pitru paksha 2021 shraaddh सोमयज्ञ के व्यवस्थापक महर्षि कण्व
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सोमयज्ञ के व्यवस्थापक महर्षि कण्व

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ऋग्वेद के अष्टम मंडल के अधिकांश सूक्तों के द्रष्टा होने के साथ ही शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन तथा काण्व- इन दो शाखाओं में से द्वितीय काण्वसंहिता के वक्ता भी महर्षि कण्व ही हैं। उन्हीं के नाम से इस संहिता का नाम काण्वसंहिता हो गया। ऋग्वेद 1/36/10-11 में इन्हें अतिथि प्रिय कहा गया है। ऋग्वेद में इनके ऊपर अश्विद्वय की कृपा की बात अनेक स्थाओं पर कही गई है। ऋग्वेद 8/1/8 के अनुसार कण्व-पुत्र तथा इनके वंशधर प्रसिद्ध याज्ञिक थे, और इन्द्र के परम भक्त थे। pitru paksha 2021 shraaddh

श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों को नमन -3:  वेद मन्त्रों के द्रष्टा के रूप में मन्त्रों के सूत्रबद्ध कार्य में महती योगदान प्रदान करने वाले सप्तर्षियों अर्थात सात ऋषिकुलों में  शामिल महर्षि कण्व अपने आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुन्तला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण करने वाले ऋषि के रूप में सर्वप्रचलित हैं। परन्तु यह बात भी रेखांकित किये जाने योग्य है कि देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने ही व्यवस्थित किया। इन्होंने विद्यार्थियों के पठन- पाठन हेतु आश्रम अर्थात गुरुकुल, विद्यालय भी चलाये। ऋग्वेद के अष्टम मंडल के 103 सूक्तों में से अधिकांश मन्त्रों के द्रष्टा महर्षि कण्व तथा उनके वंशज तथा गोत्रज माने जाते हैं। कण्वकुल के अनेक ऋषियों के द्वारा कई पीढ़ी तक रचे सभी मन्त्र ऋग्वेद में शामिल हैं, लेकिन ऋग्वेद के मन्त्रों के संकलन में कण्वों के मन्त्रों को कण्वकुल का एक पृथक वंशमंडल देकर अन्य छः कुलों के समान महिमामंडित अथवा गौरव प्रदान नहीं किया गया है। ध्यातव्य है कि ऋग्वेद के दस मंडलों में दो से सात मंडल अर्थात छह मंडल वंश परम्परा से वंशमंडल कहे जाते हैं। ऋग्वेद का मंडल  संख्या दो- गृत्समद वंश अथवा ऋषिकुल, तीन-विश्वामित्र, चार-वामदेव, पांच-अत्रि, छह-भारद्वाज और मंडल सात-वसिष्ठ ऋषि कुलों के ऋषियों के द्वारा संग्रहित किये जाने के कारण वंश परम्परा से ये मंडल इन ऋषियों के नामों से जाने जाते हैं, और इन मंडलों के द्रष्टा ऋषियों को अतिरिक्त रूप से महिमा मंडित और  इनके मन्त्रों को गौरव प्रदान किया गया है, लेकिन कण्वों को वह महत्व, वह गौरव प्रदान नहीं किया गया।

विद्वानों का मत है कि कण्वकुल के अनेक ऋषियों ने अपने मन्त्र कुछ दानदाताओं की प्रशंसा में बना कर ऋग्वेद में शामिल कर डाले। इसलिए इस कार्य को काव्यकर्म के विरूद्ध मानकर उन्हें पृथक वंशमंडल का गौरव प्रदान नहीं किया गया। दाता राजाओं की प्रशंसा में निर्मित कण्वों के इस तरह के मन्त्रों को नाराशंसी कहते हैं हैं। यद्यपि कण्वकुल पृथक वंशमंडल में नहीं, लेकिन वर्तमान ऋग्वेद के सूत्रबद्ध कर्ताओं में कण्वकुल भी शामिल है, और देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों के द्वारा व्यवस्थित किये जाने के कारण भारतीय सभ्यता- संस्कृति में उनके योगदान को नहीं भुलाया जा सकता ।

उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद के अष्टम मंडल के अधिकांश सूक्तों के द्रष्टा होने के साथ ही शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन तथा काण्व- इन दो शाखाओं में से द्वितीय काण्वसंहिता के वक्ता भी महर्षि कण्व ही हैं। उन्हीं के नाम से इस संहिता का नाम काण्वसंहिता हो गया। ऋग्वेद 1/36/10-11 में इन्हें अतिथि प्रिय कहा गया है। ऋग्वेद में इनके ऊपर अश्विद्वय की कृपा की बात अनेक स्थाओं पर कही गई है। ऋग्वेद 8/1/8 के अनुसार कण्व-पुत्र तथा इनके वंशधर प्रसिद्ध याज्ञिक थे, और इन्द्र के परम भक्त थे। ऋग्वेद 8/4/20 के अनुसार  कण्व-गोत्रज देवातिथि ऋषि ने सौभाग्यशाली कुरुंग नामक राजा से 60 हज़ार गायें दान में प्राप्त की थीं। इस प्रकार ऋग्वेद का अष्टम मण्डल कण्ववंशीय ऋषियों की देवस्तुति में उपनिबद्ध है। महर्षि कण्व ने कण्वस्मृति के नाम से विख्यात एक स्मृति की भी रचना की है। बालखिल्य के नाम से प्रसिद्ध अष्टम मंडल के 11 सूक्तों में देवस्तुतियों के साथ ही ऋषि द्वारा दृष्टमन्त्रों में लौकिक ज्ञान-विज्ञान तथा अनिष्ट-निवारण सम्बन्धी उपयोगी मन्त्र भी अंकित हैं। बालखिल्य सूक्त 8/61/13 में अंकित मन्त्र- यत् इन्द्र मपामहे, का पाठ दु:स्वप्र-निवारण तथा कपोलशक्ति के लिए किया जाता है। बालखिल्य सूक्त 8/97/5 में गौ की प्रसिद्ध व अत्यंत सुन्दर स्तुति है। ऋग्वेद 8/101/15 में गो-प्रार्थना अंकित है, जिसमें गौ की महिमागान करते हुए कहा गया है कि गौ रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, अदिति पुत्रों की बहिन और घृतरूप अमृत का ख़ज़ाना है, इसलिए प्रत्येक विचारशील पुरुष को मैंने यह समझाकर कहा है कि निरपराध एवं अवध्य गौ का वध न करो।

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श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों को नमन-2 विश्वामित्र: राजर्षि से ब्रह्मर्षि वाले एकमात्र ऋषि

भारतीय पुरातन ग्रन्थों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि प्राचीन भारत में कण्व नाम के अनेक व्यक्ति हुए हैं। जिनमें सर्वाधिक प्रचलित विश्वामित्र- मेनका के गर्भ से उत्पन्न शकुन्तला को पालने वाले महर्षि कण्व हैं, जिन्होंने  धर्माचारपरायण उज्ज्वल एवं उदात्त जीवन चरित्र प्रस्तुत करते हुए भारतीय परम्परा में विवाह के समय कन्या अर्थात वधु  को उत्तम गृहिणी बनने के निमित दी जाने वाली शिक्षा का शाश्वत सत्य विद्या का वर्णन प्रशंसनीय रूप में शकुन्तला के विदाई के समय धर्मपिता की भूमिका में की है, वह शिक्षा आज भी उत्तम गृहिणी के लिए आदर्श मानी जाती है और उससे कण्व के उत्तम ज्ञान, तपस्या, मन्त्रज्ञान, अध्यात्मशक्ति आदि का आभास प्राप्त होता है। दुष्यंत एवं शकुंतला के पुत्र भरत का जातकर्म इन्होंने ही संपादित किया था।  पुरातन ग्रन्थों में एक दूसरे कण्व का भी उल्लेख मिलता है, जो ऋषि कंडु के पिता थे, और अयोध्या के पूर्व स्थित अपने आश्रम में रहते थे। वाल्मीकि रामायण के अनुसार वे राम के लंका विजय करके अयोध्या लौटने पर वहाँ आए और उन्हें आशीर्वाद दिया। एक तीसरे कण्व पुरुवंशी राज प्रतिरथ के पुत्र थे जिनसे काण्वायन गोत्रीय ब्राह्मणों की उत्पत्ति बतलाई जाती है। इनके पुत्र मेधातिथि हुए और कन्या इंलिनी। एक अन्य चौथे कण्व ऐतिहासिक काल में मगध के शुंगवंशीय राज देवमूर्ति के मंत्री थे, जिनके पुत्र वसुदेव ने राजा की हत्या करके सिंहासन छीन लिया और इनके वंशज काण्वायन नाम से डेढ़ सौ वर्ष तक राज करते रहे। पाँचवें कण्व पुरुवंशीय राज अजामील के पुत्र थे और छठे महर्षि कश्यप के पुत्र। सातवें महर्षि घोर के पुत्र थे, जिसने भी कण्व परम्परा में ऋग्वेद के अनेक मंत्रों की रचना की है।

रामायण, महाभारत व पौराणिक ग्रन्थों में कण्व सम्बन्धी उपलब्ध विवरणियों के अनुसार ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों के द्रष्टा महर्षि कण्व ब्रह्मा के पौत्र व अंगिरा के पुत्र महर्षि घोर के पुत्र थे। वेदों और पुराणों में प्राप्य इनके वंश विवरणी के अनुसार घोर ऋषि के पुत्र कण्व ऋषि से भी एक पुत्र ब्रह्मऋषि सौभरि हुए। जिनकी वंशावली आदिगौड़ सौभरेय ब्राह्मण कहलाती है। विष्णु पुराण व भागवद पुराण में इनके उल्लेख मिलता है। सदैव तपस्या में लीन रहने वाले ऋषि कण्व के रमणीक आश्रम में शिष्यों की शिक्षा-दीक्षा अनवरत चलती ही रहती थी। उस काल में वृत्तासुर का आतंक ऋषि- मुनियों के लिए कष्टदायक बन आतंक के रूप में छाया हुआ था। उसने इन्द्र से इन्द्रासन बलपूर्वक छीन लिया था। वृत्तासुर को भस्म करने के लिए इन्द्र ने महर्षि दधीचि से प्रार्थना कर उनकी अस्थि प्राप्त कर उनकी अस्थि से बज्र बनाया और उसके प्रयोग से वृत्तासुर को मार दिया। परन्तु वृत्तासुर को भस्म करने के बाद भी वह बज्र सृष्टि को भी अपने तेज से जलाने लगा। नारद ने इस समाचार को जान भगवान विष्णु से सृष्टि की रक्षा करने का निवेदन किया।

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इस पर विष्णु ने नारद को बताया कि बज्र में जहां एक ओर नष्ट करने की शक्ति है, तो दूसरी ओर सृजन करने की विलक्षण क्षमता भी है। विष्णु ने नारद से भूमण्डल पर महर्षि दधीचि के समकक्ष किसी अन्य तपस्वी ऋषि का नाम बताने को कहा। इस पर नारद ने महर्षि कण्व की प्रशंसा करते हुए उन्हीं का नाम इस हेतु प्रस्तावित किया। यह जान विष्णु महर्षि कण्व के आश्रम पर पहुंचे और बज्र के तेज को ग्रहण करने का आग्रह किया। विष्णु के आग्रह पर ऋषि कण्व ने सृष्टि के कल्याण के लिए उस तेज को ग्रहण करना स्वीकार किया। विष्णु ने कहा कि बज्र का तेज संहारक के साथ-साथ गर्भोत्पादक भी है। कुछ दिनों बाद ऋषि पत्नी गर्भवती हुई। पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। ये ही आगे चलकर तपोधन महर्षि सौभरि हुए। बालक सौभरि ने पिता कण्व से तत्वमसि का ज्ञान प्राप्त किया। ऋषि कण्व ने उन्हें सबका मूल सत बताते हुए कहा कि जगत का ईश्वर हमारी अपनी ही अन्तरात्मा स्वरूप है उसे दूरवर्ती कहना ही नास्तिकता है। जगत की अनन्त शक्ति तुम्हारे अन्दर है। मन के कुसंस्कार उसे ढके हैं, उन्हें भगाओ, साहसी बनो, सत्य को समझो और आचरण में ढालो।

अपने पुत्र सौभरि से कण्व आगे कहते हैं- जैसे समुद्र के जल से वृष्टि हुई पानी नदी रूप हो पुनः समुद्र में मिल जाती हैं। नदियां समुद्र में मिलकर अपने नाम तथा रूप को त्याग देती हैं, ठीक इसी प्रकार जीव भी सत से निकल कर सत में ही लीन हो जाता है। सूक्ष्म तत्व सबकी आत्मा है, वह सत है। इनके अतिरिक्त छह -सात और कण्व हुए हैं, जिनकी विवरणियां पौराणिक ग्रन्थों में अंकित प्राप्य हैं। लेकिन ये सभी कण्व सम्बन्धी विवरणियां आपस में इतना गड्ड मड्ड हो गई हैं, जिन्हें पृथक करना आसान व सहज नहीं, फिर भी कण्वों की भारतीय सभ्यता- संस्कृति और ज्ञान- विद्या के क्षेत्र में किये गए महती योगदान को स्मरण कर उनके उत्तम ज्ञान, तपस्या, मन्त्र ज्ञान, अध्यात्म शक्ति की प्रशंसा में उन्हें आकाश के तारामंडल में स्थित सप्तर्षियों में शामिल कर लिया गया है। श्राद्ध पक्ष में भारतीय सभ्यता- संस्कृति, विद्या- ज्ञान के विकास में कण्वों की भूमिका को स्मृत, हृदय से प्रशंसित, पूजित व नमित किया जाना उचित ही है। pitru paksha 2021 shraaddh

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