राज्यसभा तो महज पड़ाव.. मंजिल-ए-मकसूद कुछ और…!

दिग्विजय सिंह ने कोरोना काल में समाज सेवा के अपने दायित्व को निभाते हुए उपलब्धियों का ब्यौरा सामने रखा ..तो लगे हाथ समझा दिया कि सियासत कैसे की जाती। एक ओर राज्यसभा सांसद की अपनी जीत से बेफिक्र राजा ने लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद भोपाल संसदीय क्षेत्र पर फोकस बनाने और उसे आगे भी जारी रखने के संकेत दे दिए.. प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन्होंने महामारी के दौरान हेल्पलाइन गरीब की मदद मजदूरों और किसानों को राहत और छात्रों चाहे फिर वह दूसरे राज्यों और विदेश में ही क्यों ना फंस गए उनकी घर वापसी को लेकर किए गए अपने प्रयासों को सामने रखा।

तो बताया कि मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री को समय-समय पर पत्र लिखें।  लेकिन विदेश मंत्री के अलावा किसी का भी जवाब नहीं मिला.. लॉक डाउन पर मोदी सरकार के फैसले पर सवाल खड़ा करते हुए दिग्विजय ने मनरेगा के महत्व को बताते हुए सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की दूरदर्शिता को भी सामने रखा। यानी अपनी ओर से कोरोना काल में एक राजनेता का समाज के प्रति दायित्व निभाते हुए अपनी जवाबदेही और सक्रियता साबित की।

इसकी तुलना कांग्रेस के दूसरे नेताओं से की जा सकती है.. इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री ने सियासत से जुड़े सवालों के जवाब देखकर संदेश दे दिया कि उनकी पैनी नजर मध्य प्रदेश की राजनीति पर बनी हुई है… भोपाल उनका कार्यक्षेत्र चुनाव हारने के बावजूद बना रहेगा तो राजनीति पूरे प्रदेश में जमकर की जाएगी.. इसके लिए उन्होंने सवाल के जवाब में ही सही यह याद दिला दिया कि सिंधिया के दबदबे वाले क्षेत्र को छोड़कर जहां उन्हें समन्वयक की भूमिका में पिछले चुनाव में नहीं जाने दिया …उन्होंने पूरे प्रदेश में कांग्रेस को जिताने का प्रयास किया था .. अब उपचुनाव में पार्टी जो जिम्मेदारी सौंपेगी उसे वह एक कार्यकर्ता के नाते जरुर निभाएंगे.. संदेश साफ है सिंधिया के जाने के बाद मध्यप्रदेश में उनके लिए मैदान साफ है।

पार्टी को उनकी जरूरत होगी तो वह फ्रंट फुट पर नजर आएंगे … नहीं तो उनकी अपनी स्टाइल पॉलिटिक्स जारी रहेगी.. यदि कोई दूसरा दायित्व सौंपा जाता तो भी वह लोकतंत्र बचाओ नारे को बुलंद कर कांग्रेस से दगा करने वाले उन नेताओं को हराने के लिए काम करेंगे ..जिन्होंने सिंधिया के समर्थन में बगावत की उन्हें किसी भी हाल में सदन में लौटने नहीं दिया जाएगा.. दिग्विजय ने स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की जमकर तारीफ की तो ज्योतिरादित्य से अपने व्यक्तिगत रिश्तो की याद दिलाते हुए कांग्रेस से बगावत के लिए जमकर कोसा ….प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान व्यक्तिगत तौर पर यदि सोनिया गांधी के नेतृत्व की सराहना की तो राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को भी यह संदेश दे दिया कि उन्होंने जिस सिंधिया पर भरोसा किया था।

वह उन्हें छोड़कर चला गया.. ऐसे में आप दिग्विजय पर ज्यादा भरोसा कर सकते हैं.. पार्टी नेतृत्व ने उन्हें राज्यसभा का टिकट देकर जो भरोसा जताया उस पर वह खरा उतर कर दिखाएंगे.. पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को दिग्विजय सिंह ने अपना बड़ा भाई और भरोसेमंद दोस्त बताकर यह संदेश दे दिया कि पिछले दिनों कमलनाथ और दिग्विजय के बीच रिश्तो मे दरार आने की जो खबरें सामने आई वह बकवास से ज्यादा कुछ नहीं… इसके लिए राजा ने याद दिलाया कि खुद कमलनाथ इस विवाद पर स्पष्टीकरण दे चुके हैं ..यानी यह दोस्ताना मध्य प्रदेश की राजनीति में आगे भी बना रहेगा। तो क्या अपने दोस्त को बड़े भाई कमलनाथ से उनकी कोई और उम्मीद और सहयोग बाकी है.. क्योंकि सिंधिया के दावे के मुकाबले कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने में राजा पहले ही खुलकर उनकी तरफदारी कर चुके। कभी किंग मेकर की भूमिका में कमलनाथ ने दिग्विजय सिंह को मुख्यमंत्री बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी।

देखना दिलचस्प होगा आने वाले समय में जब पीढ़ी परिवर्तन की मांग कर जोर पड़ेगी तब यह दोस्ताना कांग्रेस के अंदर क्या गुल खिलाता है.. एक सवाल के जवाब में राजा ने याद दिलाया कि उन्होंने सिंधिया से कहा था कि आने वाला समय आपका है ..हमारी और कमलनाथ की उम्र हो चुकी लेकिन उन्होंने धैर्य खो दिया.. ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है राज्यसभा के 6 साल पक्के होने के बाद दिग्विजय सिंह प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में ज्यादा प्रासंगिक बने रहेंगे या कमलनाथ.. वह भी यदि उपचुनाव के जरिए कांग्रेस की सत्ता में वापसी नहीं होती तब कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जोड़ी क्या नई पीढ़ी के लिए रास्ता छोड़ देगी या फिर स्थितियां कुछ और बन सकती.. यह सवाल इसलिए क्योंकि ज्योतिरादित्य भले ही कांग्रेस से बाहर चले गए बावजूद इसके कांग्रेस के नई पीढ़ी के दूसरे नेताओं के बीच में अभी तक कोई नेता स्वीकार्यता के साथ स्थापित नहीं हो पाया।

नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष के लिए दोस्ताना की बात करने वाले नाथ और राजा समर्थकों की लाइन लंबी लगी है.. फूल सिंह बरैया के मुकाबले राज्यसभा में दिग्विजय सिंह की दावेदारी से जुड़े सवाल पर फैसला उन्होंने भले ही पार्टी नेतृत्व पर छोड़ दिया.. लेकिन इशारों इशारों में यह कह कर अपनी जीत पक्की बता दी कि कांग्रेस में रहते हुए भी ज्योतिरादित्य और दिग्विजय दोनों का उस वक्त भी राज्यसभा में जाना सुनिश्चित था …संदेश साफ सिंधिया कांग्रेस में रहते दूसरे उम्मीदवार थे इसलिए नाराज होकर वह भाजपा में जा चुके.. तो इसलिए अभी भी कांग्रेस में पहली पसंद बनकर मैदान में मौजूद है। फूल सिंह की जीत और उनके लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाने के सवाल को टाल गए.. बिना नाम लिए पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को अपना खुला समर्थन दिया। प्रेमचंद गुड्डू बालेंद्र शुक्ला की कांग्रेस में वापसी लेकिन चौधरी राकेश सिंह के लिए दरवाजे बंद की बात बुलंद करने वाले अजय सिंह का समर्थन कर राजा उनके साथ खड़े नजर आए …ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी क्या आने वाले समय में दिग्विजय सिंह जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के बदलाव की बात नए सिरे से जोर पकड़ेगी.. सवाल क्या तब दिग्विजय सिंह का इसी तरह खुला समर्थन अजय सिंह को मिलेगा।

या फिर उन्होंने दूसरे दावेदारों चाहे फिर वह सुरेश पचोरी, अरुण यादव ही क्यों ना हो सिर्फ उन्हें ही नहीं बल्कि कमलनाथ कोटे से अध्यक्ष की कुर्सी पर अपनी नजर लगाए बैठे सज्जन सिंह वर्मा और एनपी प्रजापति को भी संदेश दे दिया है कि अजय सिंह के साथ न्याय होना चाहिए… तो क्या राजा की नजर में कांग्रेस पार्टी के अनुसूचित जाति के बड़े चेहरे एमपी और सज्जन को राजा अभी भी पचौरी का समर्थक ही मानते हैं ..फिर भी शायद राजा ने अपनी ओर से अजय सिंह को भी भविष्य की राजनीति को लेकर अपना समर्थन और संदेश दोनों दे दिए.. जिन्हें शायद कांग्रेस द्वारा राज्यसभा में पहुंचाने का भरोसा दिलाया गया था। तो सवाल यहीं पर खड़ा होता है.. यदि उपचुनाव के बाद कांग्रे समें जब बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। तब क्या दूसरे क्षत्रिय नेता गोविंद सिंह जिन्हें नेता प्रतिपक्ष का बड़ा दावेदार माना जाता तो वह राजा की पसंद की तौर पर कैसे संभव होगा।

हालांकि कि राजा ने खुद मध्यप्रदेश में मध्यावधि चुनाव और दूसरे कुछ सवालों को यह कहकर नकार दिया कि हाइपोथेटिकल सवाल का जवाब फिलहाल संभव नहीं.. इसमें भी दो राय नहीं कि दिग्विजय सिंह ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए नए सिरे से प्रदेश की राजनीति में अपनी पोजीशन ले ली है.. कमलनाथ सरकार भले ही चलेगी लेकिन उसे बनाने में बड़ी भूमिका निभाने का श्रेय दिग्विजय को भी मिला .. जिन्हें लगातार दूसरी बार राज्यसभा में भेजने का फैसला कमलनाथ और राष्ट्रीय नेतृत्व ने उस वक्त ही ले लिया था जब ज्योतिरादित्य कांग्रेस में थे.. दिग्विजय को अच्छी तरह मालूम है कि राज्यसभा में उनका पहुंचना तय है.. तो बीजेपी की ओर से ज्योतिरादित्य भी राज्यसभा पहुंचेंगे ..फिलहाल मध्य प्रदेश से राज्यसभा में राजमणि पटेल और विवेक तंखा कांग्रेस के सांसद हैं… लोकसभा में मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा सीट से कमलनाथ के पुत्र नकुल नाथ कांग्रेस के इकलौते सांसद हैं।

सवाल मनमोहन सरकार के रहते जब पिछली बार राज्यसभा में दिग्विजय सिंह भेजे गए थे उसी कार्यकाल में जब केंद्र में मोदी की सरकार बन चुकी तब उन्होंने मध्यप्रदेश में नर्मदा यात्रा कर चुनाव में अपनी सक्रियता सुनिश्चित कराई.. इस बार राज्यसभा की दूसरी पारी में क्या राजा कोई नई स्क्रिप्ट आगे बढ़ा रहे हैं.. जिसमें उनकी नजर सरकार से ज्यादा प्रदेश संगठन पर टिक गई है.. वह भी तब जब कमलनाथ सरकार को जाना पड़ा.. बदलते राजनीतिक परिदृश्य में उपचुनाव के जरिए यदि कांग्रेस सरकार में लौटी तो निश्चित तौर पर मुख्यमंत्री की शपथ कमलनाथ की लेंगे। यदि स्थिति विपरीत बनती है तो फिर कांग्रेस में बड़े बदलाव से इनकार नहीं किया जा सकता… चाहे फिर उस वक्त नए कांग्रेस अध्यक्ष की दरकार हो या फिर सदन में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका नेतृत्व को सोच समझकर तय करना होगी।

दिग्विजय सिंह भले ही अपनी थाह नहीं लेने दे सियासत में संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता.. कमलनाथ जब भी नेता प्रतिपक्ष के दावे से दूरी बनाएंगे या कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ेंगे तो वह निश्चित तौर पर अपने भरोसेमंद समर्थक को ही इन दोनों जिम्मेदारी को निभाते हुए देखना चाहेंगे.. यदि कमलनाथ विधायक रहते नेता प्रतिपक्ष बने रहना चाहेंगे.. तो पार्टी नेतृत्व को भी इस पर कोई एतराज नहीं होगा.. लेकिन प्रदेश अध्यक्ष के पद पर सरकार में रहते जो विवाद कभी ज्योतिरादित्य- कमलनाथ के बीच बना रहा.. उसका समाधान कांग्रेस हाईकमान जरुर निकालना चाहेगा.. ऐसे में विपक्ष की राजनीति में अगले साढ़े 3 साल के लिए जब 24 सीट के उपचुनाव के बाद मध्यावधि चुनाव की अटकलों पर विराम लग जाएगा।

तब नए कांग्रेस अध्यक्ष के लिए एक जुझारू पार्टी के प्रति समर्पित अनुभवी नेता की तलाश रहेगी …इन नई विपरीत परिस्थितियों में सवाल फिर खड़ा होगा क्या राज्यसभा सांसद के तौर पर दिग्विजय सिंह दूसरे नेतृत्व पर भारी नजर आएंगे.. सवाल क्या उस वक्त तक कांग्रेस की नई पीढ़ी से नेतृत्व का मोह भंग हो सकता है… या फिर स्वीकार्यता के अभाव में नेतृत्व के संकट को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस को किसी अनुभवी नेता की उसी तरह तलाश रहेगी… जैसी विधानसभा चुनाव के बाद सरकार चलाने के लिए रही… जब अनुभवी और प्रबंधन क्षमता के धनी कमलनाथ को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई गई थी… तो सवाल क्या दिग्विजय सिंह ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए भाजपा उसके नेताओं से दो-दो हाथ करने के लिए जो रोड मेप बना रखा है।

क्या उसमें कांग्रेस के नई पीढ़ी के नेताओं के लिए भी संदेश छुपा है.. वह बात और है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी भूमिका खासतौर से संगठन से जुड़े सवाल को वह टाल गए ..क्या राज्यसभा सांसद की एक और पारी उसका पहला पड़ाव फिलहाल अंतिम नहीं .. क्योंकि चुनावी राजनीति चाहे फिर वह भोपाल से अगला चुनाव लड़ने का सवाल ही क्यों ना हो स्पष्ट तौर पर उन्होंने अभी तक मना नहीं किया कि वह भविष्य में अब कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे.. तो सवाल दूसरा पड़ाव उपचुनाव के परिणामों के बाद जब सामने आएगा ..तब राजा अपने कदम आगे बढ़ाते हुए नजर आएंगे .. राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व के संकट से जूझ रही कांग्रेस की नुमाइंदगी यदि सोनिया गांधी को एकजुटता बनाए रखने के लिए सौंपी जा सकती है.. तो फिर मध्यप्रदेश में विपक्ष की राजनीति करते कांग्रेस के कायाकल्प का ठेका दिग्विजय सिंह को क्यों नहीं सौंपा जा सकता ..तो सवाल उस वक्त अजय सिंह, सुरेश पचोरी, अरुण यादव जैसे छत्रपों के बीच मतभेद और नई पीढ़ी के नेताओं में जारी रस्साकशी का फायदा उठाते हुए समर्थकों के जरिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के लिए अपनी दावेदारी को सामने लाएंगे।

क्योंकि प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने याद दिलाया कि कभी उनके नेतृत्व में चुनाव हारने की जिम्मेदारी निभाते हुए सरकार जाने के बाद पार्टी नेतृत्व ने उन्हें मध्य प्रदेश से दूर रहने की सलाह दी थी.. उसका उस वक्त उन्होंने अनुसरण किया था… लेकिन अब उन्होंने यह साफ कर दिया कि लोकसभा का चुनाव भोपाल से हारने के बाद भी वह यहां पर आगे भी डेरा डाले रखेंगे… यानी राज्यसभा सांसद की दूसरी पारी के बाद वह यदि कांग्रेस विपक्ष में बनी रहती तो संगठन के कायाकल्प के लिए वह तत्पर और तैयार रहेंगे… पिछले चुनाव में समन्वयक के साथ प्रचार की जिम्मेदारी निभाने की याद खुद उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिलाई। यानी वह खुद को पर्दे के पीछे की राजनीति तक अब सीमित नहीं रखना चाहते.. तो सवाल के जरिए उन पुरानी यादों को भी सामने ला दिया गया जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दिग्विजय ने पूरे प्रदेश का दौरा कर कांग्रेस को खड़ा किया था..मध्य प्रदेश कांग्रेस में उपचुनाव को ध्यान में रखते हुए पार्टी की इंटरनल पॉलिटिक्स भले ही कमलनाथ के इर्द-गिर्द घूम रही हो ..लेकिन दूसरे सबसे बड़ा नेता दिग्विजय सिंह को ही माना जाएगा।

चाहे फिर इसकी वजह कांग्रेस संगठन का कमजोर होना या फिर डेढ़ साल सरकार में रहते नए नेतृत्व में स्वीकारोक्ति का पार्टी के अंदर अभाव.. विपक्ष में लौटने के बाद कॉन्ग्रेस फिलहाल भले ही कमलनाथ के पीछे खड़ी उसकी वजह यदि सत्ता वापसी की आस… तो किसी भी नेता का उसके अपने विधानसभा और आसपास के क्षेत्र से बाहर कोई डिमांड नहीं पाना ही मना जाएगा… ऐसे नेता की कमी जिसका पूरे राज्य में जनाधार हो कांग्रेस में साफ महसूस की जा सकती है …पूर्व मुख्यमंत्री रहते कमलनाथ का चेहरा पार्टी की आवश्यकता और जरूरत बना हुआ… तो दूसरा चेहरा दिग्विजय सिंह पार्टी के अंदर जिनके समर्थक विधायक कमलनाथ पर भी भारी ..जिनके समर्थक कार्यकर्ता पूरे प्रदेश में आज भी मौजूद है ..खासतौर से ज्योतिरादित्य के कांग्रेस से बाहर चले जाने के बाद । अब तो राजा ने महाराजा के गढ़ में भी उनके विरोधियों को अपनी शरण में आने को मजबूर कर दिया.. सरकार चले जाने के बाद कमलनाथ भले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए अपनी मौजूदगी प्रदेश की राजनीति में दर्ज करा चुके हो।

जो मैदानी राजनीत से ज्यादा फैसलों के लिए टेबल वर्क पर यकीन करते हैं.. लेकिन विपक्ष की इस नई राजनीति में कांग्रेस का कोई दूसरा नेता सरकार जाने के बाद कोरोना काल मे भी अपनी छाप नहीं छोड़ पाया.. ऐसे में दिग्विजय सिंह ने न सिर्फ चुप्पी तोड़ी.. बल्कि एक साथ कई सियासी संदेश देखकर एहसास करा दिया कि उम्र भले ही उनकी ढल गई हो… और लोग उनकी भूमिका पर सवाल खड़े कर रहे हो …लेकिन समझने वाले नीति निर्धारकों को यह समझ लेना चाहिए राजा का जुनून जज्बा अभी बरकरार है… बस इंतजार कीजिए राज्यसभा की शपथ लेने की और उसके बाद मिनी विधानसभा चुनाव माने जाने वाले 24 सीट पर चुनाव परिणाम की.. दिग्विजय सिंह जिस पटकथा को लिख रहे हैं वह सामने जरूर आएगी.. जब नेता प्रतिपक्ष से ज्यादा कांग्रेस के नए अध्यक्ष की मांग जोर पकड़ेगी.. राज्यसभा चुनाव महज एक पड़ाव है.. उपचुनाव के बाद राजा की मंजिले मकसूद कुछ और की नजर आएगी.. जब कांग्रेस और प्रदेश में एक नई बहस छिड़ेगी कि कांग्रेस का कायाकल्प कौन कर सकता है.. सबसे बड़ा नाम दिग्विजय सिंह का ही तब सामने आएगा.. लेकिन वह राज्यसभा में पहुंच चुके होंगे इसलिए पीसीसी अध्यक्ष का पद सवालों के घेरे में रहेगा।

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