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Friday, May 14, 2021
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राजनीतिक भ्रांतियों में उलझा शहर

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लेखक: सुशील कुमार सिंह

ये डबल इंजिन की सरकार क्या होता है? अगर इस जुमले में कोई दम होता यानी अगर इससे सचमुच किसी बेहतरी की गारंटी होती तो अब तक कई प्रदेशों की काया पलट हो चुकी होती। ठीक ऐसी ही एक भ्रांति दिल्ली को लेकर भी बनी हुई है। यह कि दिल्ली और केंद्र में जब एक ही पार्टी की सरकार हो तब दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल अथवा केंद्र के बीच कोई टकराव नहीं होता। इस भ्रांति ने दिल्ली के राजनैतिक दलों के पूर्ण राज्य की मांग के अभियान को खासी ठेस पहुंचाई है। याद रखिए, चौधरी ब्रम्ह प्रकाश को जब पद छोड़ना पड़ा तब केंद्र और दिल्ली में एक ही पार्टी की सत्ता थी और जब शीला दीक्षित के कामों में उपराज्यपाल अड़चन डाल रहे थे तो उस समय भी दोनों जगह कांग्रेस काबिज थी।

जी हां, यह एक और बड़ी भ्रांति है, बल्कि प्रचार है कि शीला दीक्षित पंद्रह साल तक मुख्यमंत्री रहीं और उन्हें केंद्र से कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। कभी कोई टकराव नहीं हुआ। राजनीतिक कारणों से स्वयं शीला दीक्षित और उनकी पार्टी ने इस भ्रांति को स्थापित करने का काम किया। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपराज्यपाल के बीच चल रहीं समस्याओं के संदर्भ में शीला दीक्षित ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था कि ‘हमारे समय में तो ऐसा कुछ नहीं हुआ। कोई समस्या आती भी थी तो हम जाकर बात कर लेते थे और बात खत्म हो जाती थी।‘ मगर उनके इस दावे के कुछ ही समय बाद पुडुचेरी के तत्कालीन मुख्यमंत्री वी नारायाणसामी अपनी उपराज्यपाल किरण बेदी के रवैये के विरुद्ध राजनिवास के बाहर धरने पर बैठ गए। वे छह दिन तक वहीं फुटपाथ पर सोए भी। मगर तब न तो शीला दीक्षित ने उन्हें समझाया और न उनकी पार्टी ने कि भैया टकराव का रास्ता छोड़ो और जाकर बात कर लो।

सच्चाई यह है कि मुख्यमंत्री के तौर पर शीला दीक्षित को भाजपा की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के बनाए उपराज्यपाल विजय कपूर से उतनी परेशानी नहीं हुई जितनी मनमोहन सिंह सरकार के नियुक्त किए उपराज्यपालों से हुई। ये महानुभाव थे बीएल जोशी और तेजिंदर खन्ना। बीएल जोशी के समय टकराव के मुख्य मुद्दे थे बिल्डिंग बाइलॉज़, लैंडयूज़ पॉलिसी और अवैध कॉलोनियों का नियमितिकरण। मुख्यमंत्री विदेश जाएंगी या नहीं या उनका कोई मंत्री विदेश जाएगा कि नहीं, इस पर भी जोशी ने आपत्तियां उठाई थीं। उपराज्यपाल का मानना था कि उनसे पूछे बगैर कोई मंत्री देश से बाहर कैसे जा सकता है। यह उन दिनों बड़ा मसला बना था। फिर जोशी की जगह तेजिंदर खन्ना आ गए। यह 2007 का बरस था। उनके साथ शीला दीक्षित की अनबन फ्लाईओवरों को लेकर शुरू हुई। यह मामला ठंडा पड़ता उससे पहले दोनों में सर्कल रेट्स पर विवाद खड़ा हो गया। हालत यह हो गई कि एक-दूसरे पर किए उनके तंज ख़बरें बनने लगे। ये खबरें महीनों तक चलीं। दस-जनपथ में शीला दीक्षित की सीधी पहुंच के प्रचार के बावजूद ऐसा हुआ।

सारा झगड़ा दिल्ली पर अधिकारों का है। संविधान सभा तक में इस मुद्दे पर लंबी बहस हुई थी कि एक शहर जो कि देश की राजधानी है, वह किसी और सरकार की भी राजधानी कैसे हो सकता है। मगर दुनिया के कई देशों में ऐसा तब भी था और आज भी है। संविधान सभा में यह सुझाव भी रखा गया था कि नई दिल्ली को बाकी दिल्ली से अलग कर दिया जाए। नई दिल्ली केंद्र सरकार की राजधानी रहे और बाकी दिल्ली ईस्ट पंजाब (जो कि बाद में हरियाणा बना) की राजधानी बन जाए। ऐसे कितने ही सुझाव बाद में भी दिए जाते रहे। मसलन, पूरा लुटियन्स ज़ोन केंद्र के पास रहे और बाकी दिल्ली को राज्य बना दिया जाए। या पूरा एनडीएमसी का इलाका केंद्र अपने पास रख ले और बाकी को राज्य घोषित कर दे। मगर केंद्र की कोई भी सरकार अपना थोड़ा भी कब्ज़ा छोड़ने को तैयार नहीं हुई। उन सबको पूरी दिल्ली चाहिए थी।

इस मामले में सबसे ज्यादा जोर लगाया था मदन लाल खुराना ने। महानगर परिषद में अपनी अधिकार विहीन सत्ता भुगत चुकी भारतीय जनता पार्टी ने 1983 में महानगर परिषद और दिल्ली नगर निगम के चुनावों के समय ही पूर्ण राज्य की मांग नए सिरे से छेड़ दी थी। उसी भाजपा ने जिसकी इन दिनों केंद्र में सरकार है। मदन लाल खुराना इस अभियान के लगभग अगुआ थे। उनके इस अभियान को परोक्ष रूप से दिल्ली के कांग्रेसी नेताओं का भी समर्थन हासिल था, इसीलिए राजीव गांधी की सरकार ने इस सिलसिले में सरकारिया कमेटी का गठन किया जो बाद में बालाकृष्णन कमेटी में तब्दील हो गई। इस कमेटी की रिपोर्ट के इंतजार में 1987 में दिल्ली नगर निगम के और 1988 में महानगर परिषद के चुनाव भी टाल दिए गए। आखिरकार यह रिपोर्ट 1989 में आई जिसने दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश रखते हुए भी विशेष दर्जा देते हुए विधानसभा प्रदान करने की सिफारिश की। यह एक तरह से 1952 वाली स्थिति में लौटने की सिफारिश थी जिसे 1992 में नरसिम्हा राव सरकार के समय संसद ने कानूनी शक्ल दी और 1993 में नई विधानसभा के पहले चुनाव हुए। इनमें भाजपा जीती और मदन लाल खुराना दिल्ली के तीसरे मुख्यमंत्री बने।

मुख्यमंत्री बनते ही मदन लाल खुराना ने नई विधानसभा, यानी सैंतीस साल लंबे इंतजार के बाद मिली विधानसभा, के पहले ही सत्र में दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग वाला प्रस्ताव पास करवाया। यह प्रस्ताव पटेल नगर के तत्कालीन विधायक मेवा राम आर्य ने रखा था। खुराना जानते थे कि दिल्ली के लिए जिस दर्जे की मांग वे करते रहे हैं, यह वह दर्जा नहीं है। इसलिए उनका अभियान जारी रहा जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और भाजपा के अन्य बड़े नेताओं का भी उन्हें साथ मिला। थोड़े ही दिनों में तब के उपराज्यपाल पीके दवे से खुराना की तनातनी शुरू हो गई। खुराना 1984 के सिख विरोधी दंगों की जांच के लिए जस्टिस आरएस नरूला की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाना चाहते थे जबकि केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार ऐसा होने नहीं दे सकती थी। उपराज्यपाल ने खुल कर इसका विरोध किया। नौबत यहां तक पहुंची कि एक दिन पीके दवे ने बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस करके मीडिया से कहा कि खुराना सरकार ने उनकी मंजूरी के बगैर सेल्स टैक्स की दरें बढ़ा दी हैं जो कि सरासर गलत है। तनातनी के बीच ही, जैन हवाला केस की डायरी में अपना नाम आने पर लाल कृष्ण आडवाणी के रास्ते पर चलते हुए मदन लाल खुराना ने इस्तीफा दे दिया। उनके बाद साहब सिंह वर्मा को भी उपराज्यपाल की आनाकानियां झेलनी पड़ीं। मगर विडंबना देखिए कि केंद्र में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी तो भारतीय जनता पार्टी मदन लाल खुराना के इस अभियान को भूल गई। यहां तक कि उसने 1998 में एक अधिसूचना से दिल्ली की निर्वाचित सरकार के अधिकारों का दायरा और सीमित कर दिया।

हाल में उपराज्यपाल को सरकार बताने वाला जो कानून नरेंद्र मोदी सरकार ने बनवाया है, उसे पेश करते हुए गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने कहा कि इससे दिल्ली के लोगों को बेहतर प्रशासन मिल सकेगा, उसमें स्पष्टता आएगी और इससे निर्वाचित प्रतिनिधियों और उपराज्यपाल के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध बनेंगे। इस कानून के पास होने पर भाजपा नेताओं में इसकी तारीफ करने की होड़ लग गई। ठीक जैसे कृषि कानूनों पर हुआ था। दिल्ली के तीनों मेयरों का तो कहना था कि अब दिल्ली का वास्तविक विकास होगा। कहना मुश्किल है कि जी किशन रेड्डी को मदन लाल खुराना के बारे में कितना पता है। मगर दिल्ली भाजपा के तमाम मौजूदा नेता खुराना को बखूबी जानते रहे होंगे। उनमें कई को तो खुराना ने ही आगे बढ़ाया होगा। वे यह भी जानते होंगे कि दिल्ली में आज तक भाजपा का मदन लाल खुराना से ज्यादा पैठ रखने वाला नेता कोई और नहीं हुआ है। इस मामले में डॉ. हर्षवर्धन की स्थिति तो बिलकुल विचित्र किन्तु सत्य जैसी है। वे दिल्ली की मदन लाल खुराना सरकार में मंत्री रहे थे। इस नाते वे न केवल मदन लाल खुराना के उस अभियान के साथी थे बल्कि 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा का घोषणापत्र जारी करते समय उन्होंने खुद कहा था कि अगर केंद्र में हमारी सरकार आएगी तो दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाएगा। उसके आठ साल बाद उन्हीं डॉ. हर्षवर्धन ने ध्वनि मत से दिल्ली की निर्वाचित सरकार के अधिकार घटाने में अपना योगदान दिया।

पता नहीं, आम आदमी पार्टी की सरकार इस मामले में आगे अपनी लड़ाई कैसे लड़ेगी। लेकिन उपराज्यपाल के साथ केजरीवाल का टकराव कभी भी शुरू हो सकता है। बिजली की दरें भी इसका कारण बन सकती हैं, जिन्हें बढ़ाने की मांग बिजली कंपनियों ने नियामक यानी डीईआरसी से की है। या हो सकता है कि कोई नया मुद्दा निकल आए। मगर कुछ ऐसे सबक हैं जो दिल्ली की स्थितियों से हमें मिलते हैं। पहला यह कि डबल या ट्रिपल इंजिन की सरकार एक भुलावा है। दूसरा, जो पूर्ण राज्य हैं उनके अधिकारों में भी जब केंद्र खुरपेंच करने से बाज नहीं आता तो विधानसभा मिलने के बावजूद किसी केंद्र शासित प्रदेश को वह कैसे मुक्त-हस्त छोड़ सकता है। तीसरा, सोलह लाख की आबादी वाला गोआ, एक करोड़ दस लाख वाला उत्तराखंड और पिछत्तर लाख आबादी वाला हिमाचल प्रदेश पूर्ण राज्य हो सकते हैं, लेकिन दिल्ली की तीन करोड़ से ऊपर आबादी केंद्र के कब्जे से बाहर नहीं जा सकती।

‘सरकार का मतलब उपराज्यपाल’ वाले कानून को पास कराते समय जी किशन रेड्डी ने दावा किया कि नया कानून 4 जुलाई 2018 के संविधान पीठ के फैसले के अनुरूप है। ध्यान रहे, संविधान पीठ ने इस फैसले में निर्वाचित सरकार के लिए रोजमर्रा की फाइलें उपराज्यपाल को भेजने की बंदिश खत्म कर दी थी। फिर, नया कानून उस फैसले के अनुरूप कैसे हो सकता है? केजरीवाल सरकार अपने जिन कामों पर इतराती फिरती है उनमें ज्यादातर उस फैसले के बाद ही संभव हुए हैं। इसलिए, हैरानी की बात यह है कि जो नरेंद्र मोदी सरकार देश की अनेक समस्याओं के लिए जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार बताती रही है उसने दिल्ली के मामले में वही किया जो पंडित नेहरू की सरकार ने किया था। नेहरू ने न सिर्फ एक बेहद लोकप्रिय मुख्यमंत्री को हटाया, बल्कि बाद में दिल्ली से विधानसभा ही छीन ली थी। उसी तरह मोदी सरकार ने एक निर्वाचित सरकार से वे अधिकार भी छीन लिए जो लंबी कानूनी लड़ाई के बाद न्यायपालिका ने उसे सौंपे थे।

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साभार - ऐसे भी जाने सत्य

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