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वन नेशन… वन लीडर… वन फोटो की संभावना…?

Narendra modi Amit Shah

भोपाल। देश के गृहमंत्री अमित शाह ने बिहार जाकर उन कयासों को मूर्तरूप दे दिया है, जिसकी चर्चा पूरे देश के राजनीतिक गलियारों में जोर-शोर से चल रही थी, अमित शाह ने बिहार की राजधानी पटना में घोषणा भी कि इक्कीस महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में श्री नरेन्द्र मोदी ही भारतीय जनता पार्टी से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होगें तथा इन चुनावों भाजपा व जनता दल (यूनाईटेड) एक साथ मिल कर चुनाव लड़ेगी। इस तरह जैसे कि संभावना थी, केन्द्रीय गृहमंत्री ने उस संभावना पर स्वीकृति का ठप्पा लगा दिया, श्री शाह ने यह भी कहा कि फिलहाल चुनावी तैयारियों में भाजपा सबसे आगे चल रही है। Narendra modi Amit Shah

श्री अमित शाह के इस महत्वपूर्ण बयान के साथ ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी गर्वोक्तिपूर्ण बयान में कह दिया कि 2024 तक देश में मौजूदा क्षेत्रिय राजनीति दल खत्म हो जाएगें और रहेगी तो सिर्फ और सिर्फ भाजपा ही। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, वह तो अगले चालीस साल में भी हमारी बराबरी पर नहीं आ सकती।
भारतीय जनता पार्टी की इन दोनों महान हस्तियों के बयानों को लेकर देश में राजनीतिक चर्चाओं और इन बयानों के विश्लेषण का बाजार गर्म हो गया है, कोई इन बयानों को मोदी के प्रति अंधभक्ति बता रहा है, तो कोई मोदी जी को ‘डूबते को तिनके का सहारा’ निरूपित कर रहा है।

मोदी की पुनरावृत्ति…?

यद्यपि फिलहाल मौजूदा राजनीतिक हालातों को देखकर इन दोनों शीर्ष नेताओं में वास्तविकता तो झलकती है क्योंकि आज के राजनीतिक माहौल में भाजपा का मुकाबला करने की किसी भी दल की हिम्मत नहीं है, दूसरा राष्ट्रीय दल कांग्रेस जहां ‘आत्म हत्या’ पर उतारू है, वहीं उसकी दिनोंदिन देश में साख गिरती ही जा रही है, दूसरे सब क्षेत्रिय दल है, चाहे वह समाजवादी पार्टी हो या कि आम आदमी या बसपा पार्टी, और ये दल कितने ही प्रयास कर ले 42 वर्षीय नौजवान भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले में खड़ी नहीं हो सकती।

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इसी विषम स्थिति के कारण भारतीय जनता पार्टी का अहम् भी बढ़ता जा रहा है, क्योंकि फिलहाल देश में उसका कोई विकल्प नहीं है और जहां तक भाजपा का सवाल है वह आमों से लदा वृक्ष अवश्य है कितनी उसकी आमों से सराबोर डालियां फलदार वृक्ष की गुणवत्ता को सरोकार कर झुक नहीं रही है बल्कि आकाश की ओर तन रही है, यही विसंगति आज भाजपा के साथ है।

वैसे भाजपा का इतिहास देखा जाए तो भारतीय जनसंघ के रूप में आजादी के बाद इसका जन्म हुआ था और 1980 में भारतीय जनता पार्टी के रूप में इसका पुनर्जन्म हुआ और अटल जी-अडवानी जी व डॉ. मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं ने इसे पाल पोसकर बड़ा किया और मानव संस्कृति के अनुसार आज के पार्टी के भविष्य के नए खेवनहारों ने पार्टी के प्रमुख सूत्रधारों या जन्मदाताओं को उपेक्षा के ताक में बैठा दिया है, यद्यपि अटल जी आज ये दुर्दिन देखने को जीवित नहीं है, किंतु शेष दो नेता अड़वानी जी व डॉ. मुरली मनोहर जोशी जी को अभिशाप के दौर से गुजरना पड़ रहा है और पार्टी सत्ता के शिखर तक पहुंचाने वाली सीढ़ी को तोड़-फोड़ कर फैंक दिया है, जिससे कोई और शिखर तक पहुंचने की सोच भी न सके?

यह तो है, वह राजनीतिक दास्तान जो किसी से भी छुपी हुई नहीं है, पूरे देश का बुद्धिजीवी वोटर यह सब जानता है, किंतु वह भी मजबूर इसलिए है क्योंकि उसके सामने भाजपा का कोई विकल्प फिलहाल मौजूद ही नहीं है? शायद इसीलिए अब चुनावों के वक्त ‘‘इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन’’ ने ‘नोटा’ पर वोटर की मोहरें ज्यादा मिलने लगी है और वोटिंग के साथ जीत के अंतर व प्राप्त वोट का आंकड़ा भी कम होता जा रहा है, अब इस विकट स्थिति में भारत के भविष्य की चिंता आम वोटर के दिल-दिमाग में हलचल पैदा कर रही है और वह इसका सही विकल्प खोज नहीं पा रहा है, संभव में किसी बड़ी क्रांति का यह स्थिति कारण बन जाए? क्योंकि आज देश की आजादी के इस ‘अमृत काल’ में देश की चिंता किसे नहीं है? या गर्वोन्नत भाजपा को ही ‘लदे फलों वाली डाली’ का झुकने का गुण याद आ जाए और वह अहम् और सत्ता का घमण्ड त्याग कर देश के आम वोटर के सामने ‘विनीत’ रूप में पेश आए?

अब जो भी हो, फिलहाल तो केन्द्रीय गृहमंत्री की अहम् घोषणा व सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष की गर्वोक्ति की समीक्षा या विश्लेषण जरूरी है। Narendra modi Amit Shah

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