रूस और चीन से ही सीख लें!

पहले चीन में शी जिनपिंग, फिर रूस में व्लादीमीर पूतिन, के सत्ता में स्थाई बने रहने के समाचार आए हैं। इस पर हमारा क्या रुख हो?  दोनों ही देशों के प्रेमी यहाँ अच्छी संख्या में हैं। चूँकि स्वतंत्र भारत में आरंभ से सत्ता में कम्युनिस्ट प्रभाव रहा, इसलिए भी यहाँ रूस चीन के प्रति लगाव, सदभाव की परंपरा बनी।तो क्या हमें आज भी रूस और चीन से कुछ सीखना चाहिए? आखिर, यहाँ शुरू से ही रूस व चीन से सीखने की परंपरा रही है। प्रथम प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के लेखन, भाषण में रूस की प्रशंसा, और वहाँ के उदाहरण अंत तक नियमित मिलते हैं। फिर जब तक चीन ने 1962 ई. में हमला कर नेहरू को तमाचा नहीं लगाया, तब तक वे कम्युनिस्ट चीन की भी वैसी ही बड़ाई करते, उस का पक्ष लेते रहे थे।

बहरहाल, कम से कम राजनीतिक सुधारों के लिए रूस और चीन से कुछ सीखने की जरूरत तो है। यह नहीं कि भारतीय राज्य-व्यवस्था एक-दलीय या तानाशाही हो जाए। लेकिन अनावश्यक तमाशे खत्म हों, और तिहरी चुनाव-प्रणाली की विशालकाय़ प्रक्रिया घटाई जाए। वैसे भी, संपूर्ण चुनाव राजनीतिक दलों के अंदरूनी अल्पतंत्र की बंधक है। अंततः इने-गिने लोग ही सब कुछ तय करते हैं। तो उन्हीं के हाथ में निर्णय करने की औपचारिक पारदर्शिता क्यों न रखें? ताकि वे भी खुल कर काम करें, उन्हें अनावश्यक नाटक की बाध्यता न हो, खर्च व समय बचे, तथा वैयक्तिक उत्तरदायित्व एवं शक्ति का ताल-मेल हो?

कुछ लोग पहले से ही भारतीय राजनीति को चीन-रूस की दिशा में जाता देख रहे हैं। एक पार्टी का विस्तार, उस पार्टी के असंख्य सहयोगी संगठनों का हर क्षेत्र में नियंत्रणकारी रुख, राजनीतिकरण, आदि चीनी प्रक्रिया के काफी कुछ समानांतर चलते प्रतीत होते हैं। स्वतंत्र चिंतन, विमर्श, शिक्षा-संस्कृति की गुणवत्ता, स्वायत्तता, आदि की चिंता लुप्तप्राय हो रही है। संपूर्ण राजनीतिक-बौद्धिक विमर्श दलगत विभाजन का शिकार है, और दिनो-दिन बनाया जा रहा है।

इस प्रकार, चाहे हमारे संविधान-निर्माताओं ने कुछ कल्पना की हो, हमारी वास्तविक राजनीति दोहरेपन से ग्रस्त है। इस के सिद्धांत-व्यवहार, कथनी-करनी में भारी विलगाव है। किसी भी प्रसंग में ‘दलित’, ‘मुस्लिम’, ‘संघी’, ‘वामपंथी’, ‘मराठी’, आदि विशेषण नियमित उपयोग होते हैं। तुलना में ‘राष्ट्रीय’, ‘भारतीय’, ‘सामाजिक’ जैसे विशेषणों के साथ विमर्श नगण्य है। अर्थात् विभाजक मानसिकता प्रभावी है। इस के घातक परिणाम को समय रहते समझना चाहिए।

आज यहाँ स्व-शासन कहने भर को है। यह गोरे विदेशियों द्वारा ‘फूट डालो, राज करो’ के बदले हमारे बीच के लोगों द्वारा वही करने में बदल गया। देशी शासक उसी तरह जनता से ऊपर हैं। भारी सुविधाओं, विशेषाधिकारों का उपयोग करते हैं। वस्तुतः अभी यहाँ संपूर्ण राजनीति-कर्म उन अतुलित विशेषाधिकारों की ललक के सिवा शायद ही कुछ है। यह सब यूरोपीय राजनीतिक जीवन में नहीं है।

हमारी राजनीति यूरोपीय विधान-तंत्र, आदि अपना कर भी उन का सही अनुकरण भी नहीं। उस में भारतीय ढिलाई, सामाजिकता, क्षमा, भीरुता, आदि का मनमाना समावेश कर उसे एक विकृत, भारी, व्यर्थ बोझ रूप चलाया जा रहा है। इस में न यूरोप वाली उत्तरदायित्व भावना है, न भूल करने वाले राजकर्मियों को विदा और दंडित करने की प्रवृत्ति है। इसीलिए, यहाँ सारी राजनीति स्वार्थपरता, लूट और नेताओं-अफसरों द्वारा आजीवन मजे करने की वृत्ति में बदल कर रह गई है।

दलीय राजनीति भी इसी का साधन बना दी गई। कहने को राजनीतिक दल ‘स्वैच्छिक’ संगठन हैं। मगर 52वाँ संविधान संशोधन (1985) करके दलों को संसद में वह अधिकार दे दिया गया, जो संविधान भावना और लोकतंत्र-विरुद्ध है। विधायिका में अपने दलीय सदस्य के कार्य, विचार पर कानूनी अंकुश रखना  यूरोप, अमेरिका में कदापि नहीं है। यहाँ सांसद, विधायक संविधान-पालन की शपथ लेते हैं। पर उन्हें संसद में भी पार्टी-निर्देशों से बाँध कर, दलीय स्वार्थ को संविधान/देश से ऊपर कर दिया गया!

हमारे संविधान में सभी पदों से संबधित विवरणों में ‘कोई व्यक्ति’, ‘कोई सदस्य’, आदि शब्दों का प्रयोग है। हरेक पद पर व्यक्ति की जिम्मेदारी केंद्रीय थी। उस व्यक्ति की दलीय संबद्धता, या निर्दलीयता, संविधान के लिए नितांत अप्रासंगिक थी। अतः दल-बदल रोकने के बहाने एक बाहरी संस्था, राजनीतिक दल को संसदीय कार्य में नियंत्रणकारी शक्ति दे देना संविधान को दो-कौड़ी बना देना हो गया। जब सांसद, विधायक को संविधान प्रदत्त अधिकार उस के दल ने छीन लिया, तब वह ‘स्वैच्छिक’ संस्था कैसे रह गई, जो संसद के उपर शासन करती है?

इस प्रकार, भारत में सत्ताधारी दल उसी दिशा में जा सकता है जो चीन में स्थापित है। हमारे राजकर्मियों की सब से बड़ी विशेषता उत्तरदायित्व-हीनता बन चुकी है। सांसद, विधायक, मंत्री, आदि देश-हित के कई काम इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि उन पर दल-बंदी कानूनन लागू है।नोट करें – राष्ट्रीय सुरक्षा, आंतरिक शांति-व्यवस्था, विदेश नीति, आदि पर संसद में कभी खुल कर विचार भी नहीं होता! सारी बातें दलबंदी यानी पूर्व-निर्धारित निष्कर्ष से तय होती हैं। तब, इस व्यर्थ कवायद के लिए संसद की क्या जरूरत है?  इतने भारी-भरकम, दोहरी-तिहरी चुनाव व्यवस्था की ही क्या जरूरत है? क्यों नहीं पूतिन और जिनपिंग की तरह सत्ता को संक्षिप्त कर दिया जाए? इस से बहुत बड़ा खर्च ही नहीं, सालाना लाखों लोगों के करोड़ों घंटे बेकार श्रम भी बचेंगे। कथित पार्टी-गतिविधि संक्षिप्त सहज हो सकेगी।

यह गंभीर विचार का विषय है। रूस, चीन की राज्य-व्यवस्था में भारी कमियाँ जरूर हैं। लेकिन जब हम यूरोपीय लोकतंत्र की आत्मा – वैयक्तिक स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व – को खत्म कर ही चुके हैं, तब उस के निर्जीव शरीर का बोझ ढोने से उलटे हानि बढ़ रही है। इसलिए रूसी-चीनी मॉडल से कुछ सीखकर हम हानि घटा और दक्षता बढ़ा सकते हैं। आखिर, इस्लामी आतंकवाद हो, भष्टाचार से निपटना, या ढाँचागत निर्माण, किसी चीज पर शीघ्र उचित निर्णय लेने में पूतिन या जिनपिंग को वैसी समस्या नहीं आती जो हमारे नेताओं को होती है। इस का कोई समाधान होना ही चाहिए।भारत में आर्थिक सुधारों से अधिक जरूरी राजनीतिक सुधार हैं। यहाँ दिनों-दिन अंतहीन मंत्रालय, विभाग, आयोग, संस्थान, आदि बिना सोच-विचार या अनुचित कारणों से बनते रहे हैं। कर्मचारी-तंत्र का विशाल बोझ बन कर वे काम का दुहराव, तिहराव या नकली दिखावा करने में संलग्न रहते हैं। कई बार उचित काम रोकते हैं। यूरोप, अमेरिका, जापान आदि से तुलना कर के यह साफ दिखेगा।

अतः सरकार का बेसँभाल आकार घटाना; राजनीतिक और अफसर, सभी प्रकार के अधिकारियों की जिम्मेदारी कड़ाई से तय करना; अनेकानेक सुविधाएं-विशेषाधिकार खत्म करना; दलों की भूमिका सीमित करना; राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि कर सब संस्थाओं के काम व्यवस्थित करना; नियम-पालन और कर्तव्य-पालन स्थापित करना; राजकीय कार्य में अवांछित तत्वों का आना हतोत्साहित करना; आदि अनिवार्य हो गए हैं। ऐसे सुधारों के बिना यहाँ शक्तिसंसाधनों की बर्बादी तथा गैरजबावदेही रोकना असंभव-सा है।

या तो वैयक्तिक उत्तरदायित्व स्थापित कर संसद, विधान सभा में दलीय-नियंत्रण बिलकुल सीमित करें। अथवा, कार्यपालिका प्रमुखों को सीधे निर्वाचित कर उन्हें प्रत्यक्ष अधिकार दें। ताकि विधायिका की शक्ति अलग रहे। ताकि हमारे कार्यपालक बिना सांसदों, विधायकों के समर्थन की चिंता किए, अपने पूरे कार्यकाल में देश-हित और समाज-हित के निर्णय कर सकें। इस पर हमें सचमुच अमेरिका या इंग्लैंड ही नहीं, रूस और चीन से भी सीखना चाहिए।

One thought on “रूस और चीन से ही सीख लें!

  1. कैसी विचित्र बात है कि हर बार की तरह इस बार भी आपका लेख गंभीर, सत्यनिष्ठ एवं शोधपरक होते हुए भी साझा नही किया जा रहा। कदाचित इसके पीछे कई कारण है, पर बड़ा कारण सत्य को नकारना/मुँह दूसरी और घुमा लेना लगता है। थोथी प्रगति/विकास का प्रचार और विमर्श के घटिया स्तर के चलते अब लोग इस बात को कैसे सहज स्वीकारें की इन देशों में (मैं कोई मार्क्सवादी नहीं हूँ) भी कई समस्याओं का निपटारा हमसे कहीं अधिक फुर्ती और परिपक्वता के साथ किया जाता है।

    इस परिप्रेक्ष्य में श्रुति का कुछ महीने पहले छपा लेख, ‘बद से बदतर होते जा रहे हम’ भी इसी और इंगित करता है।

    छोटी-छोटी बातें जो 8वीं-10वीं के छात्र भी आसानी से समझ जाएं, ऐसे विषयों पर भी नीतियाँ गुड़-गोबर कर दी गयी हैं। पता नही कहाँ से यह महाशक्ति/विश्वगुरु बनने के मुगालते पाल लिए हमारे लोगों ने।

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