चेलाराम के सहारे पाकिस्तान से अल्पसंख्यकों के खत्म करने की तैयारी - Naya India
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चेलाराम के सहारे पाकिस्तान से अल्पसंख्यकों के खत्म करने की तैयारी

भारत में एक कार्यक्रम के दौरान सलमान रूश्दी ने कहा था कि पूर्व क्रिकेटर और पाकिस्तान के राजनीतिक दल तहरीके इंसाफ पार्टी के अध्यक्ष इमरान खान ने “फौज और मुल्लाओं से सांठ-गांठ कर रखी है। इमरान खान अल्पसंख्यकों को लेकर जिस नीति पर आगे बढ़ रहे है,उससे इसकी एक बार फिर पुष्टि होती है।

दरअसल इस समय पाकिस्तान में सर्वाधिकारवादी राष्ट्रवाद कि उस परिकल्पना को साकार किया जा रहा है जिसके अनुसार माना जाता है कि बलिष्ठ व्यक्ति को दुर्बल पर शासन करने का अधिकार है। धार्मिक अल्पसंख्यकों को खत्म करने की प्रधानमंत्री की योजना में मददगार बने है उनकी पार्टी के एक सिपहसालार चेलाराम केवलानी।

वास्तव में संवैधानिक प्रतिबद्धताओं को कुचलते हुए पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों कि भयावह स्थिति दुनिया के सामने बार बार आती रही है। साल 2014 में पाकिस्तान कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया था कि पाकिस्तान में धर्म परिवर्तन कि घटनाओं को रोकने,ईशनिंदा कानून का दुरुपयोग रोकने और अल्पसंख्यकों कि सुरक्षा के लिए देश में एक संवैधानिक निकाय का गठन होना चाहिए,जो स्वतंत्रता पूर्वक काम कर सके और सरकार को सलाह दे सके, जिससे देश के अल्पसंख्यकों कि सुरक्षा सुनिश्चित हो और उनकी बेहतरी के कार्य हो सके। इसके लिए एक आयोग बनाया गया था और उसकी अनुशंसा पर बिल पेश किया जाना था।

अदालत के आदेश के छह साल के बाद पाकिस्तान में एक राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को मंजूरी मिली है। दिलचस्प यह है कि सरकार ने इस बिल को असेंबली से मंज़ूर कराने के बजाए कैबिनेट के एक फ़ैसले के तहत इस आयोग का बिल मंज़ूर कर लिया,जिसके बाद अध्यक्ष के रूप में चेला राम केवलानी को नामित करने का ऐलान किया गया। पाकिस्तान हिंदू परिषद के पूर्व अध्यक्ष और सिंध प्रांत में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के नेता चेला राम केवलानी मूलत: चावल के बड़े व्यापारी है। वे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों कि स्थिति को बेहतर बताते रहे है और अत्याचार कि खबरों को पड़ोसी देश भारत और विश्व की मीडिया का प्रपोगंडा बताते रहे है।

आयोग में हिन्दू के अलावा ईसाई,पारसी,सिख को तो प्रतिनिधित्व दिया गया है लेकिन दलितों को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। हालांकि इसमें काउंसिल ऑफ़ इस्लामिक आइडियोलॉजी के अध्यक्ष समेत दो मुस्लिम सदस्य भी इसका हिस्सा हैं। पाकिस्तान में सिंध प्रांत में दलितों का बाहुल्य है और इस समुदाय कि बेटियों के अपहरण कि बड़ी घटनाएँ होती है। जाहिर है इस आयोग में दलितों को कोई प्रतिनिधित्व न देकर इमरान खान ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि इस समुदाय का धर्मांतरण होता रहेगा और उनकी आवाज चेलाराम भी नहीं उठाएंगे।

इमरान खान कि पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ कट्टरपंथियों कि पार्टी मानी जाती है और इसके सबसे ज्यादा प्रभाव वाले खैबर पख्तून क्षेत्र में यह देखा भी गया है। पिछले साल तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी से खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बारीकोट, स्वात इलाके से विधायक रह चुके बलदेव सिंह भारत आ गए हैं और उन्होंने मोदी सरकार से भारत में राजनैतिक शरण की मांग की। बलदेव ने साफ कहा कि ‘पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की हालत लगातार खराब होती जा रही है और वहां रह रहे अल्पसंख्यकों के लिए लंबी लड़ाई लड़े जाने की ज़रूरत है और यह पाकिस्तान में रहकर संभव नहीं था। इसलिए मैं यहां आया हूं और अब साहस से वहां के लोगों की आवाज़ उठाउंगा।“

यदि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के हालात की बात की जाए तो स्थिति बेहद खतरनाक रही है। पाकिस्तान बनने के बाद जब पहली बार जनगणना की गई थी तो उस समय पाकिस्तान की तीन करोड़ चालीस लाख आबादी में से पांच प्रतिशत गैर-मुसलमान थे। उपमहाद्वीप के बंटवारे के समय, पश्चिमी पाकिस्तान या मौजूदा पाकिस्तान में, 15 प्रतिशत हिंदू रहते थे। इस समय उनकी संख्या मात्र 1.6 प्रतिशत रह गई और देश छोड़ने की एक बड़ी वजह असुरक्षा थी। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि पाकिस्तान से पलायन कर गई हिंदुओं की नब्बे प्रतिशत आबादी का कारण बढ़ती असहिष्णुता और सरकार की उदासीनता है। हिन्दुओं के साथ ही पाक में अन्य अल्पसंख्यकों की स्थिति भी बहुत खराब है। पाकिस्तान में हिंदुओं के बाद ईसाई दूसरा सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह हैं,पाकिस्तान में लगभग 18 करोड़ की आबादी में 1.6 प्रतिशत ईसाई हैं। कई ईसाइयों को क़ुरान का अपमान करने और पैगंबर की निंदा करने के आरोपों में दोषी ठहराया जा चुका है,वास्तव में ईसाइयों के ख़िलाफ़ ज़्यादातर आरोप व्यक्तिगत नफ़रत और विवादों से प्रेरित होते है। जहां भारत का कानून बिना धार्मिक भेदभाव किये सभी को समान अधिकार देता है वहीं पाकिस्तान में ऐसा बिलकुल नहीं है

इमरान खान सेना, आतंकियों, आईएसआई और धार्मिक समूहों की एक मात्र पसंद है और उन्हें लोकतांत्रिक ढंग से चुने जाने की हर संभव परिस्थितियां इसीलिए उपलब्ध कराई गई है जिससे वे देशमें निर्णायक बदलाव कर सके। इमरान खान ने कभी कुख्यात आतंकी हाफिज सईद की आलोचना नहीं की। आतंकियों से इसी प्रेम के कारण जब वह साल 2015 में पेशावर के तालिबान के हमले का निशाना बने आर्मी पब्लिक स्कूल पहुंचे तो हमले में मरने वाले बच्चों के परिजनों ने उनके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया था और ‘गो इमरान गो’ के नारे लगाए थे।

इमरान खान उस पार्टी का नेतृत्व करते है जो अल्पसंख्यकों की हितैषी नहीं हो सकती। वहीं वे देश के प्रधानमंत्री के रूप में भी अपनी पार्टी के एजेंडे को ही आगे बढ़ा रहे है। जाहिर है इमरान खान ने बेहद चतुराई से एक व्यापारी और अपनी पार्टी के नेता चेलाराम को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बनाकर सेना, आतंकियों, आईएसआई और धार्मिक समूहों की उस योजना को साकार करने की और कदम बढ़ा दिये है जिसके अनुसार सभी अल्पसंख्यकों का धर्मांतरण हो जाए और देश में इसका प्रतिरोध भी खत्म हो जाए।

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