श्रीराम है राजधर्म के पर्याय

रामजन्मभूमि भूमिपूजन-3: श्री राम भारतीय सनातन संस्कृति की आत्मा है और उनका जीवन इस भूखंड में बसे लोगों के लिए आदर्श। राम मर्यादापुरुषोत्तम है। अर्थात्- उन्होंने मर्यादा की परिधि में रहते है। निजी या पारिवारिक सुख-दुख उनके लिए कर्तव्य के बाद है। जब श्रीराम अयोध्या नरेश बने, तब उनके लिए बाकी सभी संबंध गौण हो गए। एक धोबी के कहने पर वह अपनी प्रिय सीता का त्याग कर देते है। आज के संवाद शैली में धोबी दलित है। परंतु राम के लिए, प्रजा रूप में, उसके शब्द मानो ब्रह्म वाक्य हों। अवश्य ही यह उनके अपने लिए, सीता और उनकी होने वाली संतानों पर घोर अन्याय है। परंतु राजधर्म अपनी कीमत मांगता है।

श्रीराम ने सीता की अग्निपरीक्षा क्यों ली?- क्योंकि एक शासक के रूप में वह अपने आपको और परिवार को जनता के रूप उत्तरदायी मानते है। महर्षि वाल्मिकी प्रणीत रामाणय में श्रीराम कहते हैं, प्रत्ययार्थं तु लोकानां त्रयाणां सत्यसंश्रय:। उपेक्षे चापि वैदेहीं प्रविशन्तीं हुताशनम्।। अर्थात्- तथापि तीनों लोकों के प्राणियों के मन में विश्वास दिलाने के लिए एकमात्र सत्य का सहारा लेकर मैंने अग्नि में प्रवेश करती विदेह कुमारी सीता को रोकने की चेष्ट नहीं की।

युद्ध में विजयी होने के पश्चात श्रीराम का कौन सा रूप सामने आया है? व्यक्ति का असली परिचय उसकी घोर पराजय या विजय में होता है। न तो राम ने बालिवध के बाद किष्किन्धा पर कब्जा किया और ना ही लंका पर। किष्किन्धा में सुग्रीव को राम राजा घोषित करते है। रावण वध के पश्चात वे लक्ष्मण को आज्ञा देते है कि वह लंका जाए और विधिवत रूप से विभीषण का राज्याभिषेक करें। श्रीराम द्वारा किया गया युद्ध लालच और राज्यलिप्सा से प्रेरित नहीं, अपितु धर्म की रक्षा हेतु है। इसलिए वह किष्किन्धा या लंका को अपना औपनिवेश नहीं बनाते।

मर्यादा और मानवता अक्सर युद्ध की विभिषका में कुचली जाती है। इस संबंध में वर्ष 1899 और 1907 के हेग कंवेन्शन में विभिन्न देशों ने युद्ध-नियमावली और युद्ध-अपराध के संदर्भ में बहुपक्षीय संधि हस्ताक्षर किया था। अर्थात्- शेष विश्व ने युद्ध के समय मानवीय मूल्यों और मर्यादा की रक्षा लगभग 150 वर्ष पहले की थी। किंतु सनातन भारत में यह जीवनमूल्य श्रीराम के जीवनकाल काल से भी पहले चले आ रहे है।

यह बात अलग है कि हेग कन्वेंशन के बाद भी प्रथम-द्वितीय विश्वयुद्ध, हिटलर द्वारा यहूदियों के उत्पीड़न, स्टालिन-लेनिन द्वारा वैचारिक विरोधियों (कैदियों) के दमन और चीन-जापान के बीच हुए युद्धों आदि में मानवता और मर्यादा की सीमा लांघी गई। मनुष्य का मनुष्य के प्रति वहशीपन पूरी वीभत्सता के साथ सामने आया। भारत ने भी इसका दंश झेला है। इस्लामी आक्रांताओं ने पिछले 800 वर्षों में जब-जब यहां के हिंदू शासकों पर विजय प्राप्त की, तब उन्होंने न केवल पराजितों का नरसंहार किया, साथ ही पराजित महिलाओं की अस्मिता रौंद दी, उनका बलात्कार किया, स्थानीय हिंदुओं को इस्लाम अपनाने या मौत चुनने के लिए बाध्य किया और उनके पूजा-स्थलों व मानबिंदुओं को ध्वस्त कर दिया गया।

इसके विपरीत, श्रीराम का आचरण कैसा है? जब राम लंका पर विजय प्राप्त करते है, तब वह विभीषण से रावण के शव का विधिवत संस्कार करने के लिए कहते है। भगवान वाल्मिकीजी के अनुसार, विभीषण अपने भाई के किए पर लज्जित है। वह अपने मृतक भाई के साथ कोई भी संबंध नहीं रखना चाहते। वह रावण के अंतिम संस्कार करने में संकोच करता है। तब श्रीराम कहते है, ‘मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं न: प्रयोजनम्ा्। क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव।।’ अर्थात्ा्- विभीषण! बैर जीवन कालतक ही रहता है। मरने के बाद उस बैर का अंत हो जाता है। अब हमारा प्रयोजन सिद्ध हो चुका है, अत: अब तुम इसका संस्कार करो। इस समय यह जैसे तुम्हारे स्नेह का पात्र है, उसी तरह मेरा भी स्नेह भाजन है। यही नहीं, युद्ध पश्चात पराजित रावण के परिवार और उसके सैनिकों की महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का दुर्व्यवहार नहीं हुआ। श्रीराम, विभीषण से उन सभी महिलाओं को सांत्वना देने और अपने निवासस्थान लौटने का अनुरोध करते है।

यह सही है कालांतर में युद्ध नियमों के पालन में ह्रास होता चला गया। महाभारत का दौर इसका ज्वलंत उदाहरण है, जहां लाक्षाग्रह, धूर्त-क्रीड़ा, द्रौपदी चीरहरण, कौरव-पांडव द्वारा युद्ध के दौरान छल-कपट (अभिमन्यु, द्रौणाचार्य और दुर्योधन की हत्या) से श्रीराम द्वारा स्थापित जीवनमूल्यों का क्षीण होना प्रारंभ हुआ। शायद वर्तमान समाज में जीवन-मूल्यों में गिरावट का यह बड़ा कारण है।

भारत में श्रीराम के जीवनदर्शन और परंपराओं का वास्तविक जीवन में अनुरकण करने का प्रयास भी हुआ है। वीर छत्रपति शिवाजी और अदम्य साहसी महाराणा प्रताप इसके उदाहरण है। जब-जब इन वीरपुरुषों ने मुगलों को युद्धों में पराजित किया, तब-तब विजितों (महिलाओं सहित) का मर्यादापूर्ण सम्मान किया। मुस्लिम स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार की संभावना को रोकने के लिए सिख गुरु श्रीगोविंद सिंहजी द्वारा एक सच्चे सिख का उनसे यौन-संबंध बनाना वर्जित किया। स्पष्ट है कि श्रीराम का पराजितों से व्यवहार केवल रामायण के पन्नों तक सीमित नहीं है।

लगभग 500 वर्ष पहले जहां अयोध्या स्थित राम मंदिर को जिहादी मानसिकता द्वारा ध्वस्त किया गया था, तो अब उसी विषाक्त दर्शन के मानसपुत्र श्रीराम की छवि, उनके जीवनदर्शन और चरित्र को धूमिल करने का कुप्रयास कर रहे है। यह जमात श्रीराम को पिछड़ा, आदिवासी, दलित और स्त्री विरोधी कहकर संबोधित करती आ रही है। इसके लिए वे श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदासजी कृत रामायण की चौपाई:- ‘ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।’का कपटपूर्ण विवेचना करते हैं।

रामकथा को तुलसीदासजी ने अपने शब्दों में पिरोया है। इसमें विभिन्न पात्रों द्वारा बोले गए संवाद भी है। दुराचारी रावण अक्सर श्रीराम, सीता और हनुमान के लिए अपशब्दों का प्रयोग करता है। क्या इन्हें गोस्वामीजी के शब्द कहना तार्किक होगा? परंतु मार्क्स-मैकॉले और जिहादी मानसपुत्रों ने उपरोक्त चौपाई को अपने एजेंडे अनुरूप व्याख्या की है। यह शब्द ना ही राम के है और ना रामायण के ऐसे चरित्र के, जिसे हिंदू पूजनीय मानते हो। राम लंका जाने के लिए समुद्र से मार्ग मांग रहे है। परंतु वह हठी है। राम की प्रार्थना को अनसुना कर देता है, तब राम को क्रोध आता है और वे कहते हैं, ‘बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति॥’ अर्थात्ा्- तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्रीरामजी क्रोध सहित बोले- बिना भय के प्रीति नहीं होती। इसके उत्तर में, जो डरा हुआ सागर कहता है, ‘प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥ ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥’ अर्थात्ा्- प्रभु ने अच्छा किया, जो मुझे शिक्षा (दंड) दी, किंतु मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी ही बनाई हुई है। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री- ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं।

अपने सबसे कष्टमयी काल में श्रीराम ने सहयोगी और सलाहकार केवट, निषाद, कोल, भील, किरात, वनवासी और भालू को बनाया। यदि श्रीराम चाहते तो, उस संकट में उन्हे अयोध्या या जनकपुर से एकाएक सहायता उपलब्ध हो जाती। परंतु श्रीराम के साथी वे लोग बने, जिन्हे आज के विमर्श में वनवासी, आदिवासी, पिछड़ा या अति-पिछड़ा कहा जाता है। इन सभी को श्रीराम जहां ‘सखा’ कहकर संबोधित करते है, वही वनवासी हनुमान उनके लिए लक्ष्मण से भी अधिक प्रिय है- ‘सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना॥ अर्थात्ा्- हे कपि! सुनो, मन में ग्लानि मत रखना। तुम मुझे लक्ष्मण से भी दूने प्रिय हो। जब भरत राम प्रार्थना करते हुए अयोध्या वापस ले जाने का उपक्रम करते है, तो राम के ‘सखा’ केवट को देखकर राजा भरत रथ से उतर जाते है। राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उचरि उमगत अनुरागा॥ अर्थात्ा्- यह श्रीराम के मित्र है, इतना सुनते ही भरतजी ने रथ त्याग दिया। वे रथ से उतरकर प्रेम में उमंगते हुए उनके पास चले गए। भील समुदाय की शबरी, जिसका पिछड़ापन दोहरा है, उसके झूठे बेर प्रेम से ग्रहण करते है। शबरी राजा राम को देखकर सकते में है और वह कहती हैं, ‘अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।। कह रघुपति सुनू भामिनी बाता। मानाउँ एक भागति कर नाता।।’ अर्थात्ा्- जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियां उनमें भी अत्यंत अधम हैं, और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मंदबुद्धि हूं। इसपर श्रीरघुनाथजी ने कहा- हे भामिनि! मेरी बात सुन! मैं तो केवल एक भक्ति ही का संबंध मानता हूं। ‘जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धनबल परिजन गुन चतुराई।। भगति हीन नर सोइह कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।’अर्थात्ा््- जाति, पांति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता- इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल (शोभाहीन) दिखाई पड़ता है।

श्रीराम के स्नेह की कोई सीमा नहीं। सीता की रक्षा में अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले गिद्धराज जटायु को श्रीराम उसके कर्मों से देखते है और पिता का दर्जा देकर उनका अंतिम-संस्कार करते है। श्रीमद्वाल्मिकीय रामायाण के रचिता मुनि वाल्मिकी- जिनके परिचय में अक्सर व्याध, ब्राह्मण और शूद्र का उपयोग होता है- उन्हे किसी जाति विशेष की परिधि में बांधना उचित नहीं। वे श्रीराम की महिमा गाते-गाते स्वयं भगवान हो गए है।

स्त्री के प्रति श्रीराम का आचरण आदर्श है। उन्होंने बालि और रावण से युद्ध केवल स्त्री के सम्मान और शालीनता की रक्षा हेतु लड़ा। बाणों से घायल बालि जब राम से पूछता है- मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा॥ तब राम उत्तर देते हैं- अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥ इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥ अर्थात्- छोटे भाई की पत्नी, बहन, पुत्रवधु और बेटी- ये चारों एक समान हैं। इन्हें जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने से कोई पाप नहीं होता॥

राम का जीवन-चरित्र जन्म, जाति और भौतिकता से ऊपर है। पुलस्त्य कुल में उत्पन्न महाज्ञानी ब्राह्मण- रावण का राम वध करते है, क्योंकि वह अपने आचरण से भ्रष्ट है। शबरी, हनुमान और गिद्धराज जटायु उनके स्नेह के पात्र है। श्रीराम कर्म और भाव को महत्व देते है। आचरण धर्म से मर्यादित है। इन्हीं जीवन-मूल्यों के आधार पर वह रामराज्य की स्थापना करते है, और वह कल्पना आज के समय में गांधीजी का सपना बन जाता है। राम समसृष्टि है और समरस समाज के पालक है।

One thought on “श्रीराम है राजधर्म के पर्याय

  1. भीष्म ने युधिष्ठिर को दिया था राजधर्म का ज्ञान उसकी भी चर्चा करनी चाहिए

    भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को राजा के लिए अपने आचरण में अपनाने हेतु कुछ गुणों को अनिवार्य माना है। ये गुण निम्नवत हैं :-
    — भीष्म युधिष्ठिर को राजधर्म का पाठ पढ़ाते हुए कहते हैं कि राजा स्वधर्मों का (राजकीय कार्यों के संपादन हेतु नियत कर्तव्यों और दायित्वों का न्यायपूर्वक निर्वाह) आचरण करे, परंतु जीवन में कटुता न आने दें।
    — राजा को एक ऐसी अखंड सत्ता में अपना विश्वास बनाए रखना चाहिए जो इस संसार की उत्पत्ति का कारण है । उसे अपने विचारों से भगवान के प्रति आस्थावान होना चाहिए । जिससे उसके अंदर अहंकार का भाव उत्पन्न नहीं होगा और वह ईश्वर की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने का कार्य ईमानदारी से कर सकेगा । राजा को आस्तिक होना चाहिए। आस्तिक रहते हुए दूसरे के साथ प्रेम का व्यवहार न छोड़ें ।
    — राजा को विनम्र और उदार भाव के साथ अपने राज कार्यों का संचालन करना चाहिए । राज कार्यों के कुशल संचालन के लिए राजा को चाहिए कि क्रूरता का व्यवहार न करते हुए प्रजा से अर्थ संग्रह करे।
    — राजा के लिए यह अपेक्षित है कि वह कर संग्रह के लिए निर्धारित मर्यादाओं का उल्लंघन न करते हुए प्रजा से कर संग्रह करे ।
    — अपनी जनता के साथ संवाद करते समय राजा को चाहिए कि वह दीनता न दिखाते हुए ही प्रिय भाषण करे।
    — देश की जनता में शूरवीरता का संचार किए रखने के लिए राजा स्वयं शूरवीर बने , परंतु बढ़ – चढ़कर बातें न करे। इसका अर्थ है कि राजा को मितभाषी और शूरवीर होना चाहिए।
    — राजा को दानशील होना चाहिए । जिससे समाज में विज्ञान ,कला , साहित्य , न्याय और शिक्षा के कार्य में लगे लोगों को उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समय-समय पर राजा का अनुग्रह प्राप्त होता रहे और वे दान आदि लेकर अपनी कला का विकास करते रहें या जनसेवा के अपने महान कार्य का संपादन सुचारू रूप से करते रहें। इसके लिए आवश्यक है कि राजा दानशील हो, परंतु यह ध्यान रखे कि दान अपात्रों को न मिले।
    — राजा का साहस जनता में किसी भी राष्ट्रद्रोही के विरुद्ध उसे अंकुश लगाने के लिए प्रेरित करता रहता है। इसीलिए भीष्म युधिष्ठिर को बताते हैं कि राजा साहसी हो, परंतु उसका साहस निष्ठुर न होने पाए।
    — राजा के लिए यह भी एक मर्यादा स्थापित की गई है कि वह दुष्ट लोगों के साथ कभी मेल-मिलाप न करे, अर्थात राष्ट्रद्रोही व समाजद्रोही लोगों को कभी संरक्षण न दे।
    — महाभारत का युद्ध दुर्योधन के इस कुविचार के कारण हुआ कि वह निज बन्धु – बांधवों से ही लड़ाई झगड़ा करने लगा । जिससे कुल नाश तो हुआ ही साथ ही साथ राष्ट्र को भी उससे भारी हानि उठानी पड़ी । इसी विचार को दृष्टि में रखते हुए पितामह भीष्म के द्वारा राजा के लिए यह भी अनिवार्य किया गया कि वह बन्धु – बांधवों के साथ कभी लड़ाई झगड़ा न करे।
    — वर्त्तमान में नौकरी के लिए निर्धारित एक प्रक्रिया को पूर्ण कर कई बार ऐसे लोग गुप्तचरी जैसे महत्वपूर्ण कार्य में नियुक्त हो जाते हैं जो देश के लिए हानि पहुंचाने का कार्य करते हैं । जबकि भारत के राजधर्म में ऐसे महत्वपूर्ण दायित्वों के निर्वाह के लिए राजा से यह अपेक्षा की गई है कि जो राजभक्त न हों ऐसे भ्रष्ट और निकृष्ट लोगों से कभी भी गुप्तचरी का कार्य न कराये।
    — भीष्म पितामह धर्मराज युधिष्ठिर को समझा रहे हैं कि राजा को चाहिए कि वह किसी को पीड़ा पहुंचाए बिना ही अपना काम करता रहे।
    — जो लोग अविश्वसनीय हैं और देश के जनसाधारण को अपने दुष्ट कार्यों से किसी न किसी प्रकार से उत्पीड़ित करते रहते हैं , ऐसे लोगों से सावधान करते हुए पितामह भीष्म धर्मराज युधिष्ठिर से कह रहे हैं कि राजा दुष्टों को अपना अभीष्ट कार्य कभी न कहे , अर्थात उन्हें अपनी गुप्त योजनाओं की जानकारी कभी न दे।
    — जो राजा अपने गुणों का स्वयं बखान करने लगता है वह शेखी बघारने वाला कहा जाता है । इस प्रकार के आचरण से राजा की गरिमा का हनन होता है । इसीलिए भीष्म ने आगे कहा कि राजा अपने गुणों का स्वयं ही बखान न करे।
    — जो राजा अपने श्रेष्ठजनों से उनका अधिकार या धन छीनने लगता है , वह लोकशांति को भंग कर अराजकता को उत्पन्न करने वाला होता है । ऐसी अराजकता से बड़े-बड़े विनाशकारी महायुद्ध होते हैं , और जनधन की भारी हानि होती है । इसी बात को दृष्टिगत रखते हुए पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को समझाया कि राजा श्रेष्ठ पुरुषों (किसानों) से उनका धन (भूमि) न छीने।
    — कभी-कभी अपने मनोरथ की पूर्ति के लिए बड़े लोग भी नीच पुरुषों का सहारा ले लेते हैं , परंतु यह नीच लोग कालांतर में जब अपने उपकार का प्रतिकार चाहते हैं तो ऐसे बड़े लोगों को या किसी राजा को प्रतिकार में ऐसा कुछ भी देना या करना पड़ जाता है जो न्यायोचित या धर्मसंगत न हो । इसीलिए राजा से यह अपेक्षा की गई है कि वह नीच पुरुषों का आश्रय न ले, अर्थात अपने मनोरथ की पूर्ति के लिए कभी नीच लोगों का सहारा न लें, अन्यथा देर सबेर उनके उपकार का प्रतिकार अपने सिद्घांतों की बलि चढ़ाकर देना पड़ सकता है।
    — न्याय करते समय न्याय के सभी सिद्धांतों को अपनाते हुए पूर्ण समीक्षात्मक बुद्धि का परिचय राजा को देना चाहिए । उसमें किसी भी प्रकार का आवेश यदि सम्मिलित हो जाता है तो वह अन्याय भी करा सकता है । इसीलिए भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को यह भी बताया कि उचित जांच पड़ताल किये बिना (क्षणिक आवेश में आकर) किसी व्यक्ति को कभी भी दंडित न करे।

    आवेश नहीं जिस न्याय में होता
    न्याय वही कहलाता है ।
    समीक्षात्मक हो सोच भूप की
    न्यायाधीश वही बन पाता है ।।
    आवेश गला न्याय का घोटे
    नहीं सही निष्कर्ष निकल पाता ।
    न्याय का हत्यारा हो जाता राजा
    लोक में सम्मान नहीं पाता ।।

    — राजा को अपने गुप्त निर्णयों की गोपनीयता को कभी भी भंग नहीं करना चाहिए , अन्यथा उसके निर्णय उपहास का पात्र बन सकते हैं । इसलिए यह कहा गया कि राजा अपने लोगों से हुई अपनी गुप्त मंत्रणा को कभी भी प्रकट न करे।
    — जनसाधारण में ऐसे लोग भी होते हैं जो लोभी होते हैं और अनावश्यक धन संग्रह करते रहते हैं । स्पष्ट है कि ऐसा धन संग्रह किसी न किसी के अधिकारों का हनन करके ही किया जाता है । इससे समाज में अपरिग्रह और अस्तेय जैसे मानवीय गुणों का हनन होता है ।समाज में एक दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण करने की दुष्ट भावना का प्रचार व प्रसार होता है । यही कारण है कि राजा से यह भी अपेक्षा भीष्म पितामह कर रहे हैं कि वह लोभियों को धन न दे।
    — उपकार के बदले अपकार करने वाले लोग कभी भी विश्वास योग्य नहीं हो सकते । उनसे राजा को सदैव सावधान रहना चाहिए ।धर्मराज युधिष्ठिर को भीष्म पितामह कह रहे हैं कि जिन्होंने कभी अपकार किया हो, उन पर राजा कभी विश्वास न करें।
    — नारी के प्रति राजा का ईर्ष्यालु स्वभाव बहुत ही खतरनाक होता है । भीष्म पितामह धर्मराज युधिष्ठिर को कह रहे हैं कि राजा स्त्री के प्रति ईर्ष्यालु न रहे । साथ ही यह भी कह रहे हैं कि राजा के लिए स्त्री का अधिक सेवन करना अच्छा नहीं है । उसे आत्म संयमी होना चाहिए । जितेंद्रिय राजा ही काम व क्रोध से उत्पन्न स्वयं के और अपनी प्रजा के दोषों का शमन कर सकता है ।इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि राजा आत्म संयमी व जितेंद्रिय हो । जितेंद्रियत्व के गुण से राजा के भीतर शुद्धता में वृद्धि होती है, और वह किसी से घृणा नहीं करता है । जब राजा के भीतर ऐसे गुण भरपूर मात्रा में होते हैं , तभी वह सही न्याय कर सकता है और प्रजा की उन्नति में स्वयं सहायक हो सकता है।
    — राजा के लिए यह भी आवश्यक है कि वह शुद्ध और स्वादिष्ट भोजन करे । ऋतु के अनुकूल खाने वाला हो और अहितकर भोजन को कभी भूलकर भी ग्रहण न करे ।
    — कहा जाता है कि ‘ यथा राजा तथा प्रजा’ – अर्थात जैसा राजा होता है , वैसी प्रजा हो जाती है। अतः राजा से अनेकों मर्यादाओं के पालन करने की अपेक्षा की गई है । उसके लिए पितामह भीष्म यह भी अनिवार्य घोषित कर रहे हैं कि राजा उद्दण्डता छोड़कर विनीत भाव से मानवीय पुरुषों का सदा सम्मान करे।
    — गुरुजन हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण सुधार लाते हैं । वह हमारे उद्धारक होते हैं । उन्हीं के संसर्ग और संपर्क में आकर हम द्विज बनते हैं। अतः उनके प्रति सदा कृतज्ञ भाव रखना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है । ऐसा हमारे शास्त्रों का मानना है । यही कारण है कि पितामह भीष्म राजा के लिए यह भी अनिवार्य कर रहे हैं कि वह निष्कपट भाव से गुरूजनों की सेवा करे।
    — विद्वान लोग निष्कपट भाव से सदा संसार के कल्याण में रत रहते हैं । यदि उन्हें राजा के यहां जाने पर सम्मान प्राप्त होगा तो वह जनकल्याण की ऐसी अनेकों योजनाओं को लागू करने के लिए राजा को प्रेरित कर सकते हैं जिससे राजा लोकप्रिय बनेगा । जनता की समस्याओं का समाधान हो और उन्हें उचित समय पर न्याय मिले इसलिए आवश्यक है कि राजा दम्भहीन होकर विद्वानों का सत्कार करे, अर्थात विद्वानों को अपने राज्य का गौरव माने।
    — भ्रष्टाचार और उत्कोच के द्वारा बड़े – बड़े साम्राज्य का पतन हो जाता है । राजा के राज्य में भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन हो और उत्कोच आदि का कहीं लेश मात्र भी प्रयोग न होता हो , इसी से राष्ट्र महान बनता है । इसीलिए राजा को चाहिए कि वह ईमानदारी से धन पाने की इच्छा करे।
    — राजा के भीतर यदि हठ करने या दुराग्रही
    होने का दुर्गुण है तो वह उसे तानाशाही प्रवृत्ति का शासक बनाता है । जिससे प्रजाजनों की आवाज उस तक पहुंच नहीं पाती है । भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लग जाने से विद्वान लोग भी उसके समक्ष बोलने से कतराते हैं । इसलिए राजा से यह भी अपेक्षा की गई है कि वह हठ छोड़कर सदा ही प्रीति का पालन करे।
    — राजा को अपने धर्म के पालन करने में कार्य कुशल होना चाहिए। उसे अवसर के अनुकूल बोलना और कार्य करना चाहिए । इन दोनों गुणों से वह न केवल अपनी प्रजा में लोकप्रिय बनेगा , अपितु सही समय पर सही निर्णय लेने वाला होकर लोगों को सुशासन देने में भी सफल होगा । अतः राजा कार्यकुशल हो , परंतु अवसर के ज्ञान से शून्य न हो।
    — आज के राजनीतिज्ञों का सबसे बड़ा दोष यह है कि वह जनता के लोगों को मिथ्या सांत्वना और भरोसा देने का नाटक करते रहते हैं । कोई भी ऐसा कार्य नहीं करते जिससे जनता में उनके प्रति विश्वास की भावना उत्पन्न हो। फलस्वरूप भारतीय राजनीतिज्ञों के प्रति विश्वास का संकट दिन – प्रतिदिन गहराता जा रहा है । राजा के प्रति प्रजाजनों में पूर्ण विश्वास होना चाहिए ,इस बात को हमारे पूर्वजों ने भली प्रकार अनुभव किया था । यही कारण है कि पितामह भीष्म भी धर्मराज युधिष्ठिर को यह बता रहे हैं कि राजा केवल पिण्ड छुड़ाने के लिए किसी को सांत्वना या विश्वास न दे, अपितु दिये गये विश्वास पर खरा उतरने वाला भी हो।
    — राजा को उदारचित्त वाला होना चाहिए । जिस पर वह कृपा करना चाहता है , उसके शुभ कार्य की प्रशंसा तो करे ,परंतु उस पर कोई ऐसा आक्षेप न करे जिससे उसे अपमान अनुभव हो । राजा को उस व्यक्ति के प्रति ऐसा व्यवहार दिखाना चाहिए कि वह इस कृपा का अपने शुभ कार्यों के कारण स्वाभाविक रूप से पात्र है। अतः कहा गया कि राजा किसी पर कृपा करते समय उस पर कोई आक्षेप न करे।
    — किसी परिस्थिति व वस्तुस्थिति की सही जानकारी लिए बिना कोई भी कार्य करना नादानी कहलाती है । जिसके परिणाम बहुत ही भयानक आते हैं। राजा अपने राजधर्म का संपादन करते समय बहुत ही सजग और जागरूक रहकर निर्णय ले । निर्णय लेने में चाहे समय लग जाए परंतु निर्णय भावुकता या आवेश में कदापि न लिया जाए , अर्थात बिना जाने किसी पर कोई प्रहार न करे।
    — जो लोग जनहित के विरुद्ध कार्य करते हैं , और धर्म व नैतिकता को क्षत-विक्षत करने की गतिविधियों में संलिप्त रहते हैं , राजा के लिए वे लोग स्वाभाविक रूप से शत्रु होते हैं । ऐसे शत्रुओं का संहार करना राजा का सर्वोपरि कर्तव्य है । जिसके विषय में कहा गया कि राजा शत्रुओं को मारकर किसी प्रकार का शोक न करे।
    — आवेश में आकर अकस्मात किसी पर क्रोध करना और उसे दंडित कर देना स्वयं में बहुत बड़ा पाप है। क्योंकि न्याय का यह सिद्धांत है कि किसी एक भी निर्दोष व्यक्ति को किसी भी परिस्थिति में अपमान सहना न पड़े। यदि राजा आवेश और क्रोध में आकर दंड देता जाएगा तो अनेकों निर्दोष लोगों को उसके कोप का भाजन बनना पड़ सकता है । जिससे प्रजा जनों में असन्तोष बढ़ता है । अतः पितामह भीष्म राजा के लिए यह भी घोषित कर रहे हैं कि वह बिना सोचे समझे अकस्मात किसी पर क्रोध न करे। –

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