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हिन्दू नेताओं की इस्लाम-परस्ती

हिन्दुओं का दुर्भाग्य कि उन के अपने नेता उन्हें जिहादियों के सामने परोस देते हैं, और फिर कोई जिम्मेदारी नहीं लेते। जिम्मेदारी लेने पर तो कुछ करना होगा। सब से पहले, भूल सुधार। किन्तु चूँकि वे इस से बचना चाहते हैं, इसीलिए चुप्पी साध उलटे हिन्दुओं को अरक्षित छोड़ देते हैं। यह पिछले सौ सालों से चल रहा है। अपने अज्ञान में भारत के हिन्दू नेता वैश्विक इस्लामी राजनीति को सर्वाधिक मदद पहुँचाते रहे हैं। 

गत सौ सालों में अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी उग्रवाद को खाद-पानी देने में सब से बड़ी भूमिका भारत के हिन्दू नेताओं की है। पहली बार, 1920-22 में तुर्की में इस्लामी खलीफा की गद्दी बहाल करने का आंदोलन महात्मा गाँधी ने चलाया, जब कि खुद तुर्की और अरब में वातावरण खलीफा के विरुद्ध था। अंततः स्वयं तुर्की के लोगों ने 1924 में खलीफा और खलीफत को उतार फेंका। किन्तु पूरे विश्व में, केवल भारत में, वह भी गाँधीजी और कांग्रेस द्वारा खलीफत जिहाद को बेहिसाब मदद देकर तमाम किस्म की इस्लामी ताकतों को उभार कर खड़ा कर दिया गया। नतीजे में उस दौरान मोपला से मुलतान तक जिहादियों ने अपने पड़ोसी हिन्दुओं का सफाया किया। खलीफत आंदोलन में कूदने का निर्णय गाँधीजी ने अधिकांश कांग्रेस नेताओं, यहाँ तक कि जिन्ना के विरोध के बावजूद किया। तब भारत में मौलानाओं को पहली बार सर्वोच्च राजनीतिक मंच और पद मिले, जो उन्हें मुगल काल में भी नसीब नहीं हुआ था। फिर उन्हें जो मजबूती और कांग्रेस नेतृत्व में जो भीरुता और संकोच फैला, उस से वे आज कर मुक्त नहीं हो सके हैं।

फिर, 1947 में इस्लाम के नाम पर एक अलग देश बना देने का फैसला। विश्व में पहली बार इस्लाम के नाम पर एक देश को काटकर, साढ़े 9 लाख वर्ग किलोमीटर का एक स्वतंत्र राज्य बना दिया गया। जबकि पाकिस्तान बनाने के लिए मुस्लिम लीग के पास माँगने और हिन्दू नेताओं को डराने के लिए दंगे करने के सिवा कोई तर्क या हैंडल न था। बाद में स्वयं जिन्ना ने भी कहा कि अगर कांग्रेस पाकिस्तान बनाने पर राजी नहीं होती, तो वे कुछ नहीं कर सकते थे।

इस तरह, इस्लामी राजनीति को एक धन-धान्य पूर्ण विशाल इलाका दे देने का काम शुद्ध रूप से भारत के हिन्दू नेताओं ने किया था। उस का परिणाम इसी से समझ लें कि गत तीन दशकों में पूरी दुनिया में जितने जिहादी हमले हुए, उन के तार और अल कायदा समेत सब से भयंकर जिहादी संगठनों के प्रशिक्षण, सुरक्षित अड्डे, आदि सब से अधिक पाकिस्तान में ही रहे हैं। यानी, वह जमीन जो भारत के हिन्दू नेताओं की उदारता या भीरुता से इस्लामियों को मिली। विभाजन का दोष अंग्रेजों को देना परले दर्जे का छल है, जो गाँघीजी और कांग्रेस नेताओं की मूढ़ता और भयावह सचाई छिपाने के लिए किया जाता है।

तीसरी बार, अक्तूबर 1988 में प्रधान मंत्री राजीव गाँधी ने सलमान रुशदी की पुस्तक ‘सटैनिक वर्सेस’ को एक मुस्लिम नेता की माँग पर भारत में प्रतिबंधित कर दिया। फिर दुनिया में जो इस्लामी ज्वार पैदा हुआ, वह अभूतपूर्व था। उसी के चार महीने बाद अयातुल्ला खुमैनी का फतवा आया था!  सो, यह खुमैनी नहीं, भारत के हिन्दू नेता थे जिन्होंने सलमान रुश्दी को निशाने पर लाया। नोट करें कि रुशदी की वह किताब पिछले कई महीनों से मु्स्लिम देशों में मजे से पढ़ी जा रही थी। यूरोप, अमेरिका के मुसलमानों के सिवा ईरान, तुर्की, सीरिया, ईराक, मिस्त्र जैसे अधिक शिक्षित मुस्लिमों के बीच ही। कहीं वह प्रतिबंधित नहीं हुई थी। सब से पहले भारत के हिन्दू प्रधान मंत्री ने उस किताब को प्रतिबंधित कर दिया। और तब से इस्लामी उग्रवाद का जो बुखार चढ़ा, उस की आग से रुशदी समेत कई मुस्लिम लेखक अभी तक झुलस रहे हैं।

फिर चौथी बार, अब जून 2022 में नुपूर शर्मा को दंडित कर। जब इंटरनेट और सोशल मीडिया के कारण इस्लाम की आलोचना लगभग सहज हो चली थी, तब नुपूर को फटकार कर भाजपा नेतृत्व ने दुनिया भर के इस्लामियों में नई जान डाल दी। वर्षों से पाकिस्तान, भारत समेत पूरी दुनिया में कई एक्स-मुस्लिम ही खुल कर इस्लाम की समीक्षा चला रहे थे। उन की पुस्तकें और यू-ट्यूब वार्ताएं आ रही थीं। बड़े-बड़े मौलाना मान रहे थे कि दुनिया में मुस्लिम युवाओं की इस्लाम से दूरी बढ़ रही है। इस्लामी देशों में भी प्रोफेट, कुरान, और शरीयत पर सवाल उठाए जा रहे हैं। तब भारत की हिन्दूवादी पार्टी ने अपनी ही प्रवक्ता को एक सामान्य तथ्य का उल्लेख भर करने के लिए दंड दे दिया। जबकि असंख्य वक्ता और लेखक लंबे समय से वैसे तथ्यों की आलोचना सविस्तार करते रहे हैं। उस पर किसी इस्लामी नेता या संगठन ने हाय-तौबा नहीं की, क्योंकि उन्हें मालूम है कि यह आलोचना तो पूरी दुनिया में लंबे समय से चल रही है। किन्तु नुपूर को दंडित करके हिन्दू नेताओं ने उसे उसी तरह प्रमुखता से अभियुक्त बना दिया, जैसे राजीव गाँधी ने सलमान रुशदी को बना दिया था।

यह मनोवैज्ञानिक रणनीतिक तथ्य है। इस्लामी नेता राजनीति माहिर हैं। उन का मतवाद ही राजनीतिक है। सो वे अपनी मजबूती, कमजोरी जानते हैं। इसीलिए दुश्मनों की कमजोरी पर निगाह रखते हैं, ताकि मौका मिलते ही चोट करें। यदि राजीव गाँधी ‘सटैनिक वर्सेस’ को प्रतिबंधित न करते तो वह मुस्लिम नेता, जो एक लोक सभा सीट भी जीतने की हैसियत नहीं रखता था, कुछ नहीं कर सकता था। पर भारतीय प्रधान मंत्री के फैसले से रुशदी को अंतर्राष्ट्रीय नकारात्मक सुर्खी मिली। उसी तरह, नुपूर शर्मा और तसलीम रहमानी की टी.वी. नोक-झोंक रोज की बहसों जैसी उपेक्षित की जाती, तो वह आई-गई हो जाती। इस्लामी नेता तो खुद वे तथ्य छिपाने की प्रवृत्ति रखते हैं (वरना उस उल्लेख पर नाराजगी क्यों!)। यानी, यदि भाजपा खुद नुपूर को दंडित न करती, तो इस्लामी ताकतों को शह न मिलती। वे तो वैसी आलोचना गूगल, वीकीपीडिया, यू-ट्यूब, ट्विटर, फेसबुक या पेंग्विन, रिजोली, आदि पर रोज देख कर कुछ नहीं कर सकते, जहाँ इस्लामी स्त्रोतों से ही सारी बातें खंगाल कर हर भाषा में रखी हुई हैं। उन की सचाई झुठलाया नहीं जा सकती।

किन्तु जब स्वयं हिन्दू नेता अपनी उदारता (या मूढ़ता) में उन्हें सजा-सजाया निशाना परोस दें, तो वे हमला करने नहीं चूकेंगे। वे समझ लेते हैं कि प्रतिपक्षी डगमगा गया, अपनी नैतिक कमजोरी जाहिर कर दी। फिर तो वे पूरी ताकत से नाराजगी का प्रदर्शन करते हैं। ताकत प्रदर्शन का उन का तरीका 1400 सालों से पेटेंट है। वही खलीफत आंदोलन में भी था, वही देश-विभाजन समय, वही रुशदी पर प्रतिबंध के बाद, और इसीलिए नुपूर पर अकारण घुटने टेकने पर भी वही होना था। यह न समझने वालों पर तरस ही खाया जा सकता है, जो अपनी सदभावना या लोकप्रियता को अपने इतिहास अज्ञान की भरपाई समझ लेते हैं।

बहरहाल, किस्सा कोताह यह कि नुपूर शर्मा पर भाजपा का विवेकहीन फैसला कानून व संविधान की पूरी अवज्ञा कर किया गया। यह शरीयत को संविधान के ऊपर मान लेने जैसा था। उस से पूरी दुनिया में नए सिरे से इस्लामी गर्मी को हवा मिली जो वैसे नहीं मिलती। ठीक है कि इस्लामी स्टेट, अल कायदा, आदि अपनी-अपनी धार तेज करते रहते हैं। किन्तु तब आम मुस्लिमों में दुविधा रहती है। उन की सफाई देने, या सहायता करने में वे अपने तेवर ढीले रखते हैं। यह तो जब काफिर, विशेषकर हिन्दू नेता जब उन्हें बना-बनाया निशाना प्रदान कर नैतिक रूप से सशक्त करते हैं, तब उन के तेवर देखने लायक होते हैं। इसे सौ वर्ष पहले मोपला मुसलमानों से लेकर आज के गौस मुहम्मद तक देख सकते हैं।

हिन्दुओं का दुर्भाग्य कि उन के अपने नेता उन्हें जिहादियों के सामने परोस देते हैं, और फिर कोई जिम्मेदारी नहीं लेते। जिम्मेदारी लेने पर तो कुछ करना होगा। सब से पहले, भूल सुधार। किन्तु चूँकि वे इस से बचना चाहते हैं, इसीलिए चुप्पी साध उलटे हिन्दुओं को अरक्षित छोड़ देते हैं। यह पिछले सौ सालों से चल रहा है। अपने अज्ञान में भारत के हिन्दू नेता वैश्विक इस्लामी राजनीति को सर्वाधिक मदद पहुँचाते रहे हैं।

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By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। जे.एन.यू., नई दिल्ली से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी पर पीएच.डी.। महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में राजनीति शास्त्र के पूर्व-प्रोफेसर। ‘नया इंडिया’  एवं  ‘दैनिक जागरण’  के स्तंभ-लेखक। भारत के महान विचारकों, मनीषियों के लेखन का गहरा व बारीक अध्ययन। उनके विचारों की रोशनी में राष्ट्र, धर्म, समाज के सामने प्रस्तुत चुनौतियों और खतरों को समझना और उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए लेखन का शगल। भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन, मुसलमानों की घर वापसी; गाँधी अहिंसा और राजनीति;  बुद्धिजीवियों की अफीम;  भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद; जिहादी आतंकवाद;  गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग;  आदि कई पुस्तकों के लेखक। प्रधान मंत्री द्वारा‘नचिकेता पुरस्कार’ (2003) तथा मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नरेश मेहता सम्मान’(2005), आदि से सम्मानित।

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