वादे एवं दावे तथा जुमले- आम समझ और नेता जी

चुनावी सभाओं में बड़े नेताओं के वादे भरे भाषणों में भांति – भांति के आश्वसान मतदाता को दिये जाते रहे हैं। हालांकि वे आम आदमी को केन्द्रित कर कहे जाते हैं। एवं इन नेताओ के वादों को गांव का किसान और दलित वर्ग तथा गरीब सत्ता के मुख से निकला हुआ सच ही मान लेती हैं।

पर हक़ीक़त तब सामने आती हैं जब जनता में से कोई सरकारी दफ्तर जाकर मंत्री जी के कथन का हवाला देकर सहता या अधिकार मांग लेता हैं ! तब वहां बैठा बाबू उस निरीह को बताता हैं कि मंत्री जी के कहने से देश का शासन नहीं चलता जब तक कि सरकार का लिखित या टाइप में हुकुमनामाँ दफ्तर में नहीं आता ! तब महान भारत का वह नागरिक ठगा रह जाता हैं ! हालांकि ऐसी घटनाएं अब नहीं होती – क्योंकि अब विश्व के इस महान गणतंत्र का नागरिक यह जान गया है, समझ गया हैं कि चुनावी सभा में दिये गए आश्वासन या वादे कोरे जुमले बाज़ी हैं !

अब वह नागरिक इस झूठ के फरेब के जाल को सहजता से लेता हैं। क्योंकि उसे मालूम हैं कि वह नेताजी के भाषण के वादो को कहीं से भी लागू नहीं करा सकता। उनका कहना बच्चों को सोते समय लोरी या कहानी सुनाने जैसे हैं। जिन्हें सिर्फ सुन लेना चाहिए पर न तो विश्वास करना और न ही भरोसा करना चाहिए क्योंकि चंदा मामा को कटोरी में उतारने की बात किस्से – कहानी में होती हैं -हक़ीक़त में नहीं ! जबकि चुनाव की राजनीति और उसका प्रचार तो आए दिन कहीं ना कहीं होता रहता हैं। अब नेता जी जहां जाते हैं वहां की ड्रेस पहन लेते हैं दो – चार उनकी भाषा के शब्द बोल कर बुलाई गयी भीड़ में कुछ तालियां बाजवा लेते हैं। कुछ लोग उसी में जिंदाबाद के नारे भी लगा देते हैं अब उनकी पहचान भक्त – समर्थक और पार्टी के सदस्य के रूप में भी हो सकती हैं। पर वह आवाज और नारे आमजन के तो कतई नहीं हो सकती, क्योंकि बोलने वाले और नारा लगाने वाले को मालूम हैं कि जो कुछ वह कह रहा या कर रहा हैं वह सत्य तो बिलकुल नहीं हैं !

सवाल उठता हैं तब फिर क्यूं इन नेताओं की सभाओं में नारे और तालियां क्यूं बजती हैं ? क्या देश का नागरिक /मतदाता इतना भोला है या मूर्ख हैं जो नेताओं के इस वाग्जाल में फंस जाता हैं ! अथवा रोम साम्राज्य के दिनों की भांति स्टेडियम में ग्लेडियतर और शेर की लड़ाई को सत्ता की क्रूरता और अमानवियता के बजाय मनोरंजन का साधन समझता था। अभी रोम वासियों को नीरो का शासन सहना पड़ा ! हालांकि वे सभी लोग उस समय के सबसे शक्तिशाली और वैभवशाली साम्राज्य के नागरिक थे !

भारत के गणतंत्र के जीवन में शायद (मेरे अनुमान से, जो गलत भी हो सकता हैं) कुछ वैसा ही समय हैं। रोमन साम्राज्य का खूंखारपना ईसाई धर्म ग्रंथों में वर्णित हैं। ईसा को सूली पर चढ़ाये जाने के बाद बिखरते हुए साम्राज्य के शासक ने ही उस धर्म को स्वीकार किया जिसे उसके पूर्वजों ने नकारा था ! रोमन लोग अपने सिवाय अन्य सभ्यताओं आस्थाओं और कर्मकांडों ंको हीन या निकृष्ट मानते थे। जैसा कि मिश्र साम्राज्य ने यहूदी धरम के प्रवर्तक हज़रत मूसा के साथ किया था। दोनों ही महान (स्व घोषित नहीं -वरन यथार्थ में) साम्राज्य थे हक़ीक़त में ! उसके बाद तो अनेकों साम्राज्य हुए -जो भिन्न -भिन्न विश्वासों पर आधारित थे। परंतु जिनके शासक का वास्तविक उद्देस्य अपने अहंकार अथवा सोच या विचार के अनुसार दुनिया को ढालना था।

हिटलर से अगर उलटी गिनती करें तो हमे अनेकों ऐसे शासक मिलेंगे -जिन्होंने स्वयं को परमात्मा का दूत अथवा दैवी हुकुमनामे अथवा धरा पर न्याय और सत्य को स्थापित करने की घोषणा की अगर हम महाभारत को ही देखे तो उसमें भी धर्म और सद नीति को – सीधे नहीं चलने दिया गया ! किए गए करम को तर्क से विश्वास पर लाया गया। परंतु हिटलर ने आमजन के विश्वास को अपने तर्कों से यहूदियों के खिलाफ नफरत में बादल दिया! तबसे सत्ता के चुनाव में वादे – दावे में बदले गाये। फलस्वरूप राजनीतिक विमत रखने वाला अथवा विरोधी विचारधारा के व्यक्ति को शत्रु या दुश्मन मानने की प्रथा शुरू हुई। लोग भले ही कहे कि विमत या विरोधी को शत्रु मानकर अपराधी जैसा व्यवहार करने की प्रथा वामपंथी आंदोलन या समाजवादी – कम्युनिस्ट शासन की देन हैं परंतु यह पूर्ण सत्य नहीं हैं। आज मिश्र – तुर्की – या ईरान तथा कल तक के इराक के सद्दाम हुसैन या कर्नल गद्दाफ़ी – रुमानिया और मौजूदा फिलीपींस को हम वामपंथी तो किसी तरह नहीं कह सकते। रूस हो या चीन उत्तरी कोरिया हो इन्हें वाम पंथी कैसे कह सकते हैं ? गोर्बछोव के पेरिस्त्रिका के बाद – समय पर चुनाव का नाटक भी नहीं होता। स्टेलिन की मौत के बाद यह साफ हो गया था कि कोई भी व्यक्ति राष्ट्र का आजीवन नेत्रत्व नहीं कर सकेगा। परंतु चीन के शी जिन पिंग और रूस के पुतिन राष्ट्र के पुरातन गौरव का नारा देकर अपनी कमियों और बुराइयों को ढंकते रहते हैं।

इतिहास को देखे तब हम पाएंगे कि हिटलर समेत सभी तानाशाहों ने राष्ट्रवाद के नारे से ही अपनी गल्तियों और अत्याचार को उचित ठहराने की कोशिश की हैं ? अब भले ही यह पड़ोसी म्यांमार की बात हो अथवा पाकिस्तान के आयुब खान से लेकर जिया उल हक हो अथवा परवेज़ मुशरफ हो सेना को भी धर्म और राष्ट्र के नाम से इस्तेमाल किया। नोबल पुरस्कार विजेता आंग सान सु की को भी देश बचाने के नाम पर सेना ने बंदी बना लिया। अब यह कौन सी देश भक्ति हैं ! ऊपर बताए गए देशों और उनके नेताओं ने अपनी राष्ट्र वादी सोच से कौन सी उपलब्धि प्राप्त की हैं ? मुझे तो नहीं पता , हाँ फिर वही दावे और वादे ही मिलते हैं !

भारत के संदर्भ में : राष्ट्रवाद और देश की सुरक्षा के नाम पर सरकारी एजेंसियों द्वारा सैकड़ों नामचीन लोगों को गिरफ्तार कर के जेल में डाल दिया गया ! बात यहां तक पहुंची कि जेएनयू या एमएमयू आदि के छात्रों को राष्ट्रद्रोह का मुकदमा का अभियुक्त बनना पड़ा। तो झारखंड के 80 वर्ष के ईसाई मिशनरी के फादर और दर्जनों अध्यापक आदि को भीमा कोरे गांव मामले में आरोपी बनाया गया ! आज राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी और पुलिस कन्हैया तक के विरुद्ध चार्ज शीट नहीं दाखिल कर सकी। लेकिन 80 दिनों से हजारों किसानों के चल रहे धरने और आंदोलन के नेताओं को भी पुलिस ने लाल किले के मामले में लपेटना चाहा, पर ऐसा हो न सका ! अब मामला राष्ट्रवाद का है और देश की सत्ता के सामने है – अंतराष्ट्रीय पर्यावरणविद ग्रेटा थोन्बेर्ग तथा गायक कलाकार रिहाना इन लोगों ने किसानों के आंदोलन का समर्थन डिजिटल दुनिया में किया।

जिसमें भारत के कुछ युवा भी शामिल थे। देश में किसानों के आंदोलन को विश्वव्यापी समर्थन मिलने से मोदी सरकार की परेशनियां बढ़ रही हैं। स्थिति यहां तक खराब हो गयी कि रिहाना और थोन्बेर्ग के ट्वीट के जवाब में भारत सरकार का विदेश विभाग को मर्यादा छोड़कर सरकार की ओर से जवाब देना पड़ा। मज़े की बात हैं कि राष्ट्रवाद की हुंकार भरने वाले आसाम में स्थानीय लोगों को सब्ज़बाग दिखाये तो मिज़ोरम में बीफ या गौमांस खाने की छूट की बात फुँकवा दी जाती हैं। बंगाल में कार्यकर्ताओं की मौत को राजनीतिक हत्या बताया, लेकिन ऋणमूल सरकार के मंत्री ज़ाकिर शाह पर रेलवे स्टेशन पर बम से हमला करके 26 लोगों को घायल करने का जिम्मेदार कौन हैं ? केंद्रीय गृहमंत्री बताएँगे ? वैसे ममता बनर्जी के भतीजे ने अमित शाह पर मानहानि का केस लगा दिया हैं, वैसे उन्हेंेेेेे खुद गैर हाजिर होने से छूट मिल गयी हैं। यह तो होना ही था।

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