हमारा गणतंत्र है सफल

आगामी 26 जनवरी को देश 72वां गणतंत्र दिवस मनाएगा। जिस प्रकार वैश्विक महामारी कोविड-19 ने विश्व (भारत सहित) की आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों को प्रभावित किया है, उसका असर 2021 के गणतंत्र दिवस के जश्न में भी दिखेगा। राजपथ पर परेड की लंबाई 8.2 कि.मी. से घटाकर 3.3 कि.मी. और दर्शकों की संख्या 1.15 लाख से घटाकर 25,000 कर दी गई है। साथ ही किसी भी देश का राष्ट्रप्रमुख मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित भी नहीं होगा।

सुखद बात यह है, जिसपर भारतीयों को गौरव भी होना चाहिए है कि जब हम अपना गणतंत्र दिवस मनाएंगे, तब दुनिया के कुल 206 देशों (50 से अधिक इस्लामी राष्ट्र सहित) में से केवल चुनिंदा चार देशों (एक भी इस्लामी देश नहीं) में शामिल भारत, जहां न केवल कोविड वैक्सीन का निर्माण हुआ है, अपितु 30 करोड़ भारतीयों के टीकाकरण का पहला चरण प्रारंभ हुए 10 दिन भी बीत चुके होंगे। वास्तव में, देश की यह उपलब्धि वर्ष 1947 से भारत की जीवनयात्रा को अनेकों उतार-चढ़ाव (1975-77 के बीच 19 माह के आपातकाल सहित) के बाद भी स्वर्णिम अक्षरों में परिभाषित करता है।

अंग्रेज जब मुस्लिम लीग और वामपंथियों की मदद से भारत को दो भागों में विभाजित करके गए, तब उद्योग-धंधे के नाम पर देश में केवल आयात ही होता था। हम एक सुई का निर्माण भी नहीं करते पाते थे। सात दशक पहले देश में 90 प्रतिशत से अधिक लोग गरीब थे, जिनकी संख्या कोरोना कालखंड से पहले घटकर 13 प्रतिशत हो गई। औसत आयु 27 वर्ष से बढ़कर 70 साल, तो साक्षरता दर 18 प्रतिशत से बढ़कर 80 प्रतिशत हो गई।

अक्सर कहा जाता है कि चीन, सिंगापुर जैसे देशों में भारत से कहीं अधिक विकास हुआ है। यह सही भी है, किंतु इस स्थिति के लिए विभिन्न कारण जिम्मेदार है। साम्यवादी चीन की राजनीति में जहां अधिनायकवाद का वर्चस्व है, तो आर्थिक व्यवस्था रूग्ण पूंजीवाद की जकड़ में है। अर्थात्- वहां मानवाधिकारों का कोई स्थान नहीं है। 138 करोड़ की आबादी वाले भारत की तुलना सिंगापुर से करना थोड़ा अटपटा लगता है। सिंगापुर क्षेत्रफल के मामले में भारतीय नगर बेंगलुरु के लगभग बराबर ही है, जहां 84 लाख लोग बसते है, जबकि सिंगापुर की कुल जनसंख्या 57 लाख है।

वास्तव में, किसी भी देश के विकास में राष्ट्रवाद, अपनी संस्कृति पर गौरव, देश के प्रति नागरिकों का समर्पण और सत्ता-अधिष्ठान की उद्योग-हितैषी नीतियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। स्वतंत्रता के बाद अपनाई वामपंथ प्रेरित समाजवादी नीतियों (वर्ष 1947-90) के अंधाधुंध अनुकरण से भारतीय उद्यमी और ऊर्जावान प्रतिभा कुंठित होते चले गए। इस दौरान भारत चार बड़े हमले झेल चुका था, जिसमें 1962 को उसे चीन के हाथों शर्मसार होना पड़ा। बाद में, भारत की अर्थव्यवस्था इतनी कमजोर हो गई थी कि आज के वरिष्ठ नागरिक उन दिनों को भूले नहीं होंगे कि जब चीनी, दूध, वनस्पति आदि जैसे दैनिक खाद्य-वस्तुओं खरीदने के लिए लोगों को लंबी-लंबी पंक्तियों में घंटों तक खड़े रहना पड़ता था। इन वस्तुओं की सार्वजनिक रूप से जमकर कालाबाजारी होती थी। सीमेंट, टेलीफोन, वाहन, स्टील इत्यादि की इतनी भीषण किल्लत थी कि लोगों को यह बुकिंग के कई महीने या वर्षों बाद प्राप्त हो पाता था। 1980 के दशक में स्थिति ऐसी बिगड़ी कि अंतरराष्ट्रीय देनदारियों को पूरा करने के लिए हमें अपना स्वर्ण भंडार तक विदेशी बैंकों में गिरवी रखना पड़ा।

तब वामपंथ केंद्रित समाजवादी व्यवस्था की भयंकर असफलता का ठीकरा देश की मूल सनातन संस्कृति और हिंदुओं की आबादी पर फोड़ दिया गया। उस समय वामपंथी अर्थशास्त्री प्रोफेसर राजकृष्ण ने देश के निम्न विकास के लिए ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ को जिम्मेदार ठहराया। वामपंथ जनित समाजवादी नीतियों का आकलन करने के बजाय राजकृष्ण तत्कालीन स्थिति के लिए यह स्थापित करते नजर आए थे कि देश में हिंदू समाज की सनातन मान्यताओं के कारण भारत आर्थिक तंगी और गरीबी से अभिशप्त है। तब मैंने इस संबंध में एक आलेख के माध्यम से उनसे पूछा था कि भारत की दुर्दशा के लिए यदि बहुसंख्यक हिंदुओं को जिम्मेदार मान रहे है, तो क्या आप इस आधार पर बांग्लादेश की तत्कालीन आर्थिक दुर्गति के लिए ‘इस्लाम/मुसलमान रेट ऑफ ग्रोथ’ को जिम्मेदार मानेंगे? जैसी कि अपेक्षा थी, उनका या उनके कुतर्क पर विश्वास करने वाले का कोई उत्तर नहीं आया।

क्या यह सत्य नहीं कि सैंकड़ों वर्ष पहले भारत- तत्कालीन संसाधनों, शत-प्रतिशत हिंदू श्रमशक्ति और वैदिक ज्ञान के बल पर वैश्विक आर्थिक शक्ति था? प्रख्यात ब्रितानी आर्थिक इतिहासकार एंगस मेडिसन ने “कॉन्टुअर्स ऑफ द वर्ल्ड इकॉनमी 1-2030 एडी” नामक में अपने शोध में स्पष्ट किया है कि पहली सदी से लेकर 10वीं शताब्दी तक भारत- विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। बेल्जियम अर्थशास्त्री पॉल बरॉच के अनुसार, 1750 की वैश्विक अर्थव्यवस्था में जहां चीन की हिस्सेदारी 33 प्रतिशत थी, वही भारत 24.5 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर था। ब्रितानी शासन में जहां भारतीय संसाधनों का जमकर दोहन हुआ, तो 1947-90 में वाम-केंद्रित आर्थिक नीतियों ने अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया। यह हास्यास्पद है कि जिन वामपंथियों को देश की तत्कालीन आर्थिक विफलता के लिए हिंदू समुदाय और उनकी सनातन परंपराएं जिम्मेदार दिख रही थी, उन्हें आज भी कश्मीर संकट (वैश्विक आतंकवाद सहित) के पीछे ‘इस्लाम या फिर उसका काफिर-कुफ्र दर्शन’ मुख्य कारण के रूप में दिखाई नहीं देता।

 

वर्ष 1988-1991 में जब सोवियत संघ के विघटन हुआ और बर्लिन की दीवार गिरी, तब दमनकारी वामपंथी शासन और उसकी समाजवादी व्यवस्था में हिंसा, दरिद्रता, उत्पीड़न और भूखमरी की कड़वी सच्चाई को समस्त विश्व ने देखा। इसी विकृत ढांचे से भारत को भी छुटकारा वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद मिला। प्रतिभाशाली लोगों और उद्यमियों के हाथ खुलना शुरू हुए और कालांतर में हम खाद्य-वस्तुओं-सेवा आदि क्षेत्रों में दुनिया के सरताज बन गए। 2014 में “मेक इन इंडिया” अभियान, नवंबर 2016 के “विमुद्रीकरण”, जुलाई 2017 से “वस्तु सेवा कर” अर्थात्- “जीएसटी” और 2020 में “आत्मनिर्भर भारत अभियान” से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है। इसका अंदाजा हम इस बात से लगा सकते है कि मार्च 2020 तक हमारे देश में एक भी कोविड-19 रोधी सुरक्षा उपकरण (पीपीई किट) नहीं बनता था, किंतु कुछ माह के भीतर ही भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा पीपीई किट का उत्पादन करने वाला देश बन गया।

अक्सर यह सवाल उठता है कि भारत इतनी विविधताओं, जिसमें भाषा, खानपान, रहन-सहन, वेश-भूषा के साथ-साथ परंपराओं में भी भिन्नता दिखती है- वहां लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता और बहुलतावाद अक्षुण्ण कैसे है? क्या इसका उत्तर भारतीय संविधान, उसमें निहित नागरिक अधिकारों-प्रावधानों या 1976 में संविधान की प्रस्तावना में संशोधन के बाद जोड़ा गया विदेशी शब्द “सेकुलर” है?- नहीं। वर्ष 1989-91 में पांच लाख कश्मीरी पंडित घाटी से जिहादी दंश झेलने के बाद, जिसमें दर्जनों हिंदुओं को मौत के घाट उतारा गया था और उनकी महिलाओं की अस्मत सरेआम लूटी गई थी- वहां से शेष भारत में पलायन और अपने देश में निर्वासितों की भांति जीवनयापन हेतु विवश हुए थे। क्या तब शेष देश की भांति कश्मीर में भारतीय संविधान या “सेकुलरिज्म” लागू नहीं था? घाटी में अल्पसंख्यक हिंदुओं का सांस्कृतिक संहार इसलिए हुआ था, क्योंकि वहां का “इको-सिस्टम” मजहबी कारणों से बहुलतावाद और पंथनिरपेक्षता को स्वीकार नहीं करता है। इसी विषाक्त इको-सिस्टम के कारण पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू सहित अन्य गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक गर्त में है। सच तो यह है कि खंडित भारत का हिंदू चरित्र ही देश में लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता और बहुलतावाद की सुरक्षा की एकमात्र गारंटी है।

यह बात ठीक है कि हम हर संदर्भ में और अच्छा कर सकते थे। फिर भी यदि एक औसत भारतीय से पूछा जाए कि क्या वह पड़ोस के किसी देश- पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल या चीन में बसना चाहेगा, तो अधिकांश का उत्तर ना ही होगा। यही हमारे सफल गणतंत्र की उपलब्धि है, जो गत 73 वर्षों से अक्षुण्ण है। मेरा अडिग विश्वास है कि युवा भारत में नई बुलंदियों को छूने की अपार संभावनाएं है।

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