nayaindia Narendra modi CharanjitSingh Channi पंजाबी और तुस्सी-तैनूं का बेअक्ल हल्ला!
गेस्ट कॉलम| नया इंडिया| Narendra modi CharanjitSingh Channi पंजाबी और तुस्सी-तैनूं का बेअक्ल हल्ला!

पंजाबी और तुस्सी-तैनूं का बेअक्ल हल्ला!

एंकर चापलूसी को होड़ में एक दूसरे से ज्यादा आगे निकलने के चक्कर में ये नई नई बेहूदा बातें बना रहे हैं। कभी पत्रकारिता में अक्ल का कंपीटिशन होता थी। आज बेअक्ली की है। कभी किसी ने सोचा नहीं था कि पंजाबी के तुस्सी और तैनूं जैसे रोजमर्रा के सामान्य शब्दों को संवैधानिक मर्यादा से भी जोड़ा जा सकता है।। लगता है ये एंकर पागल हो गए हैं। तुस्सी और तैनूं को तू तड़ाक बता रहे हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री चन्नी का विरोध करने में पंजाबी और पंजाब की संस्कृति का विरोध करने लगे।

नफरत और विभाजन की राजनीति के लिए अब भाषाओं को भी निशाना बनाया जा रहा है। पंजाबी के सामान्य बोलचाल के शब्दों को मानअपमान से जोड़ा जा रहा है। कितने अफसोस की बात है कि राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बन गए मीडिया ने भारत की भाषायी विविधता और उसकी खूबसूरती को पूरी तरह भूला दिया है।

पंजाबी दुनिया की खूबसूरत भाषाओं में से एक है। इसमें बोलचाल में मिठास टपकती है। वैसे सच बात यह है कि भारतीय भाषाओं में हर भाषा का अपना अलग सौन्दर्य और विशिष्टता है। वह क्या है यह उसके बोलने वालो से उसमें जीने वालों से पूछो। ऐसे ही बोलियों की मिठास है। मुहावरे हैं। जिनमें सदियों से संचित प्यार और अपनत्व है।कभी किसी ने सोचा नहीं था कि पंजाबी के तुस्सी और तैनूं जैसे रोजमर्रा के सामान्य शब्दों को संवैधानिक मर्यादा से भी जोड़ा जा सकता है।। लगता है ये एंकर पागल हो गए हैं। तुस्सी और तैनूं को तू तड़ाक बता रहे हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री चन्नी का विरोध करने में पंजाबी और पंजाब की संस्कृति का विरोध करने लगे। जिस एंकर ने अपनी अक्ल का यह करिश्मा दिखाया है यह वहीं हैं जो पिछले दिनों चीन की घुसपैठ के लिए भारतीय सैनिकों को जिम्मेदार ठहरा चुकी है। कहा था सीमा की रक्षा करना सेना की जिम्मेदारी है, सरकार थोड़ी घुसपैठ रोकने जाएगी। और नोटबंदी के समय तो दो हजार के नोट में चिप ढुंढने के इनके खोजी काम का कोई मुकाबला ही नहीं था।

अगर समय सामान्य होता अच्छे दिन नहीं होते तो इन्हें अभी तक पचास लोग बता चुके होते कि बहन अगर तैनूं पंजाबी की समझ भी नहीं है तो फिर तुस्सी कोई भी भाषा, बोली, खबर समझ में नहीं आ सकती। दफ्तर के ही कई लोग आते जाते पकड़ कर टोक देते। और जैसा की मालिक खुद पंजाबी है। स्टूडियो में आकर कहता कि तैनूं कि प्राब्लम है? पंजाबी समझ में नहीं आन्दी तो क्यूं उस विच सर मार दी है। पंजाबी प्रेम की भाषा है। नफरत करने वालों की समझ में नहीं सकती। मगर आज तो कोई भरोसा नहीं है कि इस कारनामे के लिए उसे एकाध और प्रमोशन न दे दिया गया हो।

पंजाबी भारतीय भाषाओं में सबसे ज्यादा आसान और सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। उत्तर भारत ही नहीं देश और दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाला कोई ऐसा नहीं होगा जिसनें पंजाबी नहीं सुनी हो। पंजाबी आदमी हर जगह है। और वह दुनिया के सबसे शक्तिशाली आदमी अमेरिका के राष्ट्रपति को भी तुस्सी ग्रेट हो पाजी ही बोलता है।

ऐसा नहीं है कि इस एंकर को भाषा की इतनी मोटी समझ भी नहीं हो। मगर चापलूसी को होड़ में एक दूसरे से ज्यादा आगे निकलने के चक्कर में ये ऐसी नई नई बातें खोज कर लाते रहते हैं। कभी पत्रकारिता में अक्ल का कंपीटिशन होता थी। आज बेअक्ली की है।

नोएडा के जिन स्टूडियो में बैठकर ये एंकर ज्ञान देते हैं इसके बगल से ही वेस्टर्न यूपी लगा है। जहां पिता को भी तुम कहा जाता है। पंजाबी में तो मां बाप से प्यार से तैनूं और तुस्सी कहा जाता है। मगर पश्चिमी यूपी में तो यह भाषाई संस्कृति का हिस्सा है।

भाषाएं, बोलियां कैसे बनती हैं। कैसे अपनी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह कभी पत्रकारिता का विषय हुआ करती थीं। हर क्षेत्रीय (आंचलिक) अखबारों में कुछ शब्द स्थानीय भाषा  के हुआ करते थे। रेडियो और दूरदर्शन तो सभी भारतीय भाषाओं में अपने कार्यक्रम चलाता था। खबरें देता था। उनके विभाग अलग हुआ करते थे। और उस भाषा के स्रर्वश्रेष्ठ रचनाकारों को उनसे जोड़ा जाता था। आज तो यह कई भाषाओं के कार्यक्रम ही बंद कर दिए गए हैं। कुछ समय पहले डोगरी वालों ने बताया था कि रेडियो से डोगरी के कार्यक्रम बंद किए जा रहे हैं।

पंजाबी के अलावा जो दूसरी भाषा हमें सबसे ज्यादा मीठी लगती है वह डोगरी है। जैसे पंजाबियों के लिए कहा जाता है कि पंजाबियों दी शान बख्खरी वैसे ही कहा जाता है कि खंड मिठे लोक डोगरे। भाषा से व्यक्ति और वहां के कल्चर से प्यार होने लगता है। और कभी कभी इसका उल्टा भी होता है कि व्यक्ति, विचार इतने प्रभावी और जन समर्थक हो जाते हैं कि वह भाषा और अच्छी लगने लगती है। आजकल मराठी के साथ यही हो रहा है। यह भाषा पसंद तो पहले भी थी मगर जब से वहां अर्णब गोस्वामी जैसा शब्दों का वमन करने वाला पत्रकार गिरफ्तार हुआ वह भाषा देश भर में और ज्यादा प्रिय हो गई।

आज जब देश में भाषाओं की राजनीति खत्म हो चुकी है तब न्यूज चैनल इसे फिर जिन्दा कर रहे हैं। कभी तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध होता था। आज उत्तर भारत की ही एक सर्वप्रिय भाषा पंजाबी का हिन्दी न्यूज चैनलों में हो रहा है। यह खेल करने वाले नहीं जानते कि वह कैसी आग लगा रहे हैं।

पंजाब बहुत मुश्किल से शांत हुआ है। चुनी हुई सरकार बनी है। प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी, संत लोगोंवाला हजारों सुरक्षा कर्मी और जनता के लोगों ने अपनी जान कुर्बान करके वहां शांति स्थापित की है। सोशल मीडिया पर आजकल बहुत चल रहा है कि बाकी लोगों ने जितने तिरंगे देखे भी नहीं होंगे उससे ज्यादा पंजाबियों ने तिरंगों में अपने बच्चों की लाशें लपेटी हैं। पंजाब को अस्थिर करने की कोशिश वहां अशांति को फिर हवा देना है।

प्रधानमंत्री मोदी 15 -20 मिनट के लिए एक फ्लाई ओवर पर फंसे तो उन्होंने अपनी जान को खतरा बता दिया। कहा कि जान बच गई। चन्नी इसी का जवाब दे रहे हैं कि कोई पास नहीं आया। कंकर नहीं फैंका। कुछ हुआ नहीं। फिर जान का खतरा कैसा?

भारत के प्रधानमंत्रियों पर कई वास्तविक हमले हो चुके हैं। इन्दिरा जी के अलावा राजीव गांधी ने अपनी जान गंवाई। मगर बहादुरी के साथ। बिना डरे। नेहरू पर कई बार हमले हए। नागपुर में चाकू से। एक महिला ने एक बार गला पकड़ कर पूछा कि आजादी से मुझे क्या मिला? नेहरू ने कहा प्रधानमंत्री का गला पकड़ने का अधिकार और हिम्मत। भुवनेश्वर, उड़ीसा में इन्दिरा गांधी को पथराव का सामना करने पड़ा। एक ईंट उनकी नाक पर आकर लगी। मगर वे भाषण देती रहीं। खून बहता रहा। मगर सुरक्षा कर्मियों द्वारा मना करने के बावजूद वे दूसरे कार्यक्रम में हिस्सा लेने कोलकाता पहुंच गईं। अभी प्रियंका गांधी ने भी इस घटना का जिक्र किया है। बस्तर के नक्सली इलाके में जनता ने उनकी गाड़ी रोक ली। वे रुक गईं। राजीव गांधी पर राजघाट में फायरिंग हुई। मनमोहन सिंह पर गुजरात में जूता फेंका गया। स्वर्ण मंदिर में काले झन्डे दिखाए गए। कितनी ही घटनाएं हैं। मगर प्रधानमंत्री हमेशा अविचलित रहे। सचमुच भारतीय प्रधानमंत्री के डरने या घबराने की कोई घटना इतिहास में कहीं दर्ज नहीं है।

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