modi repeal farm law एक अहिंसक आंदोलन ने एक प्रधानमंत्री को घुटने पर बैठा दिया
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एक अहिंसक आंदोलन ने एक प्रधानमंत्री को घुटने पर बैठा दिया

भोपाल। साल में सात दिन कम लगे – पर केंदीय सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी को दूसरी बार अपना फैसला बदलने पर मजबूर किया ! जिन मोदी जी ने साल भर चले किसान आंदोलन को परजीवी और कुछ स्वार्थी और राजनीतिक तथा देशद्रोही ताकतों द्वारा प्रेरित, संसद में कहा था, उन्हीं ताकतों की मांगों को स्वीकार करने पर मजबूर होना पड़ा ! आखिर क्यूं, जवाब है जिन दो औद्यगिक घरानों के अंधाधुंध लाभ के लिए मोदी जी ने करोड़ों किसानों के हितों की अनदेखी की थी, वे किसान अब विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को पराजय दिलाने की शक्ति बन गए थे ! यह फैसला कृषि सुधार के नाम पर थैलिशाहों के लिए था। साल भर में किसानो ने पंचायते कर के इसका खुलासा किया तब देश के अनेक प्रांतो में किसान जाग उठा। modi repeal farm law

दिल्ली में किसानों को रोकने के लिए जैसी “कीले गाड़ी गयी काँटेदार लगाए सड़क खोद कर दीवाल खड़ी की” पीने के पानी जिसे दिल्ली की केजरीवाल भेज रही थी उसे रोका गया। इन सब मुसीबतों को सहते हुए किसानों ने तीनों मौसम की मार खाते हुए लगभग 700 साथियों की शहादत दी तब उनकी मांग मानी गयी। पर किसान नेता टिकैत ने कहा कि हम कहने मात्र से अपने घरों को नहीं लौटने वाले, जब तक यह तीनों कानून संसद द्वारा निलंबित या खारिज नहीं किए जाते और फसलों के लिए न्यूनतम मूल्य का कानून नहीं बनता तब तक आंदोलन जारी रहेगा। यानि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान उनके लिए कोई अर्थ नहीं रखता है। प्रधानमंत्री के कथन को अविश्वसनीय मानने का कारण भी हैं। विगत में उन्होंने चुनावो में जो जो वादे किए वे जमीन पर कभी नहीं पूरे हुए , हाँ विज्ञापनों में उनका दावा किया जाता रहा।

2. प्रधानमंत्री की माफी और तपस्या में कमी बनाम 700 किसानों की मौत तथा साल भर तक सड़क पर धरना देते सर्दी – बारिश और गर्मी सहते किसानों का दर्द !

आंदोलन के दौरान किसानों के लंगर और उनके निवास की सुविधाओं को लेकर संघ और बीजेपी के केंद्रीय और राज्यों के मंत्री तथा छुटभैये नेता जिस प्रकार के अपमानित लांछन लगाते थे और उनकी सहायता के लिए आतंकियों के पैसे के इस्तेमाल का आरोप लगते थे क्या आज वे अपना चेहरा दिखयेंगे ? संघ और बीजेपी के लोग सरकार के संरक्षण में जिस प्रकार भीड़ बना कर सावरकर के समर्थन में और विपक्षी दलों के विरुद्ध दो घंटे का जुलूस निकलते थे उसे वे जन समर्थन कहते थे। पर उत्तर प्रदेश में हाल में हुई अमित शाह और नरेंद्र मोदी की सभाओं में करोड़ों रुपये खर्च कर बसों से भीड़ जुटाई गयी, उसके मुक़ाबले समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव की रथ यात्रा में उमड़े जन सैलाब ने इनको जमीनी हक़ीक़त बता दी। उधर काँग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने महिला सशक्तिकरण की मुहिम में चालीस फीसदी सीट महिलाओं के ऐलान ने महिलाओं को एक नेत्रत्व दिया एवं लखीमपुर खीरी कांड में उनकी पहल ने भी किसानों औए जन सामान्य में उनकी पैठ बनाई है।

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इन विपक्षी नेताओं की सभा और रैलियों में जो जन सैलाब उमड़ा वह स्वस्फूर्त था। बसों से लाया गया नहीं ! बस यही एक तथ्य हैं जिसने पार्टी और उसकी सरकार की जनता में गायब होती छवि का मूल्यांकन कर दिया था। जिससे घबराकर पार्टी अध्यक्ष जे पी नड्डा और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तथा अमित शाह को बूथ इंचार्जों का जिम्मा दिया हैं ! अब चुनाव में इस क़द के लोग दौरा और सभाएं करते हैं। पर ऐसे जिम्मेदार नहीं बनाये जाते हैं। बहुत हुआ तो उन्हें क्षेत्र विशेष की ज़िम्मेदारी होती हैं। परंतु जिस प्रकार यह दायित्व दिया गया हैं, वह बीजेपी नेताओं के भयभीत होने का प्रमाण हैं।

3. विदेशों में मोदी सरकार की बदनामी और किसानों के समर्थन में होते आंदोलन और निकलते जुलूस साल भर चले। इस किसान आंदोलन को न केवल देश में वरन ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, न्यूजीलैंड, आयरलैंड में निकालने वाली रैलियों से भारत सरकार और गगग्न विहारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पर बदनुमा दाग बन रही थी। मोदी समर्थकों द्वारा प्रायोजित लोग भी धीरे धीरे उत्साह खो रहे थे। विदेशों में आपको आंदोलन या जुलूस के उद्देश्यों और कारणों में आस्था होना जरूरी है। जो मोदी के गुजरती समर्थक, जो अधिकतर व्यापारी है, उन्हें पैसा लगाकर धूमधाम करना तो आता हैं पर वे किसानी के बारे में कोई जानकारी नहीं होने से विदेशी लोगों को अपने मोदी समर्थन का कारण नहीं बता पा रहे थे।

दूसरा विदेशी मीडिया लगातार इस आंदोलन के लगातार चलने और इसमें शामिल किसानों के रहने – और खाने के बंदोबस्त को लेकर चकित था। सबसे आधी वे लगातार चल रहे आंदोलन में महिलाओं और बच्चों की सहभागिता से भी चकित थे। वे इन सब बातों को लगातार अपनी बुलेटिन और अखबार में स्थान दे रहे थे। इतना ही नहीं ब्रिटिश हाउस ऑफ कोममन्स हो या कनाडा की संसद अथवा अमेरिकी काँग्रेस में भी किसान आंदोलन की गूंज उठी। वे सर्वाधिक प्रभावित थे कि साल भर चले इस आंदोलन का रूप पूरी तरह अहिंसक रहा। इससे भी प्रधानमंत्री चिंतित थे।

4. मोदी के कुछ परम भक्तों ने प्रधानमंत्री के इस फैसले को लोकतंत्र की परिपक्वता बताया है ! हमेशा से इन परम लोगों का काम रहा हैं कि पहले ऐसा हुआ था तो अब हुआ तो क्या हुआ। वे अभी भी इसी बात की रट लगाए हैं कि ये कानून जमीन पर आए ही नहीं तब कैसे इनके बारे सही स्थिति पता चल सकती हैं। वैसे इन परम भक्तों यह नहीं मालूम कि सात सालों में यह दूसरा अवसर हैं जब मोदी सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा पहला मौका था जब सरकार “भूमि अधिग्रहण कानून” के वर्तमान मुआवजा के नियम बदलना चाहता था, क्यूंकि उनके औद्योगिक दोस्तों को किसानों की जमीन का मुआवजा बहुत ज्यादा देना पड़ता था। परंतु इस कानून का विरोध बीजेपी के अंदर ही होने लगा। क्यूंकि सभी के इलाके में किसानों की बहुलता थी और इस बदलाव से किसान की रोजी -जमीन भी जाती और उसे ठीक मुआवजा भी नहीं मिलता। परिणाम स्वरूप वे चुनाव में पराजित होते। इसी भय से सरकार ने उसे वापस लिया। इस बार फिर वही स्थिति हैं पर एक मजबूत तरीके से। दूसरे उत्तर परदेश में पराजय का मतलब मोदी की गद्दी का खिसकना।

एक परम भक्त ने किसान आंदोलन की तुलना 2011 के अन्न के आंदोलन से करते हुए विश्वास जताया कि उस आंदोलन को भी सरकार ने कुचला था। मोदी चाहते तो किसान आन्दोलन को भी कुचल सकते थे। उन्हें अन्ना आंदोलन के कारणों का ज्ञान नहीं हैं। अन्ना हजारे का आंदोलन सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार को मिटाने को लेकर था। और उनकी मांग थी एक ऐसा “लोकपाल” होना चाहिए जो सिर्फ जनता के प्रति जवाबदेह हो। पर उसका चुनाव कैसे हो और उसके अधिकार क्या हो इसको लेकर कोई निश्चित रॉय नहीं थी। अब इस संविधान से इतर मांग को कोई भी सरकार कैसे पूरा कर सकती हैं? दूसरा उनका आरोप है कि इस आंदोलन में सरकार ने रामलीला मैदान में पुलिस एक्शन लेकर बाबा रामदेव को स्त्री के कपड़े पहन कर भागना पड़ा। इसे वे सरकार की हिंसा बताते हैं।

उनका विश्वास है कि मोदी जी चाहते तो साम – दाम – दंड – भेद से आंदोलन को खतम करा सकते थे ! तब क्या मोदी सरकार ने ऐसा प्रयास किया नहीं ? कितनी ही बार चोरी छुपे लोगों को धन का लालच देकर तोड़ने की कोशिश की। लेकिन जिस व्यक्ति के साथ यह प्रयास किया गया उसने मंच से अपनी बीती सबको बताई। दंड की कोशिश कई बार हुई पर दंड के लिए किसान सामूहिक रूप से तैयार बैठे थे। उनका कहना था कि या तो कानून वापस होगा या हमारी लाश घर जाएगी क्यूंकि जमीन के बिना तो किसान वैसे ही मारा हुआ समझो। दूसरा जिन सेना के जवानों के नाम और कुर्बानी पर मोदी जी वोट कबाड़ते थे वे भी किसानों के साथ कंधा से कंधा मिलकर खड़े थे। मोदी जी ने 90% मीडिया को किसान आंदोलन की हक़ीक़त दिखाने से ना केवल मना कर दिया था, वरन उनको बदनाम करने के लिए बीजेपी की आईटी सेल नाते नए बयान अपने नेताओं को सुलभ कराती थी जिसे “गोदी मीडिया” नमक मिर्च लगा कर दिखाता था। चार – पाँच एxकर तो विख्यात हो गए थे। मोदी के सिपहसालार। तो मिश्रा जी को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए की मोदी सर्वशक्तिमान हैं, वे झुक नहीं सकते। यह तो उनकी बड़ाप्पन हैं कि अपनी अधूरी तपस्या की माफी मांग रहे हैं। वैसे उनके यहां तो माफी मांगने वालो को भी वीर कहते हैं।
लेखक: विजय तिवारी 

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