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कर्तव्य-ध्वजा का ध्वंस या सांसारिक समर्पण

मुद्दा एनडीटीवी नहीं है। मुद्दा प्रणव रॉय-राधिका रॉय भी नहीं हैं। और,, रवीश कुमार तो मुद्दा हैं ही नहीं। जिनके लिए ये सब मुद्दे हैं, उनके लिए होंगे। मेरे लिए मुद्दा यह है कि नरेंद्र भाई मोदी को मीडिया के इतने विशाल खारे समंदर में एक छोटे-से टापू पर मौजूद थोड़े-बहुत मीठे पानी की झील से इतना गुरेज़ क्यों था कि उन्हें खरबों रुपए के कर्ज़ में डूबे अपने एक अमीर दोस्त को वस्त्रहीन हो कर गोताखोरी के लिए प्रेरित करना पड़ा? वे कहेंगे, मैं ने कहां प्रेरित किया? मगर दुनिया तो मान रही है कि यह बिसात उन्हीं ने बिछवाई। तो मैं भले ही मान लूं कि शेयर बाज़ार में एनडीटीवी के दस्तरख्वान पर गौतम भाई अडानी बदनीयती से आ कर नहीं बैठे थे, मगर मेरे अलावा कौन नरेंद्र भाई और गौतम भाई की इस मासूमियत पर भरोसा करेगा?

सो, अब भारतीय मीडिया के सातों कसैले समंदरों का पानी भी मिल कर नरेंद्र भाई और गौतम भाई के हाथों पर चढ़े दस्तानों पर लगे एनडीटीवी के लहू को धो तो नहीं ही पाएगा। चूंकि लहू लहू है, सो, वह पुकारता भी रहेगा। सही हो, ग़लत हो, इस प्रसंग ने एनडीटीवी को एक प्रतीक-घटना बना दिया है। एनडीटीवी इसका हक़दार हो-न-हो, वह दीये और तूफ़ान की कहानी बन गया है। मैं न उन से सहमत हूं, जो पूरे संस्थान को कब्ज़े में ले लेने के बावजूद एक पत्रकार को न ख़रीद पाने की जगत-सेठ की विवशता का ज़श्न मना रहे हैं, और न उन से, जो एनडीटीवी के मरण-दिवस का उत्सव मनाते थिरक रहे हैं।

मैं नहीं मानता कि रवीश कुमार भारतीय मीडिया संसार के ‘न भूतो, न भविष्यति’ पत्रकार हैं। लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि अनुचर शिशु मंदिर से पढ़ कर निकले जो भक्तियुगीन एंकर-एंकरनियां उन के इस्तीफ़े पर नृत्य-मग्न हैं, उन्हें रवीश के कर्तव्यबोध की सतह छूने में मौजूदा जन्म तो कम पड़ेगा। ऐसा नहीं है कि जो रवीश कर रहे थे, वह कोई और कर ही नहीं सकता था। मगर ऐसा भी नहीं है कि कोई भी चौआ-पौआ वह सब कर लेता। रवीश को हिंदी की वर्तमान टीवी पत्रकारिता का पर्याय मान लेने वाले अशिक्षित हैं। उन्हें एनडीटीवी का पर्याय मान लेने वाले भी अर्द्धशिक्षित हैं। रवीश उतनी ही औसत या अतिरिक्त प्रतिभा के धनी हैं, जितने बाकी कई। उन्हें चिट्ठियां पढ़ते-पढ़ते वैसे ही मंच मिल गया, जैसे प्राध्यापकी करते-करते प्रणव रॉय को मिल गया था। दोनों ने अपने-अपने बाज़ार में उसे अपनी-अपनी सलाहियत से भुना लिया।

अनुकूल बगीचा न हो तो ट्यूलिप भी कुम्हला जाते हैं। दिलदार धरती हो तो गेंदा भी फल-फूल जाता है। मेधा और क़ाबलियत भी खाद-पानी मिलने पर ही अपने रंग बिखेर पाते हैं। अगर कोई मुझ से कहे कि एनडीटीवी और इंडिया टुडे जैसे मीडिया समूहों की बेलें बिना तत्कालीन सत्ताओं की विशेष अनुकंपाओं का सहारा लिए हमारी राष्ट्रीय प्राचीर पर पसर गईं तो मैं उसे मूर्ख-दिवस पर जन्मा मानूंगा। सवा चार दशक में प्रणव रॉय से अरुण पुरी और सुभाष चंद्रा तक की मीडिया उड़ानों के किस्से मेरे जैसे बहुत-से चश्मदीद आप को बता-सुना सकते हैं। कौन, कैसे, किस-किस की बाहें थाम कर कहां-से-कहां पहुंचे; किस ने कब-कब कैसे-कैसे रंग बदले; किस ने अपने लिए कौन-कौन सी सहयोगी प्रतिमाएं गढ़ीं; किस ने किन-किन प्रतिमाओं को नष्ट किया; इस की एक पूरी बिनाका-गीतमाला है। इसलिए ‘निर्बल से लड़ाई बलवान की’ के संगीत पर थाप देते वक़्त इतने भी भावभीने मत हो जाइए कि आंखों से आंसू थमने का नाम ही न लें!

प्रज्ञावान होने के साथ-साथ अगर आप बाज़ार की ज़रूरतों के हिसाब से तमाशेबाज़ होने की सिफ़त भी रखते हैं तो अपनी शोहरत में चार क्या, आठ चांद लगा सकते हैं। तीक्ष्ण बुद्धि वाले प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को पछुआ-छुअन वाले अंग्रेज़ीदां प्रणव रॉय और उन के पुरबिया हिंदी संस्करण रवीश कुमार पांडे इसीलिए अपने आदर्श लगते हैं। तेज़ी से उभरा एक नए बुद्धिजीवी वर्ग इसलिए उन पर रीझा हुआ है कि उसे लगता है कि वे दोनों चमत्कारी ढंग से एक जनोन्मुखी बौद्धिक कार्य में लगे हुए हैं। मैं मानता हूं कि एनडीटीवी का पूरा पत्रकार-दल और उस के मालिक़ान स्थूलतः ऐसे काम में लगे भी हुए थे। मगर यह भी है कि चेहरे पर अगर कोई दाग हो तो वह इस घूंघट की आड़ में आसानी से छिप भी जाता है।

सैकड़ों करोड़ रुपए का कर्ज़ लेते वक़्त जब प्रणव रॉय अपनी कंपनी के शेयर का, ख़ासी बढ़ी-चढ़ी कीमत पर, सौदा कर रहे थे और जानते थे कि कर्ज़ न चुका पाने की स्थिति में ये शेयर कर्ज़ देने वाले के हो जाएंगे तो अब सेंधमारी का बहाना ले कर हाय-हाय क्यों? क्या कभी किसी रवीश ने तब अपने रोज़गारदाता से पूछा था कि क्या ये ख़बरें सही हैं कि उन्होंने तीसियों असली-नकली कंपनियों के ज़रिए 11 अरब रुपए सचमुच इकट्ठे किए हैं, क्या उन में से चार अरब रुपए मॉरिशस की एक कंपनी के ज़रिए एनडीटीवी में लगाए हैं और सात अरब रुपए ब्रिटेन और हॉलैंड में रख दिए हैं? नहीं न! लेकिन अब अपने इस्तीफ़े का शहीद-स्मारक बना कर उम्मीद की जा रही है कि आप-हम सलामी शस्त्र मुद्रा में खड़े हो जाएं?

अगर मौजूदा मीडिया की फ़िलवक़्त सब से पावन मानी जा रही धरा का काम भी कमोबेश सांसारिक कर्मकांड के ज़रिए ही चल रहा था तो हम इसे धर्मपालन की कर्तव्य-ध्वजा का ध्वंस मान कर दीदे कैसे बहा सकते हैं? संसार की यही रीत है कि अगर आप के ढोल में पोल है और ढोल भाई को पसंद आ गया तो फिर अपना ढोल आप को भाई के हवाले करना ही पड़ेगा। भाई ढोल की जो कीमत दे दे। वही हुआ। आप जिस ढोल को अपने गले में लटका कर बजा रहे थे, उसे बजाने का आप का तरीका भाई को नागवार गुज़र रहा था। तो भाई ने ढोल आप से छीन कर खुद के गले में डाल लिया। अब आप को मलाल है कि भाई ने यह छल-कपट कर के किया। काहे का छल-कपट? आप भी सांसारिक प्राणी हैं, भाई भी सांसारिक प्राणी है। कौन नहीं जानता कि आप के अर्पण-समर्पण के पीछे सांसारिक कारण हैं। आप कोई धर्म-युद्ध लड़ते हुए मारे नहीं गए हैं। आप ख़ामोशी से सिर्फ़ किनारे हो गए हैं। आप जानते थे कि अब इस में ही गरिमा है।

इसलिए मुझे एक संस्थागत शिविर के वर्ण-संकर होने की भावी आशंकाओं का दुःख तो है और इस फ़िक्र की असहजता भी कि आगे चल कर कुछ शिविरार्थियों को शायद अपने मन मारने पड़ा करेंगे, मगर उन पराक्रमियों के प्रति मैं गदगद सहानुभूति का कोई भाव, बावजूद तमाम कोशिशों के भी, ख़ुद में पैदा नहीं कर पा रहा हूं, जो अपनी जीवन-गाथा को कुर्बानियों के इतिहास की शक़्ल दे रहे हैं और कन्नी उंगली कटा कर शहीद का दर्ज़ा पाने को लालायित हैं। इन सारे ओजस्वियों के ओज की भूलभुलैया में जिन्हें भटकना हो, भटकें। इन की बातों के नर्म गलीचों और हमारी खुरदुरी ज़मीन के यथार्थ अलग-अलग हैं। मैं जानता हूं कि आफ़ताब तो आहिस्ता-आहिस्ता नहीं निकल रहा है, मगर सभी के रुख़ से नक़ाब ज़रूर आहिस्ता-आहिस्ता खिसकती जा रही है। ऐसे में अपनी ग़मज़दगी बढ़ती जा रही है, बस!

लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया और ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर के संपादक हैं।

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

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