एक और सितारे का अस्त हो जाना

कुछ बरस पहले की बात है। मध्यप्रदेष संस्कृति विभाग के वरिष्ठ अधिकारी आनंद सिन्हा का फोन आया कि बंषी दा आपसे मिलना चाहते हैं, मैं उन्हें लेकर आपके घर आ रहा हूँ। मुझे बड़ी खुषी हुई। उनसे यानी बंषी कौल से इससे पहले दुआ सलाम से अधिक मेरा कुछ नहीं था।

उस दिन पहली बार लगभग 2-3 घंटे हम लोग बैठे बतियाते रहे। उनको यह अच्छा लग रहा था कि देष के कोने-कोने में नौजवान थियेटर कर रहे हैं और युवा पीढ़ी में थियेटर के प्रति रूझान लगातार बढ़ रहा है।

उनका मानना था कि थियेटर दरअसल संस्कृति का विषय न होकर समाज कल्याण विभाग का विषय है तथा इसे समाज कल्याण के रूप में प्रोत्साहित करना चाहिये। ये हजारों लाखों नौजवान यदि थियेटर नहीं करते तो इनमें से अधिकांष गलत सोहवत में पड़कर अपराध की दुनियां में जाने की आषंका को जन्म देते। आज कम से कम वे सभी कुछ न कुछ क्रियेटिव तो कर रहे हैं।

रंगमंच को लेकर दो तरह की अवधारणा मानी जाती है। एक कि नाटक खूब करो, भले ही वह अच्छा न हो। इसी में से अच्छा नाटक निकलेगा। दूसरी कि नाटक भले ही कम करो लेकिन अच्छा नाटक करो। बंषी कौल पहली अवधारणा को मानते थे। उनका कहना था कि नाटक अधिक होंगे तो रंगमंच को गति मिलेगी। मैं इस अवधारणा का पक्षधर नहीं रहा। दर्षकों को नाटकों से जोड़ने के परिप्रेक्ष्य में मेरा मानना रहा है कि पहली बार नाटक देखने आने वाला दर्षक अच्छा नाटक देखकर वह भविष्य का नियमित दर्षक बन सकता है जबकि पहली वार खराब नाटक देखने के बाद हो सकता है वह नाटकों की तरफ दुबारा रूख ही ना करें।

बहरहाल एनएसडी से निकलने के बाद एनएसडी या किसी अन्य बड़ी रंगसंस्था से जुड़कर बंषी कौल अपने आपको स्थापित कर सकते थे लेकिन उन्हें यह गवारा नहीं था। उन्होंने यायावरी के साथ रंगमंच करना पसंद किया और देष भर घूम-घूम कर रंगमंच को एक नई दिषा और नई गति देने का काम करते रहे। उनके इस काम ने उन्हें ऐसी प्रतिष्ठा और सम्मान दिलाया जो किसी संस्था से जुड़कर उन्हें शायद हासिल नहीं होता। हिन्दी रंगमंच में उन्होंने नौटंकी के साथ विदूषक शैली विकसित की और यही उनके रंगमंच की पहचान बन गई। उन्होंने देष भर में हजारों की संख्या में रंगकर्मी तैयार किया और उनसे वे निरंतर संपर्क भी बनाये रखते थे। इतनी बड़ी संख्या में रंगकर्मियों के साथ दुलार और प्यार के साथ डांटने का अधिकारपूर्ण रिष्ता बनाये रखना बंषी कौल के ही बूते की बात थी। आज वे हजारों नौजवान बंषी कौल के बिना अपने आपको बेहद अकेला महसूस कर रहे हैं।

कष्मीर से आकर दिल्ली में बसे बंषी कौल को थियेटर या फेस्टिवल डिजाइन में महारत हासिल थी और इसी के चलते उन्होंने दुनिया भर के अनेक फेस्टिवल डिजाइन किया जिसने उन्हें सम्मान तो दिलाया ही, आर्थिक रूप से कभी उन्हें संघर्ष नहीं करने दिया। महानगरों में अपनी तमाम व्यस्तताओं और संभावनाओं के बीच उन्होंने 1984 में भोपाल में अपनी रंगसंस्था ’रंग विदूषक’ की स्थापना की जो अब तक अपनी सक्रियता के साथ काम कर रही है। मध्यप्रदेष, खासकर भोपाल के रंगमंच के प्रति बंषी कौल का योगदान अप्रतिम रहा है। जितना काम उन्होंने मध्यप्रदेष में किया, रंगकर्मियों की पूरी पीढ़ी तैयार की, उतना काम मध्यप्रदेष के किसी रंग निदेषक ने संभवतः नहीं किया होगा।
बंषी कौल को सबसे अधिक परेषान व चिंतित मैंने तब पाया जब मध्यप्रदेष नाट्य विद्यालय को रंगश्री बैलेट्रूप के भवन से सरकारी भवन में स्थानांतरित किया गया। विद्यालय अपनी स्थापना काल से रंगश्री बैलेट्रूप के भवन में किराये पर संचालित होता रहा है। किराये की इस राषि से वैलेट्रूप का दैनंदिन खर्च चल रहा था। इसी वैलेट्रूप के भवन में बंषी कौल की संस्था रंग विदूषक भी संचालित होता रहा है। नाट्य विद्यालय द्वारा अचानक भवन खाली करने से वे परेषान हो उठे थे कि किराये के रूप में मिलने वाली राषि के नहीं मिलने से संस्था पर आर्थिक बोझ बढ़ जायेगा क्योंकि संस्था की आय का कोई तात्कालिक विकल्प ढूंढ पाना संभव नहीं था। उनकी आषंका थी कि विद्यालय के निदेषक आलोक चटर्जी ने यह हरकत की है।

उन्होंने मुझे फोन कर अपनी चिंता से अवगत कराया और सरकार के इस फैसले को रूकवाने में मदद करने की बात कही। मुझे ठीक-ठीक न तब मालूम था और न आज मालूम है कि बैलेट्रूप के भवन को खाली करने का फैसला क्यों और किस स्तर पर लिया गया। मैं ठीक-ठीक यह कहने की स्थिति में भी नहीं था कि इस निर्णय में आलोक की क्या भूमिका रही। बहरहाल मैंने उनसे संस्था के ट्रष्टियों की ओर से इस संबंध में आवेदन देने व संबंधितों से मिलने को कहा ताकि मैं भी इस दिषा में कुछ पहल कर सकूं। इसी सिलसिले में कई दिनों तक उनसे रोज लंबी बातचीत होती रही। वे संस्था के ट्रस्टियों को सक्रिय करने में सफल नहीं हो सके और जब तक कोई बात आगे होती, नाट्य विद्यालय को किराये के भवन से सरकारी भवन में स्थानांतरित कर दिया गया था। यह सब इतने तुरंत-फुरंत हुआ कि इस निर्णय को रोक पाने की गुंजाइष ही नहीं थी। इस घटना के कुछ समय बाद ही उनकी बीमारी की सूचना मिली और ठीक होने तथा न होने के उहापोह के बीच वे हम सबको छोड़कर चले गये।

मध्यप्रदेष के रंगमंच के प्रति बंषी कौल के योगदान को अलग से कभी रेखांकित नहीं किया गया लेकिन इनकी बीमारी के दौरान उनके इलाज का पूरा खर्च सरकार द्वारा वहन करने की घोषणा कर मध्यप्रदेष के मुख्यमंत्री षिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेष के रंगमंच के प्रति उनके योगदान को मानो नमन किया। आष्चर्य इस बात पर कि जिस भोपाल को बंषी कौल ने अपनी रंगभूमि बनाया वहां कुछ अपवाद को छोड़कर रंगकर्मियों ने उनकी याद में कोई शोक सभा आयोजित करने की जरूरत नहीं समझी। जिस मध्यप्रदेष नाट्य विद्यालय की स्थापना में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई, वहां भी उनके निधन पर दो मिनट मौन धारण कर औपचारिकता पूरी की जबकि उनके अवदान पर विमर्ष कर उन्हें श्रृंद्धाजलि दी जा सकती थी। अलवत्ता राजधानी भोपाल के सभी अखबारों ने पहले पेज पर फोटो सहित बंषी कौल के निधन की न केवल खबर प्रकाषित की बल्कि भीतर के पृष्ठों मंे ऊपर विषेष सामग्री भी प्रकाषित की जो मीडिया के आलोचकों को थोड़ा चैन जरूर पहुंचायेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares