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वैदिक मत में श्राद्ध और तर्पण

वेद के अनुसार मृत्यु के पश्चात जीव की दो गतियां हैं। पहला, ईश्वर के न्यायानुसार कुछ ही समय में पुनर्जन्म और दूसरा मोक्ष प्राप्ति अर्थात उत्तम कर्म वाले जीव दुःख, जन्म- मरण से मुक्ति पाकर परमात्मा में स्थित हो दीर्घ समय तक परमात्मा के आनन्द में रहते हैं। जीव के पुनर्जन्म हो जाने अथवा मोक्ष पा लेने के बाद की स्थिति में श्राद्ध, तर्पण आदि कर्मकांड व्यर्थ सिद्ध होता है। ऐसे में प्रश्न उत्पन्न होता है कि आखिर श्राद्ध और तर्पण क्या है? वैदिक मत में पितृयज्ञ के दो भेद हैं- श्राद्ध और तर्पण।

वैदिक व्यवस्था में पांच प्रकार के यज्ञों का विधान करते हुए इन पांच यज्ञों को प्रत्येक गृहस्थियों को प्रतिदिन करने के लिए कहा गया है। इन पांच प्रकार के यज्ञों में ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, अतिथि यज्ञ, बलिवैश्वदेव यज्ञ और पितृयज्ञ शामिल हैं। इन्हें पंच महायज्ञ कहा गया है। वैदिक मतानुसार परमात्मा की उपासना करना ब्रह्मयज्ञ है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्ति हेतु अपने आचरण को सुधारना और सच्चिदानंद स्वरुप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता एकमात्र ईश्वर की उपासना करना, उन्हें धन्यवाद देना और अष्टांग योग का पालन करना ब्रह्मयज्ञ है। अग्निहोत्र करना ही देवयज्ञ है। जड़ देव अर्थात आकाश, जल, वायु, पृथ्वी आदि की शुद्धि हेतु अग्निहोत्र। किसी से कुछ लिए बिना सदैव ही सभी को सब कुछ देने वाले देवों को यदि हम कुछ दें, अथवा कुछ देते हैं, तो ये देव कई गुना करके हमें वापिस देते हैं। यही कुछ अग्निहोत्र में भी होता है।

इससे जड़ देवों का सत्कार अर्थात पूजा वेदों का रक्षण और ईश्वर की उपासना भी होती है। वैदिक विद्वान, सत्योपदेशक व अतिथियों का सेवा, भोजन, धन आदि से यथासंभव सत्कार करना अतिथि यज्ञ है। रोगियों, निर्धनों, चींटी, कुत्ते, काग आदि औषधि, धन, भोजन आदि से उपकार करना बलिवैश्वदेव यज्ञ है। जीवित माता,पिता, आचार्य, गुरु, सास ,ससुर बड़े भाई सम्बन्धी आदि का सत्कार और सेवा करना, पितृ यज्ञ कहलाता है।

वैदिक विद्वानों के अनुसार वर्तमान में प्रचलित पितृ पक्ष में अपने मृत पूर्वजों का श्राद्ध करना, तर्पण निकालना आदि कर्मकांड वेद विरुद्ध हैं। वेद के अनुसार मृत्यु के पश्चात जीव की दो गतियां हैं। पहला, ईश्वर के न्यायानुसार कुछ ही समय में पुनर्जन्म और दूसरा मोक्ष प्राप्ति अर्थात उत्तम कर्म वाले जीव दुःख, जन्म- मरण से मुक्ति पाकर परमात्मा में स्थित हो दीर्घ समय तक परमात्मा के आनन्द में रहते हैं। जीव के पुनर्जन्म हो जाने अथवा मोक्ष पा लेने के बाद की स्थिति में श्राद्ध, तर्पण आदि कर्मकांड व्यर्थ सिद्ध होता है। ऐसे में प्रश्न उत्पन्न होता है कि आखिर श्राद्ध और तर्पण क्या है? वैदिक मत में पितृयज्ञ के दो भेद हैं- श्राद्ध और तर्पण। श्राद्ध अर्थात श्रत् सत्य का नाम है- श्रत्सत्यं दधाति यया क्रियया सा श्रद्धा श्रद्धया यत्क्रियते तच्छ्राद्धम्। अर्थात- जिस क्रिया से सत्य का ग्रहण किया जाय उस को श्रद्धा और जो श्रद्धा से कर्म किया जाय उसका नाम श्राद्ध है। तर्पण शब्द की व्याख्या करते हुए कहा गया है-तृप्यन्ति तर्पयन्ति येन पितॄन् तत्तर्पणम् अर्थात- जिस-जिस कर्म से तृप्त अर्थात विद्यमान माता पितादि पितर प्रसन्न हों और प्रसन्न किये जायें उस का नाम तर्पण है। परन्तु यह जीवितों के लिए है, मृतकों के लिए नहीं।

लौकिक मान्यतानुसार भी  जन्म देने वाले और अनेक कष्ट सहकर पालन- पोषण करने वाले माता-पिता को वृद्धावस्था में अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। उनका श्राद्ध और तर्पण अवश्य करना चाहिए, उनकी सेवा करना चाहिए। उन्हें दुःख नहीं देना चाहिए। ये प्रत्येक सन्तान का कर्त्तव्य भी है और धर्म भी है। श्राद्ध का अर्थ है सत्य का धारण करना अथवा जिसको श्रद्धा से धारण किया जाए। श्रद्धापूर्वक मन में प्रतिष्ठा रखकर, विद्वान, अतिथि, माता-पिता, आचार्य आदि की सेवा करने का नाम श्राद्ध है । इस प्रकार यह सिद्ध है कि श्राद्ध जीवित माता-पिता, आचार्य, गुरु आदि पुरूषों का ही हो सकता है, मृतकों का नहीं। मृतकों के श्राद्ध के बारे में सिर्फ पौराणिक ग्रन्थों में ही वर्णन प्राप्त है। वैदिक ग्रन्थों में तो मृतक श्राद्ध का नाम भी कहीं अंकित नहीं है। वेद में तो बड़े स्पष्ट शब्दों में माता-पिता,गुरु और बड़ों की सेवा का आदेश दिया गया है-

अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः । -अथर्ववेद 3- 30-2

अर्थात-पुत्र पिता के अनुकूल कर्म करने वाला और माता के साथ उत्तम मन से व्यवहार करने वाला हो।

मृतक के लिए वर्तन देने, मृतक का श्राद्ध इस विधि से करने पर वे मृतक के पास पहुँच जायेंगे, इस प्रकार का विधान अथवा वर्णन किसी वेदमन्त्र में नहीं है। वेद मत में श्राद्ध जीवितों का ही हो सकता है, मृतकों का नहीं। पितर संज्ञा भी जीवितों की ही होती है, मृतकों की नहीं। पितर शब्द पा रक्षेण धातु से बनता है। अतः पितर का अर्थ पालक, पोषक, रक्षक तथा पिता होता है। जीवित माता-पिता ही रक्षण और पालन-पोषण कर सकते है, मृत दूसरों की रक्षा तो क्या करेगा उससे तो अपनी रक्षा भी नहीं हो सकती। अतः मृतकों को पितर मानना मिथ्या तथा भ्रममूलक है। वेद, रामायण, महाभारत, गीता, पुराण, ब्राह्मण ग्रन्थ तथा मनुस्मृति आदि ग्रन्थों के समीचीन अध्ययन से यह स्पष्ट विदित हो जाता है कि पितर संज्ञा जीवितों की है मृतकों की नहीं। यजुर्वेद का वचन है-

उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु ।

त आ गमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु ते अवन्त्वस्मान ।। -यजुर्वेद 19-57

अर्थात- हमारे द्वारा बुलाये जाने पर सोमरस का पान करनेवाले पितर प्रीति कारक यज्ञो तथा हमारे कोशों में आयें । पितर लोग हमारे वचनों को सुने, हमें उपदेश दें तथा हमारी रक्षा करें ।

इस मन्त्र से यह स्पष्ट है कि पितर जीवित होते है, मृतक नहीं, क्योंकि मृतक न आ सकते हैं, न सुन सकते हैं, न उपदेश कर सकते हैं और न रक्षा कर सकते हैं। अथर्ववेद में कहा गया है-

आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येदं नो हविरभि गृणन्तु विश्वे । । -अथर्व वेद 18-1- 52

अर्थात- हे पितरो ! आप घुटने टेक कर और दाहिनी ओर बैठ कर हमारे इस अन्न को ग्रहण करें ।

इस मन्त्र में सबको घुटने झुककर वेदी के दक्षिण ओर बैठने के लिए कहा गया है। प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या मुर्दों के घुटने होते है? क्या वके घुटने टेककर बैठ सकते हैं?? नहीं। इस वर्णन से प्रकट हो जाता है कि जीवित प्राणियों की ही पितर संज्ञा है। वाल्मीकि रामायण 18/13 के अनुसार धर्म -पथ पर चलने वाला बड़ा भाई ,पिता और विद्या देने वाला –ये तीनों पितर जानने चाहिए। चाणक्य नीति 5/22 के अनुसार विद्या देनेवाला, अन्न देनेवाला, भय से रक्षा करने वाला, जन्मदाता, ये मनुष्यों के पितर कहलाते हैं। श्वेताश्वेतारोपनिषद 5/10 के अनुसार यह आत्मा न स्त्री है, न पुरुष है न ही यह नपुंसक है, किन्तु जिस-जिस शरीर को ग्रहण करता है, उस उस से लक्षित किया जाता है। मरने के बाद इसकी पितर संज्ञा कैसे हो सकती है? दुर्जनतोषन्याय वश भी मृतक श्राद्ध को स्वीकार कर लिए जाने पर इससे अनेक दोष होने की सम्भावना होगी। प्रथम दोष कृतहानि अर्थात कर्म कोई करे और फल किसी और को मिलने का होगा। अर्थात परिश्रम कोई करे और फल किसी और को मिले। दान पुत्र करे और फल माता-पिता को मिले तो कृतहानि दोष आएगा। द्वितीय दोष अकृताभ्यागम अर्थात कर्म किया नहीं और फल प्राप्त हो जाए का होगा।

मनुष्य के न्याय में तो ऐसा हो सकता है कि कर्म कोई करे और फल किसी और को मिल जाए, परन्तु परमात्मा के न्याय में ऐसा नहीं हो सकता। पौराणिक मान्यतानुसार फल को अर्पण करने के कारण दूसरे को मिल जाता है, परन्तु यह असत्य बात है और ऐसा होता कभी देखा नहीं गया। बेटा किसी व्यक्ति को मारकर उसका फल पिता को अर्पण कर दे तो क्या पिता को फांसी हो जायेगी? ऐसा सम्भव होने पर तो लोग पाप का संकल्प भी पुरोहित, पंडितों के नाम ही करने लग जायेंगे। इन दोषों के के कारण भी मृतक श्राद्ध सिद्ध नहीं होता। इस प्रकार यह स्पष्ट सिद्ध है कि श्राद्ध जीवित माता -पिता का ही हो सकता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने भी वैदिक सिद्धांत को ही अटल सिद्धांत मानकर कहा है कि मृतक श्राद्ध अवैदिक और अशास्त्रीय है। यह तर्क से सिद्ध नहीं होता।

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