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गेस्ट कॉलम| नया इंडिया| Politics women reservation bill लग रहा है कि लिखते हुए निब तोड़ दें!

लग रहा है कि लिखते हुए निब तोड़ दें!

सोनिया ने जिस दिन वह बिल पास करवाया दक्षिणपंथी और प्रतिगामी लोग घबरा गए। वह एक ऐसी क्रान्ति थी कि अगर हो जाती तो भारत के यथास्थितिवाद चरित्र को एक झटके से बदल देती। महिला के एक बार पावर में आ जाने के बाद सत्ता के कई महल टूट कर गिर जाते। इसलिए उस समय लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वाराज ने साफ शब्दों में धमकी दी कि जिस तरह इस राज्यसभा में पास कराया गया है अगर ऐसी कोशिश लोकसभा में की जाएगी तो भाजपा महिला बिल का विरोध करेगी।

मीडिया से न्याय मुकाबला कर रहा है। मीडिया अपने अंतिम चरण तक जा चुका है और इससे आगे गिरना नहीं बस सिर्फ मिटना होता है। और मीडिया उस समाप्त हो जाने की स्थिति के लिए भी तैयार है। मगर अपने भय से निजात पाने के लिए नहीं। तो क्या न्याय भी इस और जाएगा? न्याय की अलग तरह की समस्याएं हैं। मगर एक बात दोनों में कॉमन है कि न्याय भी अब आम जनता के दुःख दर्द से खुद को अलग करते हुए एक अलग ऊंची स्थिति की तरफ जाता दिख रहा है जहां वह खुद को हर जवाबदेही से मुक्त समझता है।

लोकतंत्र में हर चीज जनता के लिए होती है। आम जनता के लिए। मीडिया भी और न्याय भी। बाकी विधायिका, कार्यपालिका तो होती ही है। मतलब राजनीति और सरकारी अफसर, कर्मचारी। हर चीज सिर्फ इसलिए बनी है कि वह लोकतंत्र को मजबूत करे। और लोकंतत्र यानि सामान्य जनता। जनता से अलग कुछ नहीं है। यह संविधान उसी को समर्पित है।

तो यह सारी भूमिका किसलिए? इसलिए इस दुःख के साथ कि सोमवार को देश की सर्वोच्च न्यायालय ने जो फैसला सुनाया है वह महिला सुरक्षा के लिए खराब होगा। बलात्कार के घृणित अपराध के बचाव में आगे हमेशा काम आएगा। एक ऐसी नजीर बन जाएगा जहां महिला विरोधी सोच के लोगों को आगे न्यायपालिका से लेकर हर जगह मीडिया, विधायिका, कार्यपालिका में मदद पहुंचाएगा।

देश में जब से बलात्कार पर राजनीति शुरू हुई है हम तब से लिख रहे हैं कि मूल मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए बलात्कार को राजनीतिक विषय बनाया जा रहा है। मूल मुद्दा है महिला को बराबरी का अधिकार। नौकरियों में उसका ज्यादा प्रतिनिधित्व। सुप्रीम कोर्ट ने कल ही सवर्ण आरक्षण पर भी फैसला दिया। बड़ी बैंच थी पांच जजों की। मगर किसी ने यह नहीं कहा कि अगर पचास प्रतिशत से ऊपर जाकर आरक्षण बढ़ा रहे हैं तो फिर इसमें कम से कम 33 प्रतिशत महिला आरक्षण भी कर दें। 33 प्रतिशत इसलिए कि निर्वतमान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का बिल राज्यसभा में पास करवाया था। महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में आरक्षण का।

सोनिया ने जिस दिन वह बिल पास करवाया दक्षिणपंथी और प्रतिगामी लोग घबरा गए। वह एक ऐसी क्रान्ति थी कि अगर हो जाती तो भारत के यथास्थितिवाद चरित्र को एक झटके से बदल देती। महिला के एक बार पावर में आ जाने के बाद सत्ता के कई महल टूट कर गिर जाते। इसलिए उस समय लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा

स्वाराज ने साफ शब्दों में धमकी दी कि जिस तरह इस राज्यसभा में पास कराया गया है अगर ऐसी कोशिश लोकसभा में की जाएगी तो भाजपा महिला बिल का विरोध करेगी। मुलायम, लालू, शरद यादव तो पहले से ही इसके विरोध में थे। ऐसे में सोनिया के लिए इसे लोकसभा में पास करवाना संभव नहीं था। इसलिए वह नहीं हो सका। और आज तक वह पेंडिंग ही पड़ा हुआ है।

मगर उसकी धमक कम नहीं हुई है। वह डर बना हुआ है। राहुल भी इस मामले में सोनिया की सोच के हैं। महिला अधिकारों के घोर समर्थक। उन्हें जब भी मौका मिलगा वे संसद, विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण देंगे। दरअसल इसे इस तरह कहा जा सकता है और इससे शायद भाजपा, मोदी जी खुश भी हो जाएं कि यह

वंशवाद का मामला है। राजीव गांधी ने ही पंचायतों में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण किया था। जिसे बाद में सोनिया ने बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक करवाया। महिला अधिकार एक नया विचार है। इससे पहले सामाजिक रुप से महिला को पुरुष पर निर्भर बताया जाता रहा है। उसके स्वतंत्र अस्तित्व की कल्पना करना भी संभव नहीं था। लेकिन लोकतंत्र ने जिन नए विचारों को फलने फूलने का मौका दिया इनमें सामाजिक न्याय और महिला अधिकार भी आगे बढ़े।

लेकिन अभी बात महिलाओं की हो रही है। तो विधायिका में महिला आरक्षण एक ऐसा तरीका था कि उसके हो जाने या न हो पाने की स्थिति में चर्चा से भी महिला सशक्तिकरण का नया युग शुरू हो सकता था। उसे ही रोकने के लिए एक भावुक इश्यू की जरूरत थी। और वह निर्भया के वीभत्स बलात्कार से मिल गया। उसे राजनीतिक मुद्दा बनाया गया। वह उसी समय स्पष्ट हो गया था कि यह संवेदना के साथ, बलात्कार के खिलाफ, महिला सुरक्षा पर आंदोलन नहीं है। बल्कि कांग्रेस के खिलाफ एक हथियार है। केन्द्र और दिल्ली सरकार ने

अपराधियों को पकड़ा। कोई राजनीति नहीं की। इलाज के लिए सिंगापुर पहुंचाया। कड़ा कानून बनाया। और कड़ा दंड मिले यह सुनिश्चित किया। राहुल गांधी ने चुपचाप परिवार की हर तरह से मदद की। निर्भया के भाई को पायलट बनवाया। उधर दूसरी तरफ अन्ना हजारे से लेकर भाजपा और दूसरे दल मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से इस्तीफा मांगते रहे। इनके खिलाफ प्रदर्शन करते रहे, लोगों को भड़काते रहे। बहुत हुआ नारी पर वार जैसे नारों के साथ चुनाव लड़ा गया।

मगर फिर क्या हुआ? सबके सामने है। उन्नाव की बलात्कार पीड़िता का पूरा परिवार तबाह कर दिया गया। न्याय मांगने के हौसले तोड़ दिए गए। हाथरस में पीड़िता का शव रातों रात पुलिस ने जला दिया। उसी के घर के बाहर प्रदर्शन हुए। आरोपियों का महिमा मंडन हुआ। राहुल और प्रियंका दलित परिवार से मिलने जा रहे थे तो राहुल को धक्का मारकर सड़क पर गिरा दिया गया। लाठी चार्ज किया तो प्रियंका को कार्यकर्ताओं को बचाने के लिए अपने हाथों पर लाठियां रोकना पड़ीं। जयंत चौधरी को तो बाकायदा दौड़ा दौड़ा कर लाठियों से मारा गया। गुजरात में तो बिल्किस बानो के बलात्कारियों की सज़ा ही माफ करके उन्हें जेल से छोड़ दिया गया। और फिर भाजपा ने उनका फूलमालाओं और मिठाई से स्वागत किया। और अब सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सज़ा पाए तीन लोगों को निर्दोष करार दे छोड़ दिया है।

बहुत भयानक था छावला सामूहिक बलात्कार मर्डर कांड। सेशन कोर्ट से हाईकोर्ट तक ने 19 साल की लड़की के साथ वीभत्स बलात्कार और हत्या के आरोप में तीन लोगों को फांसी की सज़ा सुनाई थी। उत्तराखंड की लड़की थी। ऐसे ही उत्तराखंड की दूसरी लड़की अंकिता के मामले में भी अभी तक कोई न्याय मिलता नहीं दिख रहा। अंकिता के साथ क्या हुआ कौन थे उसके पीछे लोग उसके मां बाप पुलिस और अदालतों के चक्कर काटते हुए रोज पूछ रहे हैं। ऐसे ही सोमवार से छावला गेंगरेप में शिकार हुई लड़की के मां बाप हर पत्रकार, वकील से पूछ

रहे हैं। क्या बेटी को न्याय मिलेगा? या इतनी बड़ी अदालत ने फैसला किया है इसके बाद यह सवाल ही खत्म हो जाएगा कि किसने बलात्कार किया, किसने उसे मारा? या जैसा गुजरात में मोरबी में मारे गए लोगों के लिए कहा जा रहा है कि वे खुद ही अपने मरने के लिए दोषी थे। ऐसा ही उनकी बेटी के बारे में कहा जाएगा कि वह खुद ही मर गई।

अभी सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच थी। तीन जजों की। जिनमें चीफ जस्टिस ललित भी शामिल थे और एक महिला जज बेला त्रिवेदी भी। महिला जज समेत तीनों ने एक राय से तीनों फांसी पाए लोगों को छोड़ दिया। कहते है कि फांसी की सज़ा देने के बाद जज निब तोड़ देते हैं। मगर यहां फैसले पर लिखते हुए लग रहा है कि निब तोड़ दें। उन्नाव, हाथरस, बिल्किस बानो और अब यह छावला केस के बाद महिलाओं के पक्ष में उनका साथ देने के लिए क्या लिखें? क्या लिख सकते हैं ?

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