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ऋषि सुनक के पीएम से एनआरआई में हलचल नहीं!

विदेशों में बसा हर भारतीय समझ रहा है कि ऋषि सुनक को काम करके दिखाना होगा। भारत के भारतीयों और कनाडा, अमेरिका अथवा ब्रिटेन में बसे भारतीयमूल के लोगों की सोच में ज़मीन-आसमान का अंतर है।.. किसी ने भी कनाडा में यह नहीं कहा, कि ऋषि का प्रधानमंत्री बनना भारतीयों के लिए दीवाली का तोहफ़ा है। ऋषि जब ब्रिटेन को आर्थिक संकट से निकाल पाए तभी उनकी जय-जयकार होगी।

कनाडा डायरी-

ऋषि सुनक के ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बन जाने से जितनी ख़ुशी भारत में है, उतनी विदेशों में बसे भारतवंशियों में नहीं। जो भारतीय कनाडा, अमेरिका अथवा योरोप में रह रहे हैं, उनका मानना है कि इसमें अचंभे की बात कोई नहीं है। इसलिए कि इन देशों में वैसा भेद-भाव और ऊँच-नीच नहीं है, जैसी भारत में है। यहाँ गोरे लोग आम तौर पर इस कारण भेदभाव नहीं करते कि अमुक काला है, गोरा है या ब्राउन है। कनाडा में आज 19 भारतवंशशी फ़ेडरल संसद (हाउस ऑफ़ कॉमन्स) के सदस्य हैं। कई मंत्री हैं। रक्षा मंत्री अनीता आनंद भी भारतवंशी और हिंदू हैं। ट्रूडो की पिछली सरकार में हरजोत सिंह सज्जन रक्षामंत्री थे। वे अपने भारत विरोधी बयानों के लिए प्रसिद्ध थे। इस बार ट्रूडो ने उन्हें दूसरे कामों में लगाया है। किसी ने भी कनाडा में यह नहीं कहा, कि ऋषि का प्रधानमंत्री बनना भारतीयों के लिए दीवाली का तोहफ़ा है। ऋषि जब ब्रिटेन को आर्थिक संकट से निकाल पाए तभी उनकी जय-जयकार होगी। कनाडा में भारतीय और पाकिस्तानी ही गोरों के बाद राजनीति में सर्वाधिक सक्रिय हैं। यहाँ कई मेयर और पार्षद भारतीय हैं। यह सामान्य बात है।

विदेशों में बसा हर भारतीय समझ रहा है कि ऋषि सुनक को काम करके दिखाना होगा। भारत के भारतीयों और कनाडा, अमेरिका अथवा ब्रिटेन में बसे भारतीयमूल के लोगों की सोच में ज़मीन-आसमान का अंतर है। यहाँ भारत, पाकिस्तान, बाँग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल या भूटान से आए लोगों के मध्य दूरी नहीं है। इन सबको ब्राउन बोला जाता है या इंडियन। पाकिस्तान और बाँग्लादेश के लोग भी ख़ुद की पहचान इंडियन के रूप में बताते हैं। इससे उनको दो फ़ायदे हैं। एक तो भारतीय कहने से उनकी मुस्लिम पहचान छुप जाती है। क्योंकि पश्चिमी दुनिया में 9/11 के बाद से मुसलमानों के प्रति दूरी का भाव है। दूसरे ख़ुद को इंडियन बताने से उन्हें विशाल भारतीय जगत का बाज़ार मिलता है। कनाडा में बनारस कुजीन या दुर्गा किचेन नाम रखने से हर हिंदू भारतीय भोजन करने पहुँच जाता है। जैसे मैं टोरंटो के डाउन टाउन में जब मोतीमहल होटल पहुँचा तो मीनू में बीफ़ देखा। मैंने वेटर से पूछा, इसमें पॉर्क क्यों नहीं है, तब वह चौंका और उसने बताया कि यह होटल एक मुस्लिम पंजाबी का है।

यही कारण है कि विदेशों में बसे भारतीयों को ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने की खबर से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। मेरे पड़ोस में एक इटेलियन गोरा परिवार रहता है, उन्हें नहीं पता, कि भारत में एक नेता सोनिया गांधी हैं जो इटली मूल की हैं। भारत के अलावा दुनिया में कहीं भी सामंती सोच नहीं है। भले कनाडा में संवैधानिक राजशही हो और ब्रिटेन में किंग चार्ल्स संविधान प्रमुख हों पर ब्रिटेन के हिंदू पीएम का बनना एक सामान्य-सहज बात।

इसी दीवाली के दिन, 24 अक्तूबर को यहाँ नगर निकाय के चुनाव थे। कुछ कौंसिलर और मेयर प्रत्याशी हमारे घर भी वोट माँगने आए। यहाँ प्रत्याशी वोट माँगते हुए कोई शोर-शराबा नहीं करता। न भीड़ ले कर चलता हैं। न कोई पब्लिक रैली करता है। अपनी बात कहने के लिए वे किसी इनडोर स्टेडियम या बड़े हाल को किराये पर लेते हैं, वहीं वे अपनी बात रखते हैं। वहीं पर दूसरे प्रत्याशी भी आते हैं और वे बहस करते हैं। कुछ लोग ऐसे मौक़े पर खाने-पीने का प्रबंध करते हैं। कौंसिलर पद हेतु एक पाकिस्तानी मूल की महिला मलीहा शाहिद लड़ रही थीं। वे वोट माँगने हमारे घर आईं। मेरी बेटी को सलवार सूट पहने देख़ कर हिंदी में बोलीं, शानदार आपका सूट बहुत बढ़िया है। मेरी बेटी ने कहा, लखनवी चिकन हैं। तो उन्होंने कहा, लखनऊ शायद यूपी में है। मेरी बेटी ने कहा, जी वह यूपी की राजधानी है। उन्होंने बताया कि वे लाहौर से हैं।

यह एक तरह का अपनापा जताना था। उन्होंने मेरी बेटी से पूछा, क्या मैं अपना बोर्ड आपके फ़्रंटयार्ड में लगवा डूं। बेटी के हां कहने पर वे बहुत ख़ुश हुईं। संयोग से वे जीत भी गईं। इसी तरह डीड्री न्यूमैन मेयर का चुनाव लड़ रही थीं। वे भी घर आईं। मुझसे बहुत देर बात करती रहीं। मेरे बताने पर कि मैं इंडिया के कानपुर शहर से हूँ, तो उनके बेटे ने बताया कि वह कानपुर जा चुका है। उनके पिता भी मेयर थे। लेकिन वे कुछ मतों से एलिज़ाबेथ रॉय से हार गईं। यहाँ लाउडस्पीकर से वोट नहीं माँगा जाता। एक या दो की संख्या में प्रत्याशी वोट माँगने घर-घर जाते हैं। किसी के साथ न कोई तामझाम न कोई पुलिस वाला। यहाँ कोई बाहुबली चुनाव नहीं लड़ सकता।

जबकि नगर निगम के मेयर के अधीन पुलिस और सभी राजस्वकर्मी होते हैं। कह सकते है वह भारत जैसा कलेक्टर हो या पुलिस कप्तान। ऐसी यहाँ व्यवस्था है।

देश की बुनावट के भीतर कई-कई रीजन हैं। हर रीजन के अंदर कई नगरपालिकाएँ। यहां ज़िले नहीं होते। जैसे टोरंटो एक रीजन है। उसके अंदर कई नगरपालिकाएँ है। हर नगरपालिका में कुछ पार्षद, इन्हें वार्ड पार्षद कहते हैं। कुछ रीजनल पार्षद चुने जाते हैं। सारी नगरपालिकाओं के वार्ड पार्षद एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी को चुनते हैं। वह अपने रीजन में आने वाली सभी नगर पालिकाओं के समस्त मेयरों की सहमति से मुख्य कार्यकारी अधिकारी का चुनाव करता हैं। ध्यान रखें, यहा सरकार की स्थाई नौकरी वाली अफ़सरशाही और उसके पद नहीं है, बल्कि चयनित पद होता है। नगरपालिकाएँ परस्पर वोटिंग से इन पर पदासीन लोगों को हटा सकती हैं। मुख्य कार्यकारी अधिकारी ही पुलिस के चीफ़ को नामज़द करता है, जो पुलिस सेवा से होता है। पुलिस सेवा भी स्थायी नहीं होती। आम तौर पर पुलिस के लोग संविदा पर रखे जाते हैं। हर एक की भर्ती सिपाही या कांस्टेबल के रूप में होती है। अनुभव, कौशल से वे तरक़्क़ी करते हैं। लेकिन प्रांतीय और संघीय पुलिस के अधिकारी कमीशंड अधिकारी होते हैं।

नागरिक पुलिस को रीजनल पुलिस बोलते हैं और किसी भी तरह की आपाद स्थिति में यही पुलिस आती है। इसमें विदेशी लोग भी नौकरी पा सकते हैं। मतलब ऐसे लोग जो परमानेंट रेजीडेंट (PR) का कार्ड ले कर कनाडा जाते हैं। पिछले दिनों पील रीजनल पुलिस के अंतर्गत  ब्रैमटन पुलिस के चार लोगों पर एक डकैती में संलिप्त होने का आरोप लगा। इनके नाम हैं सुखदेव सांगा, करनवीर सांगा, सुखदीप कंडोला और जास्मिन बस्सी। इनको जांच होने तक सस्पेंड कर दिया गया है। लेकिन इनको वेतन मिलता रहेगा। ब्रैमटन वह इलाक़ा है, जहां के बारे में कहा जाता है, कि वहाँ ख़ालिस्तान समर्थक बहुत हैं। यूँ  ब्रैमटन को मिनी इंडिया भी कहते है। यहाँ भारत और पाकिस्तान के लोग, ख़ासकर दोनों साइड के पंजाब से आए लोग बहुत अधिक है। टोरंटो के अंदर भी  ब्रैमटन की छवि ख़राब है। फिलहाल यहाँ के मेयर पैट्रिक ब्राउन हैं।

ब्रैमटन में रहने वालों को मकान भले सस्ते मिल जाएं लेकिन यहाँ चोरी-चकारी और रोड रेज बहुत आम है। इसलिए यहाँ पर गाड़ियों का इंश्योरेंस बाकि  टोरंटो से दूना है। अगर दुरहम रीजन में किसी गाड़ी का इंश्योरेंस हर महीने 200 डॉलर का है तो  ब्रैमटन में रहने पर यह बीमा 700 से 800 डॉलर प्रति मास के बीच है। इसी तरह मिसीसागा, स्कारब्रो इलाके को भी पसंद नहीं किया जाता। अलबत्ता यहाँ भारत-पाकिस्तान के स्टोर बहुत हैं। और भोजन भी भारतीय स्वाद का मिल जाता है। लेकिन गोरे लोग इस क्षेत्र में रहना पसंद नहीं करते। इसिलिए गोरे लोग टोरंटो से पूर्व की तरफ़ खिसकते जा रहे हैं। एजेक्स, विटबी, ओशवा, ओक आदि उनके नए उपनगर हैं। इन सबकी अपनी नगरपालिकाएँ हैं। इन सारे उपनगरों में अधिकांश आबादी गोरों (इंग्लिश, फ़्रेंच, आयरिश, इटैलियन, स्वीडिश, स्कॉटलैंड, डच, जर्मन, रूसी) लोगों की है। इसके बाद अमेरिकन अफ़्रीकन हैं, जो अमेरिका के रंगभेद के चलते यहाँ आए हैं। फिर श्रीलंकन, वेस्टइंडीज़ के हिंदुओं और ईसाई समुदाय की आबादी है। दक्षिण भारत के लोग हैं। यहां पंजाबी रहना पसंद नहीं करते। इसलिए सिख आबादी बहुत कम है। अलबत्ता पाकिस्तान के अहमदिया संप्रदाय के लोग ज्यादा हैं।

कनाडा में प्रांतीय विधानसभाओं का प्रमुख प्रीमियर कहलाता है। प्रांतीय विधानसभा को प्रांत की पार्लियामेंट बोलते हैं। इसके सदस्य MPP कहलाते है। कनाडा में दस प्रांत हैं और तीन टेरिटरी। हर एक में अलग क़ानून हैं। टोरंटो ओंटारियो प्रांत में आता है, और इस प्रांत की राजधानी टोरंटो है। मज़े की बात कि देश की राजधानी ओटावा भी ओंटारियो में है।दूसरा बड़ा शहर मांट्रियाल क्यूबेक प्रांत में है। इसकी राजधानी क्यूबिक सिटी है। यहाँ की राजभाषा फ़्रेंच है। तीसरा बड़ा शहर वैंकुवर ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में है। वही उसकी राजधानी है। यह शहर टोरंटो से कोई 3500 किमी दूर है।

कनाडा देश की संसद को फ़ेडरल2 पार्लियामेंट हिल बोलते हैं और इसके सदस्य MP कहलाते हैं। वैसे पहले तो सत्र के दौरान कोई भी मज़े से टिकट ले कर संसद जा सकता था। पाँच वर्ष पहले जब संसद में गोली चली तब से संसद की सुरक्षा एक विशेष प्रशिक्षित दस्ता करता है। किंतु आप अब भी संसद के भीतर जा सकते हैं। बस एक जाँच मशीन के भीतर से गुज़र कर। यहाँ किसी MP, MPP या पार्षद या मेयर, प्रीमियर अथवा PM को न तो बॉडीगार्ड व गनर मिलता है और न भारत की तरह नेताओं की सुरक्षा की SPG, ब्लैक कैट या XYZ सुरक्षा है।

फ़ेडरल सरकार के आदेश को प्रांतीय सरकारें मानने को बाध्य नहीं हैं। जैसे महारानी एलिजाबेथ को जब दफ़नाया जाना था तो उस दिन फ़ेडरल सरकार ने अवकाश घोषित किया लेकिन ओंटारियो प्रांत ने नहीं। ओटावा के फ़ेडरल कर्मचारी का छुट्टी का दिन होगा तो जरूरी नहीं की प्रांत के कर्मचारी का भी हो। यहाँ तक कि स्कूल भी खुले हो सकते है। यदि बच्चों को स्कूल नहीं भेजना है तो प्रिंसिपल को पहले मेल करना आवश्यक है। फ़ेडरल सरकार के पास सिर्फ़ देश की विदेश नीति, सुरक्षा और मिलिटरी है। उसकी आय केंद्रीय करों से आती है। यहाँ मुफ़्त कुछ नहीं है। चाहे आप दिहाड़ी मज़दूर हो या मेयर, प्रीमियर या पीएम अथवा ब्रिटिश साम्राज्य का दूत गवर्नर-जनरल सबको इनकम टैक्  देना पड़ेगा। निजी खर्च अपने वेतन से उठाने होंगे। गाड़ी, बँगला और भोजन का भी।

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