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क्या पायलट का विमान भी भाजपा के विमानतल पर ‘लैण्ड’ करेगा…?

भोपाल। राष्ट्रीय पटल से अब धीरे-धीरे विलोपित होती जा रही कांग्रेस अब राज्यों की ओर मुखातिब हो गई है? क्योंकि किसी समय कई दशकों तक पूरे देश पर राज करने वाली कांग्रेस अब अपने ‘दुर्दिन’ देखने को मजबूर है, राष्ट्रीय राजनीति मे तो अब वह अपना वजूद खो ही चुकी, अब उसकी गिनी-चुनी राज्य सरकारें बुरे दिन देखने को मजबूर हो रही है, जिसका ताजा उदाहरण राजस्थान है, जहां एक शख्स की पद की हवस ने पूरी पार्टी को हाशिये पर ला दिया है। जी हाँ, यहां जिक्र राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत का हो रहा है जो इन दिनों पौराणिक पात्र भस्मासुर की भूमिका अख्तियार कर अपनी जन्मदात्री पार्टी को भस्म करने पर तुले है, उनकी पद लिप्सा इतनी अधिक बढ़ गई है कि वे अखिल भारतीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर आसीन होकर राजस्थान के मुख्यमंत्री पद को भी अपने अधिकार में रखना चाहते है और युवा प्रभावी नेता सचिन पायलट को किसी भी स्थिति में मुख्यमंत्री नहीं बनने देना चाहते। इसीलिए यह राजनीतिक संभावनाएं स्पष्ट होने लगी है कि मध्यप्रदेश का इतिहास राजस्थान के युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह सचिन पायलट भी भाजपा में जा सकते है।

उल्लेखनीय है कि जिस तरह मध्यप्रदेश के वरिष्ठ कांग्रसी नेता स्व. माधवराव सिंधिया के सुपुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया का राज्य में उनकी खानदानी परम्परा के अनुरूप राजनीतिक वर्चस्व है, उसी तरह पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व. राजेश पायलट के सुपुत्र सचिन पायलट का भी राजस्थान कांग्रेस में गहरी पैठ है, अब जब कांग्रेस संगठन के चुनाव सामने आए तो पार्टी आलाकमान से नजदीकी रखने वाले अशोक गेहलोत ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की तमन्ना पूरी करने का प्रयास शुरू किया और काफी हद तक वे अपने प्रयासों में सफल भी रहे, किंतु उन पर ‘पद लिप्सा’ इतनी अधिक सवार हो गई कि उन्हांेंने राहुल गांधी के प्रिय पात्र सचिन पायलट की ही खिलाफत शुरू कर दी, इस मामले में वे राहुल जी की भी नहीं सुन रहे है, वे अपने ही किसी प्रिय पात्र को राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर देखना चाहते है, जिससे कि कांग्रेस पार्टी के साथ राजस्थान पर भी उनका ही कब्जा बरकरार रहे। इसीलिए राजस्थान के उनके समर्थक 90 विधायकों ने इस्तीफें का नाटक किया और पार्टी में भीषण कलह पैदा किया। यद्यपि अभी अशोक जी कांग्रेस अध्यक्ष बने नहीं है किंतु उनका अचार-व्यवहार राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसा ही हो गया है।

देश की सबसे वयोवृद्ध पॉलिटिकल पार्टी कांग्रेस की दुर्गति एवं उसके ‘‘वेंटिलेटर’’ पर जाने का यही मुख्य कारण है, आज कांग्रेस के मौजूदा नेताओं को पार्टी की नहीं, बल्कि अपने स्वयं के वजूद की चिंता है, वे पार्टी के सिर पर सवार होकर उसे अपनी ‘‘जूती’’ से भी बदतर मानते है और जहां तक इस पार्टी के नेतृत्व का सवाल है वह तो गैर अनुभवी व लापरवाह है, उसे तो पार्टी वसीयत में मिली है, जिसे वह संभाल कर रखने में अक्षम सिद्ध हो रहा है। ….और इसी कारण गोवा, कर्नाटक आदि राज्यों में न सिर्फ कांग्रेस सत्ताहीन हुई बल्कि उसे अपना मौजूदा वजूद भी खोजना पड़ रहा है।

….और कांग्रेस की इस मौजूदा स्थिति का पूरा राजनीतिक लाभ भाजपा उठा रही है…. यदि यह कहा जाए कि भाजपा के सत्ता में बने रहने का एक मात्र कारण कांग्रेस है तो कतई गलत नहीं होगा, क्योंकि कांग्रेस ने आजादी के बाद के पांचा दशकों तक देश की सरकार तो चला ली, किंतु अब उसके मौजूदा नेतृत्व में इतना अनुभवी पुरातन वैभव लौटा सके, शायद पार्टी में इसी माहौल के चलते पार्टी के गुलाम नबी आजाद तथा कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं को अपमान महसूस हुआ और उन्होंने पार्टी से एक झटके में अपना बरसों पुराना नाता तोड़ लिया, अब कांग्रेस को ये ही ‘विभीषण’ त्रेतायुग की भूमिका में आकर पार्टी का खात्मा करने वाले है।

….और अब चूंकि देश के राजनीतिक पटल पर कांग्रेस के अलावा कोई भी अन्य राष्ट्रीय राजनीतिक दर्जा प्राप्त दल नहीं है, इसलिए कांग्रेस की इसी दुरावस्था का राजनीतिक लाभ भाजपा और भाई नरेन्द्र मोदी लम्बे समय तक उठाने को आतुर है। देश के अन्य सभी राजनीतिक दल राज्य या क्षेत्रिय स्तर के दल है, जिनका राष्ट्रीय स्तर पर कोई अस्तित्व नहीं है। अब देश में ‘‘चुनावी पर्व’’ शुरू होने वाला है, इसी वर्ष के अंत से लेकर 2024 के लोकसभा चुनावों तक डेढ दर्जन राज्यों में विधानसभाओं और अप्रैल-मई 2024 में लोकसभा के चुनाव होगें, भाजपा ने इसकी हर स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी है, जब कि कांग्रेस आपसी संघर्ष और देश को जोड़ने में लगी है, देश की चिंता करने वाली कांग्रेस को अपनी चिंता कतई नहीं है…. यही स्थिति मोदी जी की सत्ता को ‘दीर्घजीवी’ बनाने के लिए काफी है और विपक्षी एकता के दावों का कोई मतलब नहीं।

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