राहुल गांधी को कड़े फैसले लेने होंगे

नींव का निर्माण फिर! राहुल गांधी के लिए कांग्रेस को फिर से खड़ा करने का इससे अच्छा मौका और कौन सा होगा? कोई भी संगठन जब अपने पतन की चरम अवस्था में हो, निराशा और दिशाहीनता के दौर में हो तब उसे नए सिरे से पुनर्निर्मित करने के अलावा और कोई चारा नहीं होता है। उपरी रंगरोगन और मरम्मत से काम नहीं चलता है।

कांग्रेस को जरूरत है रेनेसां (Renaissance) की,नवजागरण की। राहुल यह काम कर सकते हैं। इसके लिए उनमें पर्याप्त मजबूती और जोखिम उठाने का साहस है। अभी सचिन पायलट के मामले में उन्होंने तत्काल फैसला लिया। इनफ इज इनफ। सचिन जिन्हें मीडिया उनका दोस्त बता रही थी, को प्रदेश अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री पद से निकालकर बाहर किया। नतीजा अगले दिन ही सामने आ गया। कल तक जो सचिन कह रहे थे कि अशोक गहलोत के पास बहुमत नहीं है और मैं विधायक दल की बैठक में नहीं जाऊंगा वे बुधवार को कह रहे थे कि मैं पार्टी के खिलाफ कब बोला? वे सुबह के भूले बन गए! शाम को घर के बाहर मुरझाया चेहरा लेकर बैठ गए।

यह नतीजा है लीडर की लीडरी दिखाने का। राहुल को आज यह सोचना चाहिए कि उनके पास खोने के लिए क्या है? लेकिन बनाने के लिए एक महान पार्टी की वापसी का सपना है। वह पार्टी जो आज लगातार दो लोकसभा चुनाव हार चुकी है। राज्यों में जहां सरकार बनी भी थी वहां जा रही है। जहां चुनाव आने वाले हैं, जैसे बिहार में वहां चौथे पांचवें नंबर की पार्टी है।

बिहार के कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच गहरी खाई है।  वह एकमात्र ऐसा राज्य है जहां कांग्रेसी खुल कर कहते हैं टिकट बिकेंगे। हालांकि हालत यूपी में भी बहुत खराब है। लेकिन प्रियंका के चार्ज संभालने के बाद से कार्यकर्ताओं में कम से कम एक विश्वास तो आया है कि कोई नेता टिकट नहीं बेच पाएगा। कांग्रेस में इस तरह की अनेक समस्याएं हैं। लेकिन हमेशा उनका ऊपरी इलाज कर दिया जाता है। समस्या को जड़ से निकालने के बारे में कोई नहीं सोचता।

लोकसभा चुनाव में टिकट बेचने से लेकर पार्टी हितों के खिलाफ गठबंधन करने के बहुत सारे आरोप लगे। कांग्रेस के बड़े नेता अखिलेश प्रसाद सिंह जिन्हें कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव से पहले राज्यसभा भी दी थी ने अपने बेटे को दूसरी पार्टी आरएलएसपी से टिकट दिलवा कर चुनाव लड़वा दिया। वहां पटना में प्रदेश कांग्रेस के दफ्तर सदाकत आश्रम में भारी हंगामा हुआ कि गठबंधन नेताओं के स्वार्थ के लिए हुआ है। जहां कांग्रेस मजबूत थी वह सीटें दूसरी पार्टी के लिए छोड़ दीं। नतीजा बिहार में कांग्रेस को लोकसभा में कुछ नहीं मिला।

अब विधानसभा चुनाव से पहले राहुल ने जब बिहार के नेताओं से बात की तो शिकायतों का ढेर लग गया। नेताओं को एक दूसरे पर यकीन नहीं है और कार्यकर्ताओं को नेताओं पर। ऐसी स्थिति में राहुल को वहां आपरेशन क्लीन करना होगा। विधानसभा  चुनाव में तभी कांग्रेस कुछ बेहतर कर पाएगी। दस साल पहले बिहार विधानसभा चुनाव में राहुल ने बहुत मेहनत की थी। जनता में कांग्रेस के लिए भावनाएं दिख रहीं थीं। मगर कांग्रेस के इन्चार्ज जगदीश टाइटलर और प्रदेश कांग्रेस में ऐसे झगड़े हुए कि लगा कि चुनाव तो इन दोनों के बीच ही है। राहुल के पास वह मौका था जब वे बिहार में गुटबाजी पर सख्ती से लगाम लगा सकते थे और संगठन को नए सिरे से खड़ा कर सकते थे मगर ऐसा नहीं हुआ।  आज स्थिति उससे भी ज्यादा खराब हो गई है।

हर राज्य में कमोबेश ऐसी ही स्थिति है। राजस्थान में तो सचिन के उपर त्तत्काल कार्रवाई करने से फिलहाल सरकार बच गई। मगर मध्य प्रदेश में तो सिंधिया को लंबी ढील देने के कारण सरकार ही चली गई। उदारता, सबको साथ लेकर चलना अच्छे गुण हैं। मगर हमेशा इनसे काम नहीं चलता। कई मौके ऐसे आते हैं जब परिवार से लेकर राजनीति तक कठोर फैसले लेना होते हैं। सिर्फ खुश करते चले जाने और दिल खोलकर देने से आप किसी को वफादार नहीं बना सकते। सिंधिया और सचिन तो छोटे उदाहरण हैं। प्रणव मुखर्जी को कांग्रेस ने क्या नहीं दिया? मगर प्रणव कहां पहुंचे सीधे नागपुर।

कांग्रेस में यह परंपरा रही है कि जब भी नेतृत्व कमजोर होता है हर नेता को यह लगता है कि उसे कम और दूसरों को ज्यादा मिल रहा है। इंदिरा गांधी इसकी इजाजत नहीं देती थीं। प्रधानमंत्री बनने के बाद जब उन्होंने देखा कि उन्हें काम करने से रोकने के लिए पार्टी में कुछ लोगों ने इकट्ठा होकर सिंडिकेट बना लिया तो इंदिरा ने उनके साथ समझौता करने के बदले आर पार की लड़ाई छेड़ दी। संगठन पर पुराने लोगों का कब्जा था। 1969 में राष्ट्रपति के चुनाव में उन्होंने नीलम संजीव रेड्डी को उतारा। इंदिरा गांधी का साहस इसीलिए प्रसिद्ध है कि उन्होंने अपनी पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ ही दूसरा उम्मीदवार उतार दिया। वीवी गिरी को लड़ाया और जिताया।

वह एक ऐसा निर्णायक प्रहार था कि उसके बाद पार्टी में और पार्टी के बाहर सब मान गये कि इंदिरा गुंगी गुड़िया नहीं लौह महिला हैं। उसके बाद 1971 में पाकिस्तान के दो दो टुकड़े करना तो वह ऐतिहासिक कारनामा था कि जिसके बाद उनके साहसपूर्ण नेतृत्व की गाथा देश के बाहर विदेशों में भी कही सुनी जाने लगी। लेकिन इन्दिरा जी के बाद राजीव गांधी और फिर सोनिया कठोर नेतृत्व के बदले समन्वय की राजनीति करने लगे। राजीव ने इसमें बहुत धोखे खाएं। और धोखे उसी तरह जैसे राहुल को उनके दोस्त माने जाने वाले सिंधिया और सचिन ने दिए, राजीव के बेहद विश्वासपात्र वीपी सिंह और रिश्तेदार अरूण नेहरू ने दिए। अगर आप इतिहास से सबक नहीं लेते हो तो वह कैसे खुद को दोहराता है इसका उदाहरण है कि राजीव को सख्त फैसले न ले पाने के कारण प्रधानमंत्री पद और बेटे राहुल को पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ने पड़े।

सोनिया इन सबमें सबसे उदार मानी जाती हैं। उन्होंने यह याद दिलाने के बावजूद कि प्रणव मुखर्जी ने राजीव गांधी का विरोध किया था और कांग्रेस से विद्रोह करके अपनी अलग पार्टी बनाई थी प्रणव को राष्ट्रपति बनाया। लेकिन जब राहुल आरएसएस का नाम लेकर उसकी आलोचना कर रहे थे तो प्रणव मुखर्जी अपनी निष्ठा दिखाने के लिये संघ मुख्यालय पहुंचे गए।

सोनिया के अंदर माफ करने और भूल जाने का अद्भूत गुण है। 2000 में जितिन प्रसाद के पिता जितेन्द्र प्रसाद ने सोनिया के खिलाफ पार्टी अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा और सचिन के पिता राजेश पायलट ने सोनिया गांधी के खिलाफ जितेन्द्र प्रसाद का साथ दिया। लेकिन जितेन्द्र प्रसाद के न रहने के बाद सोनिया ने जितेन्द्र प्रसाद की पत्नी और जितिन की मां कान्ता प्रसाद को लोकसभा का चुनाव लड़वाया। इसी तरह राजेश पायलट जिन्हें राजनीति में राजीव गांधी लाए थे और जिन्होंने राजीव के न रहने पर सोनिया का विरोध किया था उसे भूलकर राजेश के न रहने पर उनकी पत्नी रमा पायलट को सांसद बनवाया। और फिर कांग्रेस को सत्ता में लाकर दोनों के बेटों जितिन और सचिन को मंत्री बनाया। आज विडंबना है कि जितिन सचिन का पक्ष ले रहे हैं। कांग्रेस के इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में राहुल को सोचना है कि वह पार्टी को कैसा नेतृत्व देना चाहते हैं। और अगर वे नरम, अति उदार, बार बार मौके देने के अपने पुराने तरीके को जारी रखते हैं तो क्या इससे

पार्टी में गैर जवाबदेही और अनुशासनहीनता नहीं बढ़ेगी? और अगर वे अभी सचिन के मामले में उठाए त्वरित और सख्त फैसले जैसे कदम उठाते हैं तो क्या पार्टी में सही संदेश नहीं जाएगा? पार्टी में सैंकड़ों नेता और हजारोंलाखों कार्यकर्ता आज भी कांग्रेस और नेतृत्व के वफादार हैं। मगर सब एक ही बात चाहते कि पैमाने सबको लिए एक जैसे हों। सचिन, सिंधिया, जितिन, देवड़ा, प्रिया दत्त और तमाम जो अशोक गहलोत के शब्दों में बिना रगड़ाई के सब कुछ पा लिये उनके लिए माफी, प्यार पुचकार और अन्य सामान्य नेता और कार्यकर्ता के लिए दूसरे कायदे कानून न हों। राहुल को अगर नेतृत्व करना है और पार्टी को फिर से खड़ी करना है तो उन्हें कई अप्रिय सवालों का सामना करना होगा। सख्त फैसले लेना होंगे।

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2 thoughts on “राहुल गांधी को कड़े फैसले लेने होंगे

  1. आप ने सही विश्लेषण किया है।आपने जो भी नाम गिनाये हैं वो सभी कांग्रेस से इतना अधिक पा कर गये जिसके लायक वे कभी नहीं रहे।इनका कांग्रेस की विचारधारा से ( जो हर जाति ,सम्प्रदाय ,धर्म, अमीर गरीब को साथ लेकर चलने की है )कोई लगाव नहीं रहा, केवल मौके की तलाश में रहे।राहुल गांधी जी को चाहिए कि अब सहृदयता छोड़ कर कठोर बनें और सभी को सपष्ट कर दें कि कांग्रेस में वे ही रहें जो बिना सत्ता या लालच के देश के दलितों, वंचितों, आदिवासियों, और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को वर्तमान अधिनायकवादी, साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वाली सरकार से वापस लेने के लिए सड़कों पर उतरने, जेल जाने, पुलिस की लाठी खाने का जज्बा रखते हों।जिनको जाना है जायें।हो सके तो उनको भाव भीनी विदाई देकर पार्टी से मुक्त कर दें ताकि किसी को कोई शिकवा शिकायत न हो। दुर्भाग्य से समाज में साम्प्रदायिक विभाजन बहुत गहरा हो चुका है, चुनाव लड़ने वाले लोग किसी भी विचार धारा से जुड़े हुए नहीं हैं उनका एक मात्र लक्ष्य चुनाव जीत कर सत्ता पाना है।ऐसे में कांग्रेस को देश के भविष्य के लिए एक बार फिर लम्बा संघर्ष करना है।सत्ता की चाह रखने वाले लोग अगर पार्टी में रहेंगे तो इस संघर्ष को कमजोर करेंगे।वर्तमान समय में देश को फिर एक गांधी, नेहरु, पटेल, अम्बेडकर की जरुरत है।राहुल गांधी निर्भय होकर पूरी शक्ति से आगे बढ़ें।

  2. मैंने इस लेख पर अपना विचार लिखा था।अभी तक क्यों प्रकाशित नहीं हुआ?

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