संस्कृति अनुदान की प्रक्रिया पर सवाल

गिरिजाशंकर

कोरोना काल में समूची रंगमंचीय गतिविधियां रूकी हुई हैं। रंगकर्मी या तो अपने-अपने घरों में कैद हैं या डिजिटल प्लेटफार्म पर सक्रिय हैं। उनके सामने आर्थिक संकट भी गहराया हुआ है। हालांकि ऐसा नहीं है कि रंगमंच से सभी रंगकर्मियों का जीविकोपार्जन होता था, फिर भी गतिविधियां चलते रहने से थोड़ा सहारा रहता ही था। कोरोना काल के पहले से ही केन्द्रीय संस्थाओं से मिलने वाले अनुदान के रूके होने की षिकायत देष भर के रंगकर्मी करते रहे हैं।

उनकी गुहार थी कि कोरोना काल में ही सही, रूके हुए अनुदान को जारी कर दिया जाये ताकि रंगकर्मियों को कुछ आर्थिक मदद हो जाये लेकिन उनकी कोई सुनवाई होने की जानकारी नहीं मिली है। इस बीच अच्छी खबर यह आई कि मध्यप्रदेष में सत्ता परिवर्तन के साथ संस्कृति विभाग ने सांस्कृतिक संस्थाओं को मिलने वाला अनुदान (दो वर्षों का) जारी कर दिया। रंगकर्मियों व अन्य संस्कृति कर्मियों के लिये यह राहत भरी खबर थी। दुर्भाग्य से इस राहत भरी खबर में गहरी विसंगतियां समाई हुई है जो संस्कृति विभाग की निरंकुषता को प्रदर्षित करती है।

हुआ यों कि अनुदान जारी होने के कुछ दिन बाद भोपाल की दो बेहद सक्रिय व उर्जावान रंग अभिनेत्री व निदेषक विभा श्रीवास्तव और सिंधु धौलपुरे मेरे पास आई। दोनों बेहद निराष और व्यग्र थी। उन्होंने बताया कि उनकी संस्थाओं को मिलने वाला वार्षिक अनुदान इस वर्ष नहीं दिया गया जबकि उन्होंने सारी औपचारिकतायें पूरी की थी। उनकी संस्थाओं को अनुदान क्यों नहीं दिया गया, यह जानकारी पाने के लिये वे संस्कृति विभाग का चक्कर लगाती रही लेकिन कोई अधिकारी उन्हें यह जानकारी देने को तैयार नहीं। उनकी बेचैनी और हताषा स्वाभाविक थी क्योंकि साल भर अपनी रंगमंचीय गतिविधियों में सक्रिय रहने वाली इन रंगकर्मियों को अनुदान सूची से बाहर करना और बाहर करने का कोई कारण नहीं बताना उनके प्रति अन्यायपूर्ण कार्यवाई थी। हालांकि वे दोनों किसी की षिकायत नहीं कर रही थी अलबत्ता याचना की मुद्रा में थी कि उन्हें अनुदान स्वीकृत कर दिया जाये।

बहरहाल मैंने अपने स्तर पर इसका कारण जानना चाहा तो बताया गया कि एक ने अपने आवेदन में आडिट रिपोर्ट संलग्न नहीं किया है तो दूसरी में संस्था का नाम बदले हुए तीन वर्ष पूर्ण नहीं होने को कारण बताया गया। मैंने विभाग से जानना चाहा कि अनुदान स्वीकृति पर निर्णय लेने के पूर्व आवेदन में इस अपूर्णता की जानकारी संस्था को क्यांे नहीं दी गई तो बताया गया कि विभाग में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि अनुदान स्वीकृति के पहले संस्था को कोई जानकारी दी जाये और न ही बाद में अनुदान अस्वीकृति का कोई कारण बताया जाये।
संस्कृति विभाग की यह जानकारी उसके तानाषाही पूर्ण कार्यषैली का परिचायक लगता है। चूंकि मैं रंग गतिविधियों से प्रत्यक्ष तौर पर संबंद्ध नहीं हूँ इसलिये मुझे अनुदान संबंधी कोई जानकारी नहीं थी। बाद में पता चला कि सिंधु व विभा की तरह अनेक रंगकर्मी है जो साल भर नाटक करते रहते हैं लेकिन संस्कृति विभाग की हालिया अनुदान सूची में उनके नाम नदारद हैं।

जिन संस्थाओं को अनुदान दिये गये उनकी पात्रता-अपात्रता को लेकर जो विवाद है, उस पर मैं नहीं जाना चाहता लेकिन अनुदान को लेकर जो सीक्रेसी और मनमानीपन का रवैया संस्कृति विभाग का दिखा उसने मुझे भी बेचैन कर दिया। यह भी विडंबना है कि मुझसे मिलने के पहले विभा और सिंधु कई वरिष्ठ रंगकर्मियों के पास भी अपनी षिकायत लेकर गये थे लेकिन किसी ने भी संस्कृति विभाग तक उनकी षिकायत पहुंचाने की जहमत नहीं उठाई। उनका तर्क था, (जैसा कि विभा व सिंधु ने मुझे बताया) कि यदि वे संस्कृति विभाग के प्रति कोई षिकायत सामने लायेंगे तो उनका भी अनुदान बंद कर दिया जायेगा।

रंगकर्मियों में यह खौफ संस्कृति विभाग की कार्य प्रणाली ने पैदा की हुई है। संस्कृति विभाग की अन्यायपूर्ण कार्यषैली नई नहीं है लेकिन इसी डर से कोई कुछ बोलता नहीं और विभाग अपनी मनमानी पर कायम है। रंगकर्मियों व अन्य संस्कृति कर्मियों द्वारा संस्कृति विभाग के रवैये का प्रतिकार नहीं करना भी कम दुखद नहीं है। यह हाल मध्यप्रदेष के कलाकारों का ही नहीं है अलबत्ता राष्ट्रीय स्तर के कई कलाकारों ने विभाग के अधिकारियों को खुष रखने के अपने जतन मुझसे साझा करते रहे हैं।

विभाग की मनमानी का आलम यह है कि सांस्कृतिक संस्थाओं को दिये जाने वाले अनुदान स्वीकृत करने वाली समिति में सभी सदस्य केवल विभाग के सरकारी अधिकारी हैं, संस्कृति के क्षेत्र से कोई व्यक्ति इस समिति में नहीं है। संस्कृति विभाग के वे सारे अधिकारी संस्कृति के विषेषज्ञ हों, यह जरूरी नहीं। यहां तक कि वे सांस्कृतिक परिदृष्य में होने वाली गतिविधियों से भी ठीक-ठीक वाकिफ नहीं होते और निहायत असंवेदनषील तरीके से अनुदानों पर निर्णय लेते हैं। उनका कलाकारों के प्रति नजरिया भी तानाषाही पूर्ण होता है जिसके चलते अनुदान नहीं पाने वालों को यह बताने की जरूरत नहीं समझते कि किसी कलाकार या समूह को अनुदान के लिये क्यों अपात्र माना गया।

मेरी जानकारी के अनुसार विभा व सिंधु की संस्थाओं को अनुदान नहीं दिये जाने का जो कारण फाइल में दर्ज किया गया वह सही नहीं है। बरसों से रंगमंच करने वाला कोई कलाकार आडिट रिपोर्ट के बिना अनुदान के लिये आवेदन करे ऐसा हो नहीं सकता। जहां तक संस्था के नाम परिवर्तन वाला कारण बताना भी सही नहीं निकला क्योंकि नये नाम से उस संस्था को गत वर्ष अनुदान दिया गया था। संस्कृति विभाग के इस रवैये के चलते पता नहीं कितने सक्रिय व सृजनषील कलाकारों को अपात्र बताकर अनुदान से वंचित किया गया होगा तथा कितने अपात्रों को अनुदान से उपकृत किया गया होगा।

नवागत संस्कृति संचालक अदिति त्रिपाठी विद्वान व्यक्ति हैं तथा कला संस्कृति के प्रति उनकी संवेदना दिखती है। उनके संज्ञान में उक्त विसंगतियां लाई गई है लेकिन पिछले निर्णयों को बदलना शायद उनके लिए संभव न रहा हो। भविष्य के लिये उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि कला समूहों को अनुदान देने की विभाग की तानाषाही पूर्ण प्रवृत्ति को बदलकर अनुदान प्रक्रिया में विभागीय अधिकारियों के साथ ही कलाकारों की भागीदारी भी सुनिष्चित की जाये ताकि अनुदान स्वीकृति में पारदर्षिता बनी रहे व सरकारी धन का सही मायनों में कला व संस्कृति के संरक्षण और विकास में उपयोग हो सकें।

मुझे लगता है कि कलाकारों को भी अपनी ओर से पहल कर संस्कृति विभाग के साथ बेहतर संवाद की स्थिति बनाने की ओर बढ़ना चाहिए तथा यथासमय उनके गलत रवैये का प्रतिकार भी किया जाना चाहिए। यही तो संस्कृति का सामाजिक सरोकार है। जहां तक विभागीय मंत्री या राजनेताओं का सवाल है तो उनकी कोई रूचि देखने में नहीं आई कि वे कला संस्कृति के संरक्षण विकास की चिंता करें। वैसे भी संस्कृति हमारी राजनीति के आखिरी पैदान पर आती है। राजनीति व संस्कृति का कोई रिष्ता बनता हुआ दिखता ही नहीं। फिर भी मैं अपेक्षा करूंगा कि राजनेता कला संस्कृति के प्रति अपनी संवेदनषीलता को विकसित करें व अफसरषाही से विभाग को मुक्त करें।

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