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भारत की डाक्टरी पर बाबा का डंक

डाक्टर थे समाज के प्रतिष्ठित लोग…उन पर रामदेव जैसों की हिम्मत नहीं हुआ करती थी पर डाक्टरों ने भी वायरस-महामारी के आगे ताली-थाली की ध्वनि और मोबाइल टार्चो, दियों की रोशनी के प्रभावों की नई व्याख्याएं सुनकर, अपने मरीज को छोड़कर खुले में बाहर आकर ताली बजाते हुए थे…तब भला रामदेव ऐसे डाक्टरों और एलोपैथी की क्यों परवाह करें?

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जब पानी सिर से ऊपर गुजर गया और उनके घर वाले भी मजाक उड़ाते हुए टर्र…टर्र करके हंसने लगे तब डाक्टरों में थोड़ी हिम्मत आई। भारत का सबसे सम्मानित पेशा कभी इतने उपहास का विषय बन जाएगा, किसने सोचा था। मगर यह अचानक नहीं हो गया। न ही गलती अकेले बाबा रामदेव की है। डाक्टर जो कभी सबसे संगठित और स्वाभिमानी वर्ग हुआ करता था उसके अंदर ही ऐसे लोग नेता बन गए जिन्होंने खुद किसी भी हद तक झुकने और अपने मेडिकल प्रोफेशन की इज्जत गिराने में शर्म महसूस नहीं की।

आईएमए के अध्यक्ष रहे डा के के अग्रवाल अब नहीं रहे। कोरोना ने ही उनकी जान ली। वे बहुत मीडिया फ्रेंडली डाक्टर थे। मृत्यु के बाद उन्हें मीडिया ने याद भी दिल से किया। कुछ उन बातों का जिक्र भी गोल कर दिया जो आज के समय में बताना जरूरी थीं। जब देश पर बड़ा संकट हो, विज्ञान को नकार कर अंधविश्वास को स्थापित किया जा रहा हो तो कुछ अप्रिय सत्य बोलना चाहिए था।

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अब अपमान के दंश से तिलमिलाए डाक्टर यही बोल रहे हैं। अपने पत्रकार दोस्तों से कह रहे हैं कि आप लोगों को कुछ तो लिखना था। हमसे कहते हैं डर गए, पर आप लोग तो हमसे ज्यादा डरे हुए हैं। डाक्टर दोस्तों की बात सही है। सभी डरे हुए हैं।

नहीं तो जब पिछले साल इन्हीं दिनों डा. के के अग्रवाल ने कहा था कि ताली थाली बजाने से कोरोना मर जाएगा तब पत्रकारों को भी लिखना चाहिए था और डाक्टरों को भी बोलना चाहिए था। मगर सच है कि बिल्ली के गले घंटी कौन बांधे? (Who will bell the cat?) सब डरे हुए थे और आज भी डरे हुए हैं। मीडिया की तो बात ही छोड़ दीजिए वह तो अपना अस्तित्व ही खोने की तैयारी में है। उसके अंदर तो सवाल उठना भी बंद हो गए हैं। उनके घर वाले भी समझ गए हैं कि पत्रकारिता एक ग्लोरिफाइड क्लर्की है। इससे ज्यादा कुछ नहीं। पत्रकार को अब न अपने आप से कोई उम्मीद है और न ही समाज को उससे। थी कभी पत्रकारिता भी एक नोबल प्रोफेशन मगर आज तो बैंड बाजा हो गई है। जो हर तरह के फरमाइशी आइटम पेश करने के लिए तैयार है।

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जब समाज का पतन होता है तो किसी एक या दो चार चीजों पर नहीं रुकता। सब पर असर डालता है। डाक्टर जिनके लिए ऊपर कहा कि समाज का सबसे प्रतिष्ठित तबका वह भी अपने ही साथी डाक्टरों द्वारा ताली थाली की ध्वनि और मोबाइल टार्चो, दियों की रोशनी के प्रभावों की नई व्याख्याएं सुनकर केवल खामोश ही नहीं हुआ था बल्कि अपने मरीजों को छोड़कर खुले में बाहर आकर खड़ा भी हो गया कि आकाश से उस पर पुष्प वर्षा हो सके!

उन तमाशों के बाद बाबा रामदेव डाक्टरों और एलोपैथी पर ज्यादा हमलावर हो गए। रामदेव के बारे में कोई नहीं जानता कि उन्होंने कितनी पढ़ाई लिखाई की है? जिस आयुर्वेद की बात वे करते है उसकी कौन सी डिग्री उनके पास है? योग की पीटी वर्जिश के अलावा वे योग के दार्शनिक, आध्यात्मिक पक्ष पर कितना जानते हैं? उनका पूरा नाम क्या है, किस स्कूल, कालेज में पढ़े हैं? लेकिन इन सब सवालों से उपर रामदेव कैंसर के इलाज का दावा करते रहे तो पुत्र होने की दवा भी बेचते रहे।

उधर डाक्टर दिन रात संक्रमण के खतरों के बीच कोरोना मरीजों का इलाज करते रहे। कितने डाक्टर मर गए। डाक्टरों की सबसे बड़ी संस्था इंडियन मेडिकल एसोसिएसन (आईएमए) ने बताया कि केवल दूसरी लहर में 420 डाक्टर अपनी जान गंवा चुके हैं। उन्होंने इसके राज्यवार आंकड़े जारी किए। पिछले साल के आंकड़े अलग हैं। डाक्टरी वह पेशा है कि चाहे युद्ध हो, बाढ़ हो, भूकंप हो या आज की महामारी उन्हें सामने आकर, फ्रंट पर काम करना ही पड़ता है। वे बाबा रामदेव की तरह लेट कर पांव चलाते हुए डाक्टर, टर्र- टर्र जैसी घटिया तुकबंदी नहीं कर सकते।

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अभी तक दुनिया में भारत के डाक्टरों का डंका बज रहा था। अमेरिका, इंग्लैंड से लेकर हर देश में उनका नाम था, रुतबा था। आज जरा भारत से कोई उनसे बात कर ले। वे फूट पड़ेंगे। अमेरिका में उनके अमेरिकी सहयोगी उनसे पूछ रहे हैं कि क्या भारत में एलोपैथी को ‘ मूर्खतापूर्ण विज्ञान ‘ माना जाता है?  क्या भारत में हजारों लोग एलोपैथी डाक्टरों की दवाओं की वजह से मर गए?  कोई भक्त जरा अपने किसी डाक्टर रिश्तेदार को विदेश फोन तो करे! वहां भारतीय डाक्टर कह रहे हैं कि रुस, चीन, कई अन्य देशों के डाक्टरों को यहां थोड़ा कम वैज्ञानिक तरीके से पढ़ा हुआ डाक्टर माना जाता था, अब हमें उससे भी नीचे श्रेणी में पहुंचा दिया गया है।

बाबा ने डाक्टरों के खिलाफ जो जो कहा है वह सब विदेशी अख़बार मजे ले लेकर छाप रहे हैं। क्या अंध भक्तों को यह पता है कि भारतीय डाक्टरों का अमेरिका में कितना ऊंचा स्थान है! और ये सब डाक्टर एम्स और भारत के दूसरे सरकारी मेडिकल कालेजों से पढ़ कर गए हैं। इन डाक्टरों ने कितना डालर भारत पहुंचाया है? केवल भारत की इकानमी में ही नहीं, देश का झंडा विदेशों में बुलंद करने में भी इन डाक्टरों का क्या स्थान है!

कितने दुःख और आश्चर्य की बात है कि यही रामदेव जब कोरोना की दवा बना लेने का दावा करते हुए उसे लांच करते हैं तो उनके साथ देश के स्वास्थ्य मंत्री जो खुद डाक्टर हैं खड़े रहते हैं। मंत्री तो और भी थे मगर भारत का हेल्थ मिनिस्टर एक ऐसी दवा को लांच करे जिसकी कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है तो फिर भारत की वैज्ञानिक समझ पर दुनिया के सवाल उठाने को आप कैसे रोक सकते हो। बाबा इससे पहले वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का नाम लेकर यह भी दावा कर चुके कि उनकी दवा को मान्यता मिल गई है। डब्ल्यूएचओ ने इसका खंडन किया। कहा कि उन्होंने कोई एप्रुवल नहीं दिया। लेकिन इन सबका बाबा रामदेव पर कोई असर नहीं है। वे इस तरह माफी मांग रहे हैं, जैसे ये कोई खास बात नहीं है। केन्द्र सरकार भी फिलहाल कुछ करती नहीं दिख रही। लेकिन यह पहला मौका है जब देश और विदेश सब जगह रामदेव के खिलाफ भारी रोष है। बाबा की इस तरह की टिप्पणियों पर विरोध तो पहले भी कई बार हुआ मगर बाबा और भक्त मैनेज किए रहते थे।  इस बार यह संभव नहीं लग रहा। ट्वीटर पर #ArrestRamdev टाप ट्रैंड कर रहा है।

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ट्वीटर पर सबसे जोरदार प्रतिक्रिया है कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की। उन्होंने किसी के द्वारा बाबा रामदेव पर अपना पुराना वीडियो शेयर करने पर ट्वीट किया – “ रामदेव

बालकृष्ण की जोड़ी ठग थी, ठग है और ठग रहेगी।“  ट्वीटर पर दिग्विजय के 9 साल पुराने टीवी बाइटों के वे वीडियो शेयर किए जा रहे हैं जिनमें वे रामदेव को ठग कह रहे हैं। एक अन्य टीवी इंटरव्यू में वे बेबाक कह रहे हैं कि “ये बाबा नहीं ढोंगी है। व्यवसायी है! “

आगे देखना यह है कि अपनी ही इमेज बचाने में लगे प्रधानमंत्री मोदी क्या रामदेव की भी इमेज बचाएंगे या इस बार बाबा की टर्र टर्र करवा दी जाएगी!

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