीय राजनीति में बड़ा किरदार निभा रहे.. इसी क्षेत्र से शिवराज कैबिनेट में मंत्रियों की भरमार हो गई है.. ऐसे में भाजपा के इस डॉक्टर और ब्राह्मण नेता का धैर्य भी कसौटी पर लग चुका है.. महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया भोपाल स्थित नरोत्तम मिश्रा के आवास पर लंच कर चुके हैं.. सिंधिया समर्थक कई मंत्रियों से नरोत्तम पहले ही बेहतर तालमेल स्थापित कर चुके.. बावजूद इसके अब हालात तेजी से बदल रहे हैं.. नरोत्तम और नरेंद्र सिंह भी नजदीक आ चुके.. तो शिवराज भी मुख्यमंत्री बनने के बाद नरोत्तम के घर पहुंच कर संदेश पहले ही दे चुके हैं.. फिलहाल भाजपा की राजनीति की धुरी बने महाराज के साथ नरोत्तम यानी इन दोनों के लिए क्षेत्र और प्रदेश की राजनीति बहुत मायने रखती है.. जिनके निशाने पर कमलनाथ कांग्रेस अभी भी बनी हुई है।

मध्य प्रदेश की सल्तनत में आए बदलाव के साथ भाजपा के बनते बिगड़ते समीकरण पर किसी नेता की प्रतिक्रिया ने यदि एक नई बहस छेड़ी.. तो वह कोई और नहीं पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ही है.. जिनकी पिछले दिनों सामने आई चर्चित कथित चिट्ठी में छुपे सियासी संदेशों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. चाहे फिर वह भाजपा नेतृत्व उनके नीति निर्धारकों के लिए हो या फिर जाति, वर्ग ,पार्टी कार्यकर्ता और असंतुष्ट नेताओं के लिए ही क्यों ना हो.. कैबिनेट विस्तार के बाद जब मलाईदार विभागों की चर्चा हो रही तब भी उमा का संदेश गौर करने लायक है.. शिवराज से अपने रिश्तो में हमेशा मजबूती का एहसास कराती रही साध्वी ने समय-समय पर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की कांग्रेस को खूब निशाने पर लिया.. ज्योतिरादित्य से उनका सद्भाव भी नजर आता रहा.. चुनाव में जीत के लिए जरूरी सोशल इंजीनियरिंग को मजबूत करने के लिए जिस भाजपा ने हमेशा उमा का उपयोग किया।

24 सीट के विधानसभा उपचुनाव में पिछड़े वर्ग की इस नेता की अनदेखी करना भाजपा के लिए भी आसान नहीं होगा.. वह बात और है कि बदलती बीजेपी में उन्हें पसंद और नापसंद करने वाले मौजूद हो सकते हैं.. राम मंदिर आंदोलन की अगुवाई कर चुकी उमा ने राम राज्य की परिकल्पना को साकार करने के लिए हमेशा आवाज बुलंद की है .. उनके बयान, सक्रियता और भोपाल में मौजूदग यह बताने के लिए काफी है कि साध्वी को भी शायद सही समय का इंतजार है .. प्रखर हिंदुत्व का चेहरा बन चुके साध्वी की बेबाकी कभी उनकी ताकत तो कभी कमजोरी साबित होती रही ..जिन्होंने गलतियों से सीख लेकर कई मौकों पर यह भी साबित किया कि सब्र और धैर्य की परीक्षा में उन्हें पास होना आता है.. सियासी सफर में कई उतार-चढ़ाव जिनकी जिंदगी में आए लेकिन संघ और भाजपा के सिद्धांत और विचारधारा से कभी कोई समझौता नहीं किया।

उमा ने लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने के बाद गंगा यात्रा की और कोरोना और दूसरे हालातों के बीच मध्य प्रदेश को अपना ठिकाना बना लिया है.. मध्य प्रदेश की राजनीति से जुड़े उनके ट्वीट पहले ही सुर्खियां बटोते रहे हैं ..कभी जिस उमा भारती के नेतृत्व में मध्य प्रदेश में भाजपा सत्ता में लौटी थी.. उसी पार्टी से उन्हें बाहर भी जाना पड़ा था.. घर वापसी के साथ न सिर्फ कार्यक्षेत्र और चुनाव क्षेत्र और राज्य बदला बल्कि समय के साथ भूमिका भी बदलती रही.. समय उनके धैर्य, संयम का इंतिहान भी नेता रही.. लेकिन ना उन्होंने अपने उसूलों से और ना ही अपनी डिग्निटी के कोई समझौता किया.. फायर ब्रांड से कभी वाटर ब्रांड तो कभी लंबी सियासी चुप्पी.. तो अचानक विषय विशेष पर उनका संदेश सियासत में जरूरी उनकी सजगता.. सतर्कता के साथ मौजूदगी दर्ज कराते हुए दिलचस्पी को सामने लाता रहा है।

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