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विपक्ष ने ऐवें ही खड़े किए अपने उम्मीदवार!

विपक्ष ने मारग्रेट अल्वा को क्यों चुना इसका कोई कारण कोई नहीं बता सकता है। सिवा इसके कि किसी को तो चुनना था। ऐसे ही यशवंत सिन्हा की उम्मीदवारी। इसमें तो विपक्ष ने और गजब कर दिया था। सत्ता पक्ष के उम्मीदवार आने से पहले सिन्हा का नाम घोषित कर दिया था। और इससे भी मजेदार कि जिन ममता बनर्जी की वे पार्टी के थे और जिन्होंने उन्हें उम्मीदवार बनाया उन्हीं के राज्य बंगाल में वे जा नहीं पाए। सब राज्यों में चुनाव प्रचार करने गए। मगर बंगाल में ममता बनर्जी ने मना कर दिया।

राजस्थान इस मामले में भाजपा के लिए बहुत उर्वर रहा है कि यहां से गैर- परम्परागत क्षेत्रों से उसे बहुत नेता मिले हैं। गैर-परम्परागत से आशय वे लोग हैं जो भाजपा के मूल संगठनों आरएसएस, विद्यार्थी परिषद से नहीं आए हैं। खुद अपने क्षेत्रों में नाम कमाने के बाद भाजपा में आए हैं। इनमें अभी सबसे नया नाम उपराष्ट्रपति के लिए भाजपा के उम्मीदवार जगदीप धनखड़ का है।

धनखड़ मूलत: एक वकील और बड़े काबिल वकील रहे हैं। राजस्थान जहां जाटों का शिक्षा के क्षेत्र में कोई ज्यादा बोलबाला नहीं था, वहां जयपुर हाईकोर्ट के सबसे बड़े वकीलों में चालीस साल पहले ही धनखड़ ने अपना नाम लिखवा लिया था। एक महंगे और खूब मुकदमे जीतने वाले वकील की ख्याति के साथ वे हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष बन गए थे। इस तरह वकालत में नाम करके 1989 में जनता दल से लोकसभा सदस्य और केन्द्र में मंत्री बनकर फिऱ वहां से कांग्रेस से विधायक बने। इस तरह अपना एक मुकाम बनाकर वे भाजपा के साथ आए और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल से उपराष्ट्रपति तक का सफर तय किया।

यहां राजस्थान की और वहां की भाजपा की याद इसलिए प्रमुखता से आई कि उनसे पहले राजस्थान से जो उप राष्ट्रपति बने थे वे भैरोंसिंह शेखावत भी भाजपा के उस आरएसएस के ढांचे में कभी कैद नहीं हो पाए जिसमें उसके अधिकांश नेता रहते हैं। राजस्थान भाजपा में आरएसएस के प्रतिनिधि माने जाने वाले ललित किशोर चतुर्वेदी और गुलाब चंद कटरिया शेखावत के खिलाफ हमेशा रहे मगर शेखावत उप राष्ट्रपति पद तक पहुंचे, वह तो 2007 में जब वे राष्ट्रपति का चुनाव लड़े तो सरकार उनकी नहीं थी। 2004 में वाजपेयी सरकार चली गई थी वरना वे राष्ट्रपति बन जाते। जिस समय वे राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे थे उस समय उनकी पार्टी के कुछ लोगों का रूख सकारात्मक नहीं था। उनके सबसे बड़े समर्थक वाजपेयी जी प्रधानमंत्री न रहने के बाद कमजोर हो गए थे। आडवानी भी जिन्ना विवाद में फंसकर पार्टी अध्यक्ष पद से हट चुके थे। उनकी पीढ़ी का कोई नेता नहीं बचा था। ऐसे में जिस ताकत से वे चुनाव लड़ना चाहते थे पार्टी नहीं दिखा पाई। तब वे अपने नजदीक के लोगों से दुःख कहते थे।

तो राजस्थान के ऐसे बहुत उदाहरण हैं जहां भाजपा के दायरे से बाहर के लोगों को लाकर अपना नाम किया है। दो बार मुख्यमंत्री रहीं वसुन्धरा राजे भी राजस्थान में पार्टी के बाहर जाकर खुद को मजबूत करती रही हैं। इस समय भाजपा में वे ही एक ऐसी नेता हैं जो अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए हुए हैं। 2014 से पहले भाजपा में ऐसे बहुत नेता हुआ करते थे। जिनकी अपनी पहचान थी। मगर प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के आने के बाद अब भाजपा में किसी नेता की अपनी कोई शख्सियत नहीं है।

राजस्थान से ही जसवंत सिंह। जिनकी फौजी और पारिवारिक विरासत ने उन्हें सीधे वाजपेयी सरकार में रक्षा और वित्त मंत्री तक पहुंचाया। द्वीतिय पंक्ति के नेताओं में और भी बहुत से नाम हैं राजेन्द्र सिंह राठोड़ जैसे

जो अलग विचारधारा से आकर पार्टी में मजबूत नेता हो गए। तो राजस्थान इस मामले में उर्वर है जहां से अलग अलग क्षेत्रों से नेतृत्व निकलता रहा है। जिसका बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ गया है।

जगदीप धनखड़ के नाम पर आश्चर्य करने वालों को अगर राजस्थान की यह पृष्ठभूमि पता होती तो वे इतने हैरान नहीं होते। खैर अब राजस्थान के लोगों और खासतौर से धनखड़ के समर्थकों के लिए जश्न मनाने का समय है, क्योंकि उनकी जीत सुनिश्चित है।

राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति चुनाव में जीत हमेशा सत्ता पक्ष की होती है। यहां तक की अगर सत्ता निर्दलीय को भी समर्थन दे दे तो वह भी जीत जाता है। 1969 में इन्दिरा गांधी ने निर्दलीय वी वी गिरी को चुनाव जितवा दिया था। उनकी पार्टी कांग्रेस संजीवा रेड्डी का समर्थन कर रही थी। मगर प्रधानमंत्री इन्दिरा ने कहा कि गिरी मजदूर समर्थक हैं। उन्हें राष्ट्रपति बनना चाहिए। और बनवा दिया था।

राजनीति हर पार्टी की अलग होती है। भाजपा ने ऐसा माहौल बना रखा है कि वह राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति के लिए जिस उम्मीदवार को लाएगी वह आज की तारीख का सबसे प्रासंगिक और महत्वपूर्ण नाम हो जाएगा। उसके गुण भाजपा को बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मीडिया खुद उसमें सारे दैवीय गुण निरुपित कर देगा। जब कोंविद को बनाया था तब दलित उत्थान हो गया था और अब जब द्रोपदी मुर्मू को बनाया है तो आदिवासी कल्याण हो गया। यह पार्टी की ताकत है। जो उसके प्रत्याशियों में ट्रांसफर हो जाती है।

विपक्ष ऐसा करने में असमर्थ है। उसकी राजनीति भावुक मुद्दों पर नहीं चलती है। उसे मुश्किल पिच पर ही खेलना पड़ता है। 2002 में जब भाजपा ने डा कलाम को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया और कांग्रेस ने भी उसका समर्थन कर दिया। तब लेफ्ट ने आजाद हिन्द फौज की कैप्टन (डाक्टर) लक्ष्मी सहगल को उम्मीदवार बनाया था। आजादी के पहले उसे दिलाने में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की प्रमुख सहयोगी और आजादी के बाद गरीबों, रिक्शा वालों, विद्यार्थियों का मुफ्त इलाज करने वाली मशहूर डाक्टर लक्ष्मी सहगल में भला कोई कैसे कमी ढुंढ सकता है। मगर मीडिया ने उन्हें भी उपयुक्त उम्मीदवार नहीं बताया। मगर यह अपने आप हुआ कि देश में लक्ष्मी सहगल के पक्ष में एक माहौल बन गया। और टीवी का असर तो उन दिनों उतना नहीं होता था

मगर अखबारों को बताना पड़ा कि कानपुर में कैसे एक महिला डाक्टर गरीबों का मुफ्त इलाज करती है। फीस तो लेती ही नहीं है, दवाएं भी अपने पास से देती हैं। और उसका आजादी के आन्दोलन में कितना अहम किरदार था। विपक्ष अगर अच्छा उम्मीदवार दे तो माहौल बनता है।

विपक्ष ने मारग्रेट अल्वा को क्यों चुना इसका कोई कारण कोई नहीं बता सकता है। सिवा इसके कि किसी को तो चुनना था। ऐसे ही यशवंत सिन्हा की उम्मीदवारी। इसमें तो विपक्ष ने और गजब कर दिया था। सत्ता पक्ष के उम्मीदवार आने से पहले सिन्हा का नाम घोषित कर दिया था। और इससे भी मजेदार कि जिन ममता बनर्जी की वे पार्टी के थे और जिन्होंने उन्हें उम्मीदवार बनाया उन्हीं के राज्य बंगाल में वे जा नहीं पाए। सब राज्यों में चुनाव प्रचार करने गए। मगर बंगाल में ममता बनर्जी ने मना कर दिया।

ममता ने कहा कि अगर हमें पहले से मालूम होता कि भाजपा एक आदिवासी महिला को उम्मीदवार बनाएगी तो हम अपना उम्मीदवार नहीं देते। उनके इस बयान के बाद विपक्ष के दलों में से झारखंड मुक्ति मोर्चा और शिवसेना आदिवासी उम्मीदवार के साथ चले गए। यशवंत सिन्हा अन्तरआत्मा की आवाज पर वोटिंग करने की अपील करते रह गए और विपक्ष के लोगों ने ही क्रास वोंटिंग कर दी। द्रोपदी मुर्मू के समर्थन में। सिन्हा यह भूल गए कि मोदी और अमित शाह के राज में अन्तरआत्मा नहीं बोलती है। और अगर बोलती भी है तो मोदी और शाह के पक्ष में।

इस समय माहौल युवाओं की बेरोजगारी, और ऐसे में अग्निपक्ष स्कीम आने जिसमें युवाओं को पांच साल के ठेके पर रखा जा रहा हो का था। विपक्ष अगर ऐसे में किसी रिटायर्ड फौजी अफसर को उम्मीदवार बनाता तो यह मुद्दा उठ सकता था। राष्ट्रपति पद का फौजी उम्मीदवार अगर इसी पर केन्द्रित रहता तो युवाओं की बेरोजगारी के साथ, ठेके पर फौज में भर्ती  से उत्पन्न समस्याएं, सीमाओं की सुरक्षा और चीन की घुसपैठ का मामला चर्चा का विषय बन सकता था।

मगर दूसरी बार जब उप राष्ट्पति के लिए कांग्रेस को उम्मीवार देने को कहा गया तो वह फिर चूक गई। सिन्हा जो हमेशा कांग्रेस के विरोधी रहे उनके नाम पर मना करने से चूकी और इंतहा यह कि उनके प्रचार का ठेका खुद ले लिया। बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना। सिन्हा के साथ कांग्रेस के लोग देश भर में घूम घूमकर प्रचार करते रहे। अब जब वे हारेंगे तो हार का ठिकरा भी कांग्रेस के सिर पर ही फूटेगा।

अल्वा को चुनने का कारण तो कोई नहीं बता पाएगा। मगर यह सबको याद आ गया कि अल्वा ने कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस के टिकट बेचने का सनसनीखेज आरोप लगाया था। कर्नाटक में अब फिर चुनाव हैं और ऐसे में रिटायर्ड लाइफ जी रहीं 80 साल की अल्वा की वापसी ने उनके पुराने आरोपों को भी वापस चर्चा में ला दिया है।

कांग्रेस चाहे सत्ता में हो या विपक्ष में राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति के चुनाव ऐसे ही कैजुअल अंदाज में लड़ती है। प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बना देती है, जिनकी राजनीतिक उपयोगिता क्या है यह किसी को नहीं पता। इसी

तरह हामिद अंसारी को उप राष्ट्पति के दो टर्म दे देती है। जिसका भी कोई कारण किसी को नहीं पता। सत्ता में तो चलो गाड़ी चल जाती है। मगर जब आप विपक्ष में हैं तो आप गलत उम्मीदवार देकर असली मुद्दों की लड़ाई को कमजोर करते हैं। चुनाव सवाल उठाने के सबसे बड़े मौके होते हैं। जैसे अपनी राजनीति के हिसाब से भाजपा ने 2012 में किया था। विदेशी मूल का मुद्दा फिर जिन्दा करने के लिए पीएन संगमा को राष्ट्रपति का चुनाव लड़वा दिया था।

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