जाना था हमसे दूर बहाने बना लिए..

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को प्रदेश की ही नहीं पूरे देश की नजर रहेगी,जब मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार को लेकर सुप्रीम फैसला सामने आ सकता है। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष और राजभवन सचिवालय को नोटिस जारी कर अपना पक्ष 24 घंटे में रखने के निर्देश दिए । तभी यह संदेश गया कि एक पखवाड़े से मची इस उठापटक के खत्म होने का समय नजदीक आ चुका.. न्यायालय के हस्तक्षेप के साथ मुख्यमंत्री, राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष और विपक्ष की भूमिका निभा रही भाजपा के इर्द-गिर्द घूम रहे सियासी संकट से निजात पाने का आखिर फार्मूला क्या होगा।

क्या फ्लोर टेस्ट के लिए कमलनाथ सरकार बाध्य होगी, यह सवाल इसलिए और मायने रखता है, क्योंकि राज्यपाल की दो चिट्ठी को नजरअंदाज कर फ्लोर टेस्ट पर कमलनाथ ने कोई फैसला नहीं लिया। इसके विपरीत विपक्ष को अविश्वास प्रस्ताव लाने की चुनौती दे डाली.. राज्यपाल की दूसरी समय सीमा भी 17 मार्च के फ्लोर टेस्ट की खत्म हो गई। इस बीच पहली बार विधानसभा अध्यक्ष ने भी चिट्ठी के सिलसिले को आगे बढ़ाया.. एनपी प्रजापति ने संरक्षक की भूमिका में राज्यपाल के नाम खत लिख कर उन विधायकों की चिंता जताई.. जिन्हें वह लापता मान रहे।

विधानसभा अध्यक्ष ने अपनी सरकार के मुखिया और पुलिस प्रमुख से हस्तक्षेप की मांग के साथ ऐसी कोई चिंता नहीं जताई .. राज्यपाल और मुख्यमंत्री विपक्षी भाजपा के चिट्ठी वार्तालाप में विधानसभा अध्यक्ष की भी एंट्री हो गई.. दोनों प्रमुख दलों द्वारा व्हिप पहले ही जारी हो चुका है.. भाजपा ने नारायण त्रिपाठी को उस सूची से बाहर रखा.. जो राज्यपाल के पास पहुंचे थे.. नारायण लगातार कमलनाथ के संपर्क में नजर आ रहे, ऐसे में सिंधिया समर्थक इस्तीफे की पेशकश कर चुके 16 विधायकों भूमिका निर्णायक साबित होने वाली है। जबकि चार निर्दलीय, दो बसपा और एक सपा विधायक दोनों के संपर्क में हैं।

जो शुरुआती दौर में सरकार के गठन के साथ कमलनाथ के साथ खड़े थे.. इस बीच कमलनाथ सरकार द्वारा की जा रही नियुक्तियों पर आपत्ति दर्ज करते हुए एक बार फिर शिवराज सिंह चौहान और विष्णु दत्त शर्मा के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल से मिला। कमलनाथ विधायकों के साथ बैठक कर बुधवार को कैबिनेट की बैठक करेंगे। इसमें मुख्यमंत्री कमलनाथ कई बड़े फैसले ले सकते जो उन्होंने जनता से वादे किए थे और सरकार जाने पर भाजपा के लिए बड़े सिर दर्द भी बन सकते हैं ..यह वही समय होगा.. जब सुप्रीम फैसला न्यायालय से मध्य प्रदेश को एक नया संदेश दे रहा होगा। ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि सिंधिया समर्थक बागी विधायकों की भूमिका क्या होगी ..क्या न्यायालय के सामने हाजिर होंगे या फिर सुरक्षा की मांग पूरी होने पर वह सदन की कार्रवाई का हिस्सा बनेंगे।

विधानसभा अध्यक्ष द्वारा इनमें शामिल छह विधायकों के इस्तीफे स्वीकार करने के बाद अन्य 16 पर फोकस बना हुआ है.. सवाल क्या सदन के अंदर क्रॉस वोटिंग की संभावनाएं कोई नया इतिहास लिखेंगी या फिर व्यक्ति विशेष की जवाबदेही कहें या फिर हठधर्मिता मध्य प्रदेश में एक नया गुल खिलाएगी। न्यायालय के हस्तक्षेप से निश्चित समय सीमा में फ्लोर टेस्ट हो या फिर कांग्रेस द्वारा विधायकों के सामूहिक इस्तीफे की पेशकश के विकल्प के साथ राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के कयास खूब चर्चा का विषय बन चुके हैं.. सदन के गणित को अपने पक्ष में होने का दावा करने के बावजूद कमलनाथ उन 16 विधायकों पर निर्भर नजर आते हैं। जिन्होंने इस्तीफे के साथ सामूहिक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपने इरादे जता दिए हैं।

जिसे शिवराज अल्पमत की सरकार बता रहे, वह बनी रहेगी या फिर उसे जाना पड़ेगा, विधायकों के महत्व को आगे भी नकारा नहीं जा सकता। सवाल पुराना फिर भी मायने रखता.. आखिर कांग्रेस के अंदर निर्मित हुई इस स्थिति के लिए किसे और क्यों जिम्मेदार माना जाएगा.. राज्यसभा चुनाव के साथ जब कमलनाथ सरकार पर संकट के बादल मंडरा रहे। तब यह सवाल भी खड़ा हो रहा। आखिर सवा साल की सरकार में किसने क्या खोया और क्या पाया। क्योंकि कार्यकर्ताओं को उपकृत करने का सिलसिला देर से ही सही शुरू हो चुका है ।प्रबंधन के धनी अनुभवी कमलनाथ से आखिर कोई चूक हुई तो वह क्या थी क्या, यह लड़ाई सत्ता पर कब्जे की थी या फिर टकराहट सम्मान और स्वाभिमान को लेकर समझौते के रास्ते बंद कर चुका था।

सरकार के गठन के साथ नेतृत्व जब मुख्यमंत्री के तौर पर कमलनाथ को सौंपा गया.. तब राहुल गांधी का ट्वीट समय और धैर्य बड़े योद्धा को लेकर सामने आया था.. करीब सवा साल बाद जब सरकार संकट से बाहर निकलने के लिए जद्दोजहद में जुटी है ..तब सवाल आखिर सिंधिया का धैर्य जवाब दे गया तो क्या मुख्यमंत्री की भूमिका में कमलनाथ का भी समय खत्म हो रहा है। इसकी वजह को क्या सिर्फ राज्यसभा चुनाव और सत्ता संगठन में दखलअंदाजी तक सीमित रखा जाएगा। क्या सिंधिया को सही समय का इंतजार था और स्कि्रप्ट बहुत पहले लिखी जा चुकी थी या फिर पार्टी में उनके प्रतिद्वंद्वी और प्रतिस्पर्धियों ने परिस्थितियों का निर्माण कर उन्हें निर्णायक फैसला लेने को मजबूर करना पड़ा.. जिसने विचारधारा सिद्धांत को पीछे छोड़ दिए।

फिर भी मध्य प्रदेश की राजनीति जिस मोड़ पर आकर खड़ी हो चुकी है.. वह एक नया इतिहास लिखने की तैयारी में है.. समय बड़ा बलवान कोई जीती हुई बाजी हारने जा रहा तो कोई इस हार में अपनी जीत तलाश रहा.. सवाल इस्तीफा दे चुके मंत्री हों या विधायक या फिर तख्तापलट के इस खेल में क्रॉस वोटिंग के साक्षी बनने वाले विधायक उपचुनाव लड़ेंगे तो क्या गारंटी है कि वह जीत कर फिर विधानसभा में पहुंचेंगे।

बदलते राजनीतिक परिदृश्य में कमलनाथ सरकार का भविष्य सिंधिया समर्थक 16 विधायकों की भूमिका पर निर्भर होकर रह गया है.. जो कभी कमलनाथ के नेतृत्व के मुरीद और उनकी तारीफ करते थे अब सवाल खड़ा कर रहे हैं .. इन विधायकों में कभी दिग्विजय सिंह के नजदीकी माने जाने वाले बिसाहू लाल सिंह और एदल सिंह कंसाना की मौजूदगी भी कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति पर नए सिरे से सोचने को मजबूर करती। ऐसे में इन पंक्तियों पर एक बार फिर गौर करें। जाना था हमसे दूर बहाने बना लिए, अब तुमने कितनी दूर ठिकाने बना लिए ..रुखसत के वक्त तुमने जो आंसू हमें दिए। उन आसुओं से हमने फंसाने बना लिए ..दिल को मिले जो दाग. जिगर को मिले जो दर्द..उन दौलतों से हमने खजाने बना लिए।

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