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यात्रा सफल है पर राहुल चुनाव जीतने पर ध्यान दें!

यात्रा के बीच में जब यात्रा उम्मीद से भी ज्यादा सफल हो रही है तब राहुल का अचानक चीन पर बोलना कांग्रेसियों को ज्यादा पसंद नहीं आया।उन्हें लगा कि भाजपा इसका फायदा उठाकर यात्रा से लोगों का ध्यान डाइवर्टकर देगी। ऐसा हुआ भी। भाजपा के अध्यक्ष से लेकर मंत्री तक राहुल पर टूट पड़े। अपने स्टीरियो टाइप आरोप की देशभक्त नहीं है, चीन के एजेन्ट हैं लगाने लगे। एक ने तो बहुत ही मजेदार बात कही कि राहुल को कांग्रेस से निकाल देना चाहिए।

राहुल गांधी को समझना आसान नहीं। वैसे तो किसी भी आदर्शवादी, सिद्धांतप्रिय व्यक्ति को उस समय के (समकालीन) लोगों के लिए समझना मुश्किल होता है। मगर राहुल जैसे लगातार सीखते रहने वाले, जड़ सिद्धांतों को न मानकर उनमें समय परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन करते रहने वाले आदमीको समझना तो निशिचत ही रूप से बहुत मुश्किल है। ऐसे लोग अपने दायरों मेंबंधे नहीं होते। वे व्यापक दृष्टिकोण रखते हैं। अपनी पार्टी, अपनी मुहिमसे आगे जाकर देश की बात करते हैं।

यात्रा के सौवें दिन दौसा, राजस्थान ने राहुल का ऐतिहासिक स्वागत किया।हजारों की भीड़ सड़क पर उमड़ पड़ी। राहुल ने भी उस दिन छह साढ़े छह घंटेमें 26 किलीमीटर की यात्रा नाप दी। कांग्रेसियों में भारी जोश भर गया। उम्मीदों के पर लग गए। लेकिन शाम को अचानक राहुल ने चीन पर बात करकेसुविधा की राजनीति करने वाले कांग्रेसियों को सकते में डाल दिया।

प्रेस कांन्फ्रेंस थी। हम वहीं थे, उस समय जयपुर में। राजस्थान से संबधितसवाल हो रहे थे। राहुल बहुत नपे तुले जवाब दे रहे थे। एक दो सवाल यात्राके थे। जाहिर है कि राहुल को यात्रा पर बात करना पसंद आ रही थी। सौ दिनपूरे हुए थे। प्रेस कान्फ्रेंस का समय खत्म होने वाली थी। कान्फ्रेंस कासंचालन कर रहे कांग्रेस के कम्यूनिकेशन डिपार्टमेंट के चीफ जयराम रमेश बसएक दो सवाल  और लेने के लिए अपने सामने रखी सवाल पूछने के इच्छुकपत्रकारों की लंबी सूचि पर नजर दौड़ा रहे थे कि राहुल ने धमाका कर दिया।

पत्रकारों से बोले मुझे पता था कि आप में से कोई भी मुझसे चीन पर सवालनहीं करेगा। आप भी चीन पर बात नहीं कर सकते। प्रधानमंत्री और सरकार तोचीन पर बोलती ही नहीं है आप पत्रकार भी उसकी बात करने से बचते हैं। औरफिर राहुल ने कहा कि चीन लद्दाख, अरुणाचल में सिर्फ जमीन पर कब्जा,घुसपैठ ही नहीं कर रहा। वह युद्ध की तैयारी कर रहा है। फुल फ्लेजड वार(पूर्ण युद्ध)। और हमारी सरकार सोई हुई है। मैं बार बार सावधान कर रहाहूं। इस बड़े खतरे से आगाह कर रहा हूं। मगर सरकार नहीं सुन रही।

यात्रा के बीच में जब यात्रा उम्मीद से भी ज्यादा सफल हो रहीहै तब राहुल का अचानक चीन पर बोलना कांग्रेसियों को ज्यादा पसंद नहीं आया।उन्हें लगा कि भाजपा इसका फायदा उठाकर यात्रा से लोगों का ध्यान डाइवर्टकर देगी। ऐसा हुआ भी। भाजपा के अध्यक्ष से लेकर मंत्री तक राहुल पर टूटपड़े। अपने स्टीरियो टाइप आरोप की देशभक्त नहीं है, चीन के एजेन्ट हैंलगाने लगे। एक ने तो बहुत ही मजेदार बात कही कि राहुल को कांग्रेस सेनिकाल देना चाहिए।

वैसे एक बात है। आज यात्रा ने राहुल का जलवा बना दिया है। जनता सेलेकर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं तक में उत्साह आया है। डर का माहौल कम हुआहै। लेकिन अध्यक्ष न बनकर एक सामान्य नेता की तरह काम कर रहे राहुल को यहयाद रखना चाहिए कि जिस दिन उनकी धमक कम होगी और राजनीति में वह समय कईबार आता है कि बड़े से बड़े नेता का समय खराब आ जाता है। क्रिकेट की भाषामें बाल बेट पर आती ही नहीं है। उस समय अगर राहुल ने कोई बड़ा आदर्शवादीकदम उठाया और पार्टी को लगा कि इससे उसे परेशानी हो सकती है तो वह राहुलके खिलाफ भी कार्रवाई करने से नहीं चूकेगी।

इन्दिरा गांधी को इन्हींकांग्रेसियों ने पार्टी से निकाला था। सोनिया गांधी को जब वे कमजोर लगरही थीं तो 23 लोगों ने एक गुट बनाकर उन्हें धमकाने की कोशिश की थी।परिवार के बाहर का अध्यक्ष बनाकर राहुल ने क्या हासिल किया यह तो समयबताएगा मगर यह सच है। कांग्रेस का सच कि यहां परिवार का व्यक्ति जब भीकमजोर पड़ता है उसके खिलाफ तेजी से लोग इकट्ठा होने लगते हैं। और मारनेकी तैयारी शुरू हो जाती है। नेहरू भी जब सरकारी विदेश दौरे पर थेकांग्रेसियों ने सीडब्ल्यूसी की बैठक बुलाकर उसमें संघ के सदस्यों को

कांग्रेस का सदस्य बनाने का प्रस्ताव पास कर दिया था। बाद में नेहरू नेउसे वापस करवाया। सीडब्ल्यूसी कांग्रेस की सर्वोच्च नीति निर्धारक ईकाईहै। इसमें7 अक्तूबर 1949 की बैठक में आरएसएस के लिए दरवाजे खोले गए थे।यहां यह बताना जरूरी है कि उससे करीब तीन महीने पहले ही संघ पर सेप्रतिबंध हटाया गया था। जो उस पर सरदार पटेल तत्कालीन केन्द्रीयगृहमंत्री ने गांधी जी की हत्या के बाद लगाया था।

राहुल याद रखें परिवार के किसी भी व्यक्ति को नहीं छोड़ा है। उनके पिताराजीव गांधी के खिलाफ बगावत उनके ही सबसे निकटतम लोगों ने की थी।प्रियंका गांधी के शब्दों में मेरे पिता की पीठ में खास रिश्तेदारों (अरुण नेहरू) ने ही छुरा घोंपा था।

राजनीति में पावर ही सत्य है। अगर आप शक्तिहीन हुए तो कौन आपके खिलाफ चलाजाएगा, यह आप सोच भी नहीं सकते। इस यात्रा ने राहुल को कांग्रेस की उम्मीदोंका केन्द्र बना दिया है। इसलिए सब खामोश हैं। नहीं तो जी-23 के लोगों केअलावा कांग्रेस छोड़कर गए लोग भी कुछ न कुछ बोलते। अभी तो गए हुए लोगउम्मीद करते हैं कि वहां अगर ज्यादा अपमान हुआ, नहीं सह पाए तो वापस आजाएंगे। मगर वापस तभी आएंगे जब कांग्रेस सत्ता में होगी या सत्ता पाने केकरीब।

राहुल को अपने आत्मसम्मान के लिए और कांग्रेस के भविष्य के लिए यहयाद रखना होगा कि अगर राजनीति में हैं तो राजनीति करनू पड़ेगी। चुनावजीतना पड़ेंगे। अभी एक हिमाचल, छोटा सा राज्य जीतने पर कैसा खुशी कामाहौल बना था यह याद रखना पड़ेगा। खुश राहुल भी हैं। अभी जयपुर मेंपत्रकारों से कह रहे थे कि हमें हिमाचल जीतने की बधाई नहीं दोगे?1969 में जब इन्दिरा गांधी के खिलाफ मुहिम चलाई तब वे प्रधानमंत्री थीं।इसलिए वे परास्त नहीं हुईं। उनके पास सत्ता भी थी और जन समर्थन भी।बैंकों के राष्ट्रीयकरण का ऐतिहासिक कदम उन्होंने तभी उठाया था। तभीपुराने कांग्रेसियों से लड़ते हुए कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी संजीवा

रेड्डी के खिलाफ निर्दलीय वीवी गिरी को राष्ट्रपति बनाया था। जगजीवन रामको कांग्रेस अध्यक्ष बनाया था। वही जगजीवन राम जब इन्दिरा 1977 का चुनावहार गईं तो उन्हें छोड़कर जनता पार्टी के साथ चले गए थे।

कांग्रेस का इतिहास बहुत दिलचस्प और उतार चढ़ाव से भरा हुआ है। आजादी केआंदोलन में उसकी नेतृत्वकारी भूमिका एक अलग गौरवशाली इतिहास है। मगरदूसरी तरफ सत्ता जाते ही छटपटाने लगना कांग्रेसियों का एक अलग कालाइतिहास है। अभी आठ, साढ़े आठ साल में ही राहुल ने देखा कि कैसे कैसे लोगकांग्रेस छोड़कर चले गए। घर बैठ गए। और खुद उनके दोस्त होने का दावा करनेवाले विश्वासघात कर गए।

राहुल राजनेता ( स्टेट्समेन) की तरह व्यवहार करें। मगर यह याद रखें किपार्टी राजनीतिक है। और अगर पार्टी कमजोर हुई तो वे भी प्रभावहीन होजाएंगे। पार्टी को उनसे और उन्हें पार्टी से ताकत मिलती है। यहअन्योन्याश्रित संबंध है। अकेले मसीहा वे नहीं बन सकते। यात्रा सफल करें।चुनाव जीतें। तभी अपने आदर्शों को क्रियान्वित कर पाएंगे। नेहरू जी नेदेश का नवनिर्माण किया। नई वैज्ञानिक चेतना दी प्रधानमंत्री बनकर। नहींतो आजादी के आंदोलन का उनका इतिहास बस कई लोगों के साथ जुड़ा हुआ ही रहजाता। एक अध्याय में बहुत सारे नेताओं के साथ संयुक्त। नेहरू की दूसरीपारी प्रधानमंत्री बनने वाली ही ज्यादा चमकदार और देश को बनाने वाली रही।

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