‘साइकिल’ की सवारी कर ‘राहुल’ की टीम में पहुंचेंगे ‘राजा’

कांग्रेस पेट्रोल, डीजल के बढ़ते दाम जैसे जनहित के मुद्दों पर राजनीति कर यदि 24 विधानसभा सीटों पर खुद को लड़ता हुआ दिखाई दे इसके लिए वह जरूरी माहौल बनाना चाहती है।

तो इसकी एक वजह सत्ता वापसी का मंत्र फूंक कर कार्यकर्ताओं में जोश पैदा करना भी माना जाएगा.. जरूरी नहीं कांग्रेस का यह लक्ष्य पूरा हो लेकिन भाजपा में असमंजस और सरकार अस्थिर नजर आए इसलिए मचा देना या यूं कहें कि भ्रम पैदा करना भी उसकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। कांग्रेस से आगे बात दिग्विजय सिंह की करें तो फिर इस आंदोलन की आड़ में छुपे राजा के दूसरे मकसद को भी समझना होगा।

भोपाल से लोकसभा का चुनाव हारने के बाद राजधानी समेत समूचे संसदीय क्षेत्र के प्रति अपनी जवाबदेही निभाने के लिए इसे अपना कार्यक्षेत्र घोषित किया था क्या इस क्षेत्र से चुनाव लड़ते रहे दूसरे नेता भी उनके साथ नजर आएंगे.. यह सवाल इसलिए क्योंकि पेट्रोल डीजल के बढ़ते दाम के खिलाफ यह प्रदेश स्तरीय आंदोलन है।

तो दूसरे छत्रप भी क्या जिला मुख्यालय पर आंदोलन का हिस्सा बनकर अगुवाई करेंगे .. क्योंकि पिछले दिनों राजा जब एफ आई आर दर्ज कराने थाने जा रहे थे .. तब उनके साथ एनपी प्रजापति और सज्जन सिंह वर्मा जैसे नेता मौजूद थे.. उस वक्त राज्यसभा निर्वाचन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई थी ..अब दिग्विजय सिंह साइकिल से मुख्यमंत्री निवास पहुंचेंगे तो क्या शिवराज से उनकी मुलाकात पहले ही पक्की हो चुकी है.. यदि उस वक्त संभवत मुख्यमंत्री बल्लभ भवन में मौजूद रहे.. तो क्या राजा बल्लभ भवन भी पहुंचेंगे.. जैसे कभी आदिवासियों की मांग को लेकर शिवराज कमलनाथ से मिलने मंत्रालय पहुंच गए थे। जो भी हो राजा राज्यसभा का सर्टिफिकेट हासिल करने के एक सप्ताह के अंदर सड़क पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने जा रहे हैं।

सावधान सिर्फ भाजपा और मुख्यमंत्री शिवराज नहीं बल्कि कांग्रेस के वह नेता भी जो इस आंदोलन से दूरी बनाते हुए नजर आएंगे.. क्यों कि इसे राजा की तत्परता, जिम्मेदारी निभाने के साथ बिना समय गवाएं नई सियासी पटकथा को आगे बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा ही माना जाएगा ..ऐसे में कई सवाल एक साथ में होते हैं.. क्या राजा फॉर्म में लौट चुके हैं.. सांसद बनने के साथ उन्होंने भाजपा की घेराबंदी के लिए जरूरी कांग्रेस में जोश भरने की यदि ठानी है तो फिर इसमें कमलनाथ कहां होंगे.. विपक्ष की राजनीति के माहिर खिलाड़ी के तौर पर राजा खुद के लिए क्या मध्य प्रदेश में मैदान साफ देख रहे हैं। या फिर उनकी नजर दिल्ली पर भी टिकी है.. कांग्रेस के अंदर मध्यप्रदेश में उपचुनाव के बाद बड़े बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.. फिलहाल कमलनाथ भले ही इस पर पूर्णविराम लगा चुके हैं।

तो सवाल क्षत्रिय नेता के तौर पर यदि दिग्विजय सिंह कांग्रेस के एडजस्टमेंट फार्मूले में व्यक्तिगत तौर पर अपनी भूमिका हासिल कर चुके.. तो क्या जब भी नए प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष मांग जोर पकड़ तो इन दो बड़ी भूमिकाओं में जातीय संतुलन बनाने के साथ कांग्रेस की गुटीय राजनीति को भी ध्यान में रखा जाएगा.. सवाल दिग्विजय सिंह के समकालीन और उनके द्वारा तैयार किए गए कांग्रेस के दूसरी पीढ़ी के नेताओं के लिए आखिर क्या गुंजाइश रह जाती है.. तो सवाल मध्यप्रदेश में वक्त है बदलाव का नारा देने वाली कांग्रेस पीढ़ी परिवर्तन के दौर में युवा जुझारू नेताओं के सुपुर्द संगठन को कब करेगी।

सवाल यदि 73 साल की इस उम्र में दिग्विजय साइकल चला कर जनता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे.. तो क्या इस संदेश को कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व भी गंभीरता से लेगा.. राजा भले ही बैक डोर एंट्री के जरिए लेकिन लगातार दूसरी बार सांसद बन चुके हैं.. उनके तेवर आक्रमक और वह जनता के बीच उसे उसका हक दिलाने के लिए सियासी लड़ाई सड़क पर लड़ने की मंशा भी रखते हैं.. क्या यह मान लिया जाए कि दिग्गी राजा की नजर ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी से बाहर जाने के बाद प्रदेश की राजनीति तक सीमित हो कर रह गई है ..या फिर पूरी तरह से खुद को दिल्ली शिफ्ट कर वह राष्ट्रीय राजनीति करना चाहेंगे.. तो सवाल क्या जिन उपचुनावों को कमलनाथ के लिए अंतिम लड़ाई माना जा रहा।

राजा को बेताबी से उसके परिणामों का भी इंतजार है.. या फिर फिर प्रदेश की राजनीति में चाहे सदन के अंदर हो या फिर संगठन का नेतृत्व कमलनाथ की पसंद का ही कोई चेहरा सामने आएगा.. या फिर दिग्विजय के राज्यसभा सांसद बनने के बाद प्रदेश के इन दो महत्वपूर्ण पदों पर दिग्विजय से इत्तेफाक नहीं रखने वाले पार्टी में अभी भी उनके प्रतिद्वंदी माने जाने वाले दूसरे नेताओं पर राष्ट्रीय नेतृत्व भरोसा करेगा.. कुल मिलाकर क्या कांग्रेस में नए सिरे से समन्वय की सियासत भविष्य में देखने को मिलेगी.. जिसमें एडजस्टमेंट के नाम पर ही सही दूसरे क्षत्रपों की की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाएगी.. राजनीति संभावनाओं का खेल है और दिग्विजय सिंह ने अपनी उपयोगिता सिद्ध करके पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व का भरोसा जीता।

यह साबित किया ढलती उम्र में भी कांग्रेस में उनकी पूछ परख लगातार बढ़ रही है.. मध्य प्रदेश की राजनीति में कुछ महीनों पहले तक राजा और महाराजा के बीच प्रतिस्पर्धा की खूब चर्चा रही है.. लेकिन कमलनाथ सरकार के तख्तापलट के बाद यह खबर भी अपुष्ट तौर पर निकल कर सामने आ चुकी है कि कई विवादों के चलते ज्योतिरादित्य और कमलनाथ के बीच में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं था .. पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व में इन दोनों नेताओं के बीच सुलह कराने की जिम्मेदारी दिग्विजय सिंह को सौंपी थी.. इसी बीच सड़क पर उतर जाने और उतर जाओ के इन दो शीर्ष नेताओं के बयानों ने कांग्रेस की इंटरनल पॉलिटिक्स को गरमा दिया था …जिसकी एक बैठक दिल्ली में हुई थी तब बात बनने के बजाय और बिगड़ गई थी। किसे किसकी कौन सी बात बुरी लगी इस पर इस बैठक में मौजूद नेता बोलने को तैयार नहीं.. बाद में दिग्गी राजा ने शिवपुरी गुना दौरे के दौरान सिंधिया से मुलाकात कर संवाद आगे बढ़ाने की कोशिश की थी।

लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.. उस वक्त की तस्वीरें गवाह है कि यह मुलाकात हंसी ठिठोली के साथ सड़क तक सीमित होकर रह गई थी.. बदलते राजनीतिक परिदृश्य में दिग्विजय सिंह को पहली पसंद के तौर पर मध्य प्रदेश के राज्यसभा में भेजे जाने के बाद अब उनकी नई भूमिका की अटकले फिर शुरू हो गई है.. सवाल जब भी राहुल गांधी के एक बार फिर पार्टी की कमान संभालने की अटकलों पर विराम लगेगा.. तब क्या दिग्विजय सिंह उनकी टीम में नजर आएंगे.. जिन्होंने कभी उत्तर प्रदेश के प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव रहते राहुल गांधी के साथ देश के सबसे बड़े राज्य में साथ काम किया था। या फिर गोवा में सरकार नहीं बना पाने के बाद जिन्हें धीरे धीरे कई राज्यों के प्रभारी से मुक्त कर दिया गया था ..उस वक्त दिग्विजय सिंह अपनी नई स्क्रिप्ट को आगे बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में नर्मदा यात्रा पर निकल गए थे। बाद में विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी ने भले ही कमलनाथ और ज्योतिरादित्य की जोड़ी को सामने रखकर चुनाव लड़ा। लेकिन कोऑर्डिनेटर की भूमिका निभाते हुए दिग्विजय ने मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।

धारणा यही बनी की खुद सुपर सीएम के तौर पर स्थापित हो गए.. इस बीच राज्य सभा की 2 सीटों को लेकर पार्टी के अंदर विवाद खड़ा हुआ और विवादों के चलते सरकार खो दी.. अब जब एक बार फिर दिग्विजय राज्यसभा में नजर आएंगे.. तब पार्टी में उनकी नई भूमिका को लेकर कयास फिर से शुरू हो जाएंगे.. आखिर वह प्रदेश या फिर केंद्र की राजनीति करेंगे.. कांग्रेस जब राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी के नेतृत्व में युवाओं को आगे लाने की रणनीति पर लगातार आगे बढ़ रही है.. कोरोना के कहर से पहले कांग्रेस के अंदर अप्रैल में राहुल गांधी को फिर से राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने के बयान उनके जिम्मेदार नेता देते रहे.. चाहे फिर वह रणदीप सिंह सुरजेवाला हो अजय माकन, शशि थरूर ..कांग्रेस के अंदर यह बहस अभी खत्म नहीं हुई है।

कोरोना काल में भी जिस तरह राहुल गांधी विशेषज्ञों के इंटरव्यू एक पत्रकार की भूमिका में ले रहे या फिर कोरोना से आगे देश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति और सीमा पर तनाव खासतौर से चीन के मुद्दे पर पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सिर्फ सांसद रहते सुरक्षा नीति पर सवाल खड़े कर रहे.. उसने एक बार फिर आक्रामक राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंपी जाने की मांग जोर पकड़ रही है.. सवाल क्या राहुल गांधी अपने मित्र ज्योतिरादित्य को खो देने के बाद क्या अनुभवी दिग्गी राजा को अपनी टीम में शामिल करेंगे.. जिनकी पहचान ही मोदी शाह और भाजपा ही नहीं बल्कि संघ को खरी खोटी सुनाना है। बड़ा सवाल ज्योतिरादित्य भी राज्यसभा में पहुंच चुके हैं और जल्द उन्हें मोदी मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है.. जिसके बाद मध्य प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस छोड़ चुके भाजपा के इस नेता के बढ़ते दखल से इनकार नहीं किया जा सकता.. सवाल क्या राहुल गांधी दिग्विजय सिंह को संगठन की अपनी टीम में लेकर मध्यप्रदेश में नई चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस की नई स्क्रिप्ट को आगे बढ़ाएंगे।

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