politics congress bjp punjab कल्पतरु की टहनियां और भोथरी कुल्हाड़ियां
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कल्पतरु की टहनियां और भोथरी कुल्हाड़ियां

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परस्पर सम्मान, परस्पर विश्वास और परस्पर स्नेह की तीन डालियों वाला कल्पतरु किसी भी राजनीतिक दल के आंगन को अविनाशी बनाता है। जिन्हें इन डालियों पर कुल्हाड़ी चलानी है, चलाएं। लेकिन यह दूरगामी परिणाम गांठ बांध लें कि जब टहनियां नहीं होंगी तो फूल-पत्ते भी नहीं होंगे और ठूंठ पर बैठ कर साम्राज्य नहीं चला करते। (politics congress bjp punjab)

हालांकि अपने मुख्यमंत्रियों को बदली-मज़दूर समझने वाली, नरेंद्र भाई मोदी और अमित भाई शाह की, भारतीय जनता पार्टी को तो पंजाब में कांग्रेसी मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के बदले जाने के तौर-तरीकों पर हाय-तौबा मचाने का कोई हक़ है ही नहीं; लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि कांग्रेस की सांगठनिक सियासती शैली मे आ रहे बदलावों पर संजीदगी से ग़ौर करने की ज़रूरत ही समाप्त हो गई है। यह ज़रूरत तो दरअसल बढ़ गई है।

मुद्दा अमरिंदर सिंह नहीं हैं। हो सकता है कि उन्हें हटाए जाने में ही पंजाब और कांग्रेस का भला था। हो सकता है कि नवजोत सिंह सिद्धू और चरणजीत सिंह चन्नी की जुगल-जोड़ी लाए बिना पंजाब में कांग्रेस पांच महीने बाद होने वाला विधानसभा चुनाव जीत ही नहीं पाती। हो सकता है कि अब वोटों की मूसलाधार से कांग्रेस का तन-बदन गच्च-गच्च गीला हो जाए। तिस पर भी, मुद्दा यह है कि, हालात कुछ भी हों, कांग्रेस अपने दीर्घकालीन हमजोलियों के प्रति सद्व्यवहार के मूल राजनीतिक संस्कारों से भटकती क्यों दिखाई दे रही है?

ऐसा नहीं है कि अमरिंदर सिंह सियासी-फ़रिश्ते हैं। उनके बारे में बतकहियां पंजाब की पगडंडियों के पग-पग पर आपको सुनने को मिलेंगी। यह कथाएं सच्ची भी हो सकती हैं और झूठी भी। क़िस्साग़ो बताते हैं कि अमरिंदर मनमौजी थे; उनका राज-काज दरबारी कारिंदे चलाते थे; वे कांग्रेस के आलाकमान को ठेंगे पर रखते थे; वे मिलने-जुलने के लिए सुलभ नहीं थे; उनकी ललित-मित्रता पाकिस्तान की किसी पत्रकार से इतनी गहरी थी कि वह कुछ महीनों पहले तक उनके महल में ही रहती थी और सरकारी कामकाज तक में उसका दख़ल रहता था; उन्होंने पति-पत्नी के एक जोड़े को राज्य की प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था का मुखिया बना देने का अभूतपूर्व कीर्तिमान क़ायम कर डाला था; उनके कुछ मंत्री और अफ़सर पंजाब में शराब और मादक पदार्थों के धंधे में लिप्त थे और यह सब उनकी जानकारी में था; और, सब से बड़ी बात कि वे नरेंद्र मोदी,  अमित शाह और अजित डोवाल के गुचपुच संपर्क में थे।

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मुझे नहीं मालूम कि इन किस्सों में कितना दम है। अगर अमरिंदर की पगड़ी पर ये सारे छींटे सच्चे भी हों तो यह बताइए कि किसी भी राजनीतिक दल का हो, देश का कौन-सा मुख्यमंत्री है, जो कम-ज़्यादा अपनी झौंक में नहीं रहता है? कौन-सा मुख्यमंत्री है, जिसका राज-काज महज़ कारकूनों के भरोसे नहीं चल रहा है? कौन-सा मुख्यमंत्री या नेता है, जो मिलने-जुलने के लिए सुलभ है? कौन-सा मुख्यमंत्री है, जिसके यार-दोस्त और पट्ठे सरकारी कामकाज में दख़ल नहीं देते हैं? कौन-सा मुख्यमंत्री है, जिसे अपने प्रदेश में चल रहे गड़बड़ धंधों की जानकारी नहीं है और जो उनकी अनदेखी नहीं करता है? कांग्रेस और विपक्ष के बड़े चेहरों में कितने ऐसे हैं, जो नरेंद्र-अमित भाई से नयनों-ही-नयनों में बात नहीं करते हैं?

इसलिए मुझे लगता है कि कांग्रेसी बरामदे से अमरिंदर सिंह को विदा करने के बेहतर तरीके सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के पास थे। उनकी विदाई को भले न माना गया हो, लेकिन आम जन-धारणा ने विदाई की पूरी प्रक्रिया के भोथरेपन को तो निश्चित ही ‘ग़ैर-ज़रूरी’ माना है। कोई माने-न-माने, इस पूरे प्रसंग से, अमरिंदर की महिमा भले न बढ़ी हो, कांग्रेस के शिखर नेतृत्व की गरिमा ज़रूर थोड़ी दरकी है। सोनिया-राहुल-प्रियंका से तो जा कर किस की कहने की हिम्मत है, लेकिन कांग्रेस के भीतर छोटे-बड़े सब इस मसले पर कुनमुना रहे हैं। और, यह मत समझिए कि वे परिवार-विरोधी हैं। उनमें निन्यानबे फ़ीसदी चेहरे परिवार के ताल-ठोकू हिमायती हैं।

ऐसा क्यों नहीं हो सकता है कि जब-जब अमरिंदर सरीखे मसले सामने आएं, सोनिया-राहुल-प्रियंका में से कोई भी द्वंद्व का समाधान निकालने के लिए व्यक्ति-विशेष को बुला कर सीधे बात कर ले? आख़िर अपने किसी भी सहयोगी की कार्यशैली में ख़ामियों पर खुल कर बात करने में नेतृत्व को कोई हिचक क्यों होनी चाहिए? अपना संदेश किसी तक साफ-साफ पहुंचाने के लिए आड़े-तिरछे रास्ते अपनाने का काम किसी भी आलाकमान को क्यों करना चाहिए? छोटे-से-छोटे और नए-से-नए चेहरों को रातों-रात कंचनजंघा पहुंचा देने में जिनकी क़लम नहीं हिचकती है, उन्हें बड़े-से-बड़े और पुराने-से-पुराने साथियों को कांकड़ाखोह के हवाले करते वक़्त चर्चा करने से क्यों झिझकना चाहिए?

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सांगठनिक व्यवस्थाएं जी-हुज़ूरियों और कारिंदों के भरोसे नहीं चला करतीं। वे सीधे और स्पष्ट संप्रेषण से चलती हैं। परस्पर विश्वास का संकट किसी भी संगठन के लिए आत्मघाती होता है। राजनीतिक संगठन सैन्य-पलटन की तरह नहीं चलाए जा सकते। उनमें अनुशासन होना चाहिए, मगर इतिहास बताता है कि यह अनुशासन हुक़्म से कायम नहीं किया जा सकता। इसके लिए तो आपसी भरोसे और स्नेह की दरकार होती है। जिन राजनीतिक संगठनों में यह अनुपस्थित है, वे प्राणहीन हैं।

सात-आठ बरस में भारतीय जनता पार्टी इसकी सबसे बड़ी मिसाल के तौर पर हमारे सामने आई है। संसद में भारी बहुमत और ज़्यादातर राज्यों में सरकारें होने के बावजूद भाजपा के फूले गाल केंद्र की सत्ता में आने के छह साल बीतते-बीतते ही पिचकने लगे। पिछले डेढ़ साल से भाजपा के चेहरे पर बेतरह हवाइयां उड़ रही हैं। यह पलटनवाद की हवस में अंधे हो जाने का नतीजा है। यह परस्पर विश्वास की जगह क्षुद्र प्रपंचों के सिंहासनारूढ़ हो जाने का परिणाम है। आप देखना, मोशा-हथौड़ा अगले तीन साल में भाजपा का भेजा पूरी तरह फोड़-फाड़ देगा। हिंदुत्ववाद को मिल रहे समर्थन के बावजूद, हिंदू हृदय सम्राटों की आज्ञा-सूची के पन्ने ही उनकी राजनीतिक इच्छाओं का शव-वस्त्र बन जाएंगे।

पलटन-परंपरा का पालन कर रहे बाकी सब का भी यही हाल है। मायावती हों या अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल हों या नवीन पटनायक और जगनमोहन रेड्डी हों या के. चंद्रशेखर राव – सब की सियासत का उलटा सफ़र शुरू हो गया है। हर तरह की सियासी-चोट्टई के बाद भी चौटालाओं की पार्टी का क्या हुआ? बरसों जयललिता के इशारे पर क़दमताल करती रही अन्नाद्रमुक आज कहां है? जिन्हें अपने हुक़्म की बंदूक पर नाज़ था और जो सत्ता की महानदी का उद्गम उसकी नली को मानते थे, उनके राजनीतिक दल किन खाइयों में खो गए? यह सब इसलिए हुआ कि आपस का विश्वास छीजता गया और बड़ों का बड़प्पन मूर्छित होता गया।

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सो, कांग्रेस के लिए तो यह समय रट्टू-ढोंगी फड़फड़ियों, कपटी-विवेकहीन मुरलीगोपालों, मतलबपरस्त-जालसाज़ सूरजमुखियों और थैला-बटोरू आंकड़ेबाज़ों से निज़ात पा कर विदुरों की तलाश में निकलने का है। 2024 की तैयारी के लिए पंजाब की जीत ज़रूरी है, उत्तर प्रदेश से योगी की विदाई ज़रूरी है और उत्तराखंड में कांग्रेस की वापसी ज़रूरी है। 2024 में किसी भी सार्थक दृश्य को आकार देने के लिए राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अगली बार फिर कांग्रेस की सरकारें आना ज़रूरी है और मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार लाना ज़रूरी है। आपसी शक़-शुबहे इस राह का सब से बड़ा अड़ंगा हैं। उन्हें हवा देने वाली भजन-मंडली के नकली कीर्तन इस रास्ते का सब से बड़ा रोड़ा हैं।

हमारे आदिशास्त्रों ने मनुष्य के भीतर अधूरी रह जाने वाली इच्छाओं की पीड़ा को पहचाना है। इस पीड़ा से मुक्त होने के लिए कल्पतरु नाम के वृक्ष का ज़िक्र धर्म-ग्रंथों में आता है। ऐसा वृक्ष, जिसके नीचे बैठ कर आप जो भी इच्छा करेंगे, पूरी हो जाएगी। परस्पर सम्मान, परस्पर विश्वास और परस्पर स्नेह की तीन डालियों वाला कल्पतरु किसी भी राजनीतिक दल के आंगन को अविनाशी बनाता है। जिन्हें इन डालियों पर कुल्हाड़ी चलानी है, चलाएं। लेकिन यह दूरगामी परिणाम गांठ बांध लें कि जब टहनियां नहीं होंगी तो फूल-पत्ते भी नहीं होंगे और ठूंठ पर बैठ कर साम्राज्य नहीं चला करते। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

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