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विपक्ष के अंकगणित का असली बीजगणित

महंगाई और बेराज़गारी के ख़िलाफ़ कांग्रेस के देशव्यापी आंदोलन की शुरुआत से पहले राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में पांच अहम् बातें कहीं। एक, भारत में लोकतंत्र अब महज़ स्मृतियों की चीज़ रह गया है। दो, सारी संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता समाप्त हो चुकी है। तीन, धमकाता वह है, जो डरा हुआ होता है। चार, चाहे कुछ भी कर लें, मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक अवधारणा से लड़ना नहीं छोड़ूंगा। और पांच, देश में जो हो रहा है, उसके नतीजे बहुत भयावह निकलेंगे, क्योंकि जनता अंततः चुप बैठने वाली नहीं है।

जिन्हें महंगाई-बेरोज़गारी को ले कर कांग्रेस के विरोध प्रदर्शनों और राहुल की बातों को नेशनल हेरल्ड-यंग इंडियन प्रसंग से नत्थी कर के देखना है, वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं। दुनिया भर के देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था का आकलन करने वाली वैश्विक संस्थाओं द्वारा भारत के ताजा जनतांत्रिक संस्कारों को 50वें क्रम के आसपास मानने की बात आप न भी मानें तो भी क्या आप को ऐसा महसूस नहीं हो रहा है कि हमारी वैयक्तिक-सामाजिक आज़ादी पिछले आठ साल में काफी कम हो गई है? क्या आप को यह महसूस नहीं हो रहा है कि न्याय-क्षेत्र, जांच-पड़ताल क्षेत्र, निर्वाचन-प्रबंधन क्षेत्र और मीडिया बेहद गहरे दबावों-प्रलोभनों के बीच अपनी भूमिका निभा रहा है? क्या आप को यह नहीं लगता है कि अपनी मुट्ठी से फिसलती रेत के अज्ञात भय ने सत्ता शिखर के आचार-व्यवहार को रोज़मर्रा की धमकियों में तब्दील कर दिया है? क्या आप के भीतर यह अंदेशा लगातार घना नहीं होता जा रहा है कि संघ-कुनबे के गहन हिंदू राष्ट्रवाद के चलते समाज बुरी तरह दो-फाड़ होता जा रहा है?

इतना तो कोई भी मानेगा कि आज की सामाजिक-राजनीतिक आबोहवा वैसी नहीं है, जैसी एकाध दशक पहले हुआ करती थी। वह बेतरह बदली हुई है। यह परिवर्तन बेहतरी नहीं, बदतरी लाया है। भारत की अर्थव्यवस्था के सामने इतने गंभीर प्रश्न पहले कभी नहीं थे। खाली हाथ घूमते युवाओं की इतनी भारी तादाद पहले कभी नहीं थी। ज़रूरी चीज़ों की कीमतें इतनी आसमानी पहले कभी नहीं थीं। हमारे समाज के दो प्रमुख घटक ऐसी मारण-गदाएं और खूनी-खंज़र लिए पहले अपने नथुने नहीं फुलाते थे। अपने लिखने-बोलने में मुहावरों-कहावतों-प्रतीकों का इस्तेमाल करने से पहले दो बार सोचने की ज़रूरत पहले नहीं थी। किसी अदम गोंडवी और दुष्यंत कुमार को अपना दर्द बयां करने से पहले सहमी निगाहों से आसपास कभी नहीं देखना पड़ता था और न किसी फ़रमानी नाज़ को ‘हर-हर शंभू महादेव’ गाने से पहले फ़तवेबाज़ों की ऐसी फ़िक्र करनी पड़ती थी।

तो आज जहां हम पहुंच गए हैं, किन्ही वज़हों से तो पहुंचे होंगे! किसी के कारण तो पहुंचे होंगे! आमतौर पर शांत रहने वाले समंदर में सूनामी अपने आप तो आ नहीं गई होगी! इन तिकड़मों, इन हरकतों, इन साज़िशों की चौपड़ कहीं तो किसी ने बिछाई होगी! इन पांसों की बाज़ीगरी के पीछे शकुनियों का कोई जत्था तो कहीं ज़रूर लचक-भचक कर रहा होगा! इतना तो सब की समझ में आ रहा है कि जो हो रहा है, स्वाभाविक नहीं है। उसका प्रवाह प्राकृतिक नहीं है। इतना भी सब की समझ में आ रहा है कि यह किस प्रभुत्व के इशारे पर, उकसावे पर, समर्थन से, संरक्षण से और सक्रिय भागीदारी से हो रहा है! गुंसाई ने हमें बताया है कि ‘समरथ’ का कोई दोष नहीं होता है। गुंसाई का भावार्थ है कि समर्थ का तब तक कोई दोष नहीं होता है, जब तक वह समर्थ है। लेकिन सदा-सर्वदा कौन समर्थ बना रह पाता है। अपने ख़ुदा-पन पर अटूट यक़ीन रखने वालों में से किस की सल्तनत अक्षुण्ण रह पाई? नश्वरता से बड़ा सत्य संसार में आप कहां से खोज कर लाएंगे?

टूटी टांगों और शिथिल बाहों वाले मौजूदा भारतीय विपक्ष की लाचारी पर राहुल गांधी की शुक्रवार की सुबह कही बात का मर्म समझिए। उन्होंने कहा कि जब राजकीय, शासकीय, प्रशासकीय, सांस्थनिक और वित्तीय व्यवस्था पर किसी कुविचार के अनुचरों का संपूर्ण कब्जा हो जाता है तो विपक्षी राजनीतिक दलों को सार्वजनिक हित की लड़ाई सिर्फ़ सत्तासीन राजनीतिक दल से ही नहीं, समूचे तंत्र से लड़नी पड़ती है। उन्होंने कहा कि देश की, और ख़ासकर विपक्ष की, असली ताक़त निष्पक्ष न्यायपालिका, कार्यपालिका, सूचना-समाचार संसार और कारोबारी-जगत होते हैं। अगर यह समतल मैदान एकतरफ़ा हो जाए तो विपक्ष लड़ता भर रह सकता है, लेकिन उसका असर उथला हो जाता है। राहुल की बात में इसलिए दम है कि पिछले आठ साल में विपक्ष ने देश के हर बुनियादी मसले को हर मंच पर पुरज़ोर तरीके से उठाया, मगर सूचना-संचार के साधनों को, संवैधानिक संस्थाओं को और राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के क़ानूनी वित्तीय प्रवाह की दिशा को अपनी मुट्ठी में जकड़े बैठे ‘हम दो, हमारे दो’ ने उस की त्वरा को हर बार बेजान बना दिया।

विपक्ष लुंजपुंज नहीं है। उसकी आवाज़ को नक्कारखाने की तूती में तब्दील करने के उपादान बहुत चालाक हैं। सत्तापक्ष उतना रुस्तम नहीं है। उसे महाकाय दिखाने वाली प्रक्षेपक प्रणाली बेहद धूर्त है। सो, आइए, मैं आप को देश भर में सत्तापक्ष और विपक्ष के अंकगणित का असली बीजगणित बताता हूं। पहले संसद को लीजिए। भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा में 303 और राज्यसभा में 91 सदस्य हैं। ये 394 होते हैं। अगर भाजपा के सहयोगी दलों के सांसदों की संख्या को भी शामिल कर लिया जाए तो संसद के दोनों सदनों में एनडीए के 462 सदस्य हैं। दोनों सदनों के कुल सदस्यों की संख्या 788 है। इस हिसाब से 326 सांसद हैं, जो नरेंद्र भाई मोदी के साथ नहीं हैं। देश भर की विधानसभाओं में इस वक़्त 4036 विधायक हैं। उन में से सिर्फ़ 1806 एनडीए के हैं। यानी 2500 विधायक हैं, जो नरेंद्र भाई के साथ नहीं हैं। 788 की संसद में 136 यानी सिर्फ़ 17 फ़ीसदी ज़्यादा सदस्यों के बूते और विधानसभाओं में विपक्ष से 694 विधायक कम होने के बावजूद हमारे प्रधानमंत्री एकतरफ़ा हुकूमत चलाने का ज़ौहर दिखाने में लगे हैं।

कांग्रेस के लोकसभा में 53 और राज्यसभा में 31 सांसद हैं। यानी कुल 84 सदस्य। अगर यूपीए-दलों के सदस्यों को जोड़ लिया जाए तो संसद के दोनों सदनों में उनके सांसदों की तादाद 147 है। देश भर की विधानसभाओं में यूपीए के विधायकों की संख्या 1045 है। इनमें से 688 कांग्रेस के हैं। 6 राज्यों की विधान परिषदों में यूपीए के 65 निर्वाचित सदस्य हैं। इनमें से 41 कांग्रेस के हैं। तो बताइए, 147 सांसदों और 1110 विधायकों-विधान पार्षदों वाले विपक्ष को हम कैसे ऐरा-गैरा-नत्थूखेरा मान लें? इस में अगर महापालिकाओं, नगर निगमों, नगर पालिकाओं, ज़िला पंचायतों और मंडी समितियों वग़ैरह के निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी शामिल कर लिया जाए तो आप पाएंगे कि भाजपा ने अपने गुब्बारे को तान कितना ही ऊंचा रखा हो, उस में तंत कम और हवा ज़्यादा है।

इसलिए यह मान कर चलिए कि जिस दिन सल्तनती हाहाहूहू के हौए का जिन्न संवैधानिक संस्थानों, मीडिया और नागरिक समाज के सिर से उतर जाएगा, आठ साल पुराना ताशमहल भरभरा कर गिर पड़ेगा। जानकार तो कहते हैं कि भारत की निर्वाचन व्यवस्था को ईवीएम के अंतरताने से मुक्त भर कराने की देर है, सियासती धरती एकदम समतल हो जाएगी। ज़मीन के इस समतलीकरण के लिए अपने फावड़े-टोकरियां ले कर जितनी जल्दी हो सके, घरों से निकलिए। या अपनी बेहाली पर दीदे बहाते रहिए। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया और ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर के संपादक हैं।)

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By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

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