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फेडरर का जाना और नडाल का रोना!

खेल भी जीवन में सच्चा आनंद देते हैं। खेलों को खेलने वाले और देखने वाले दोनों को ही यह आनंद मिलता है। खेलों में ही “हरि अनंत, हरि कथा अनंता” का शुद्ध भाव प्रकट होता है। खेलों को खेलने वाले महान खिलाड़ियों से ही खेल की लोकप्रियता बढ़ती है। खेल में ही “जीते को जग भला, हारे को हरिनाम“ हो सकता है। लेकिन कुछ महान विरले खिलाड़ी ऐसे होते हैं, जिनकी खेल कथा अनंता होती है। जीवन भी उनका हरिनाम का महिमामंडन होता है। वे हार में ही नहीं, जीत में भी स्थितप्रज्ञ रह सकते हैं। उनके खेलने भर से आनंद और आंसू एक साथ झलकते हैं। वे हंसते-हंसाते खेलते हैं, और रोते-गाते उस पर बात कर सकते हैं।

महान टेनिस खिलाड़ी रॉजर फेडरर अब प्रतिस्पर्धा टेनिस नहीं खेलेंगे। बढ़ती उम्र और चोटिल शरीर से कढ़ी मेहनत करना अब भारी पड़ने लगा है। लंदन में लेवर कप खेलकर फेडरर ने अपनी टेनिस खेल पारी की घोषणा की। लेवर कप खेलने के बाद उनके रोने से दुनिया भर के टेनिस प्रेमी भी रो दिए। और तो और टेनिस कोर्ट पर बरसों से उनसे भिड़ते रहने वाले रफैल नडाल भी बिलख-बिलख कर रोए। ये अकेला दृष्य दुनिया भर के खेल प्रेमियों के लिए अकल्पनीय था। दोनों को एक-दूसरे से टेनिस कोर्ट पर खेलते, जुझते, भिड़ते देखने वालों ने दोनों को साथ बैठे बिलख कर रोते भी देखा। दुनिया भर को अपने टेनिस खेल से आनंद देने वाले, दुनिया के ही सामने एक-दूसरे के लिए रोते दिखे। शुद्ध खेल भावना ही खेल की जीवात्मा है।

जब 2003 में रॉजर फेडरर पहली बार विंबलडन विजेता बने तब तक 14 टेनिस ग्रेंड-स्लेम (एकल खिताब) जीतने वाले पीट सेम्प्रास खेल को अलविदा कह चुके थे। लग रहा था सेम्प्रास से बड़ा टेनिस खिलाड़ी अब आना आसान नहीं रहेगा। फिर फेडरर ने 2003 से 2007 तक लगातार पांच विंबलडन फाइनल जीते। और इसी बीच 2004 से 2008 तक लगातार पांच बार यूएस ओपन भी जीता। टेनिस पेशेवर संघ द्वारा कराए जाने वाली स्पर्धाओं में फेडरर ने 103 एकल खिताब जीते। सबसे बहुचर्चित 20 टेनिस ग्रेंड-स्लेम एकल खिताब जीते। जिसमें 8 विंबलडन, 6 आस्ट्रेलियन ओपन, 5 यूएस ओपन और 1 फ्रैंच ओपन खिताब रहे। 20 ग्रेंड-स्लेम फाइनल में से रॉजर फेडरर ने 9 फाइनल अपने चिर प्रतिद्वंदी राफेल नडाल से जीते थे। दोनों ने कुल 24 फाइनल खेले जिसमें 14 नडाल ने और 10 फेडरर ने जीते। फेडरर के आखिरी टेनिस मैच में वही नडाल उनके साथ खेले, हंसे, जुझे और बिलख कर रो भी दिए। ऐसा अद्भुत नजारा केवल खेलों में ही देखा जा सकता है।

रॉजर फेडरर का जीवन टेनिस खेल के आंकड़ो से परे भी रहा। उनका चरित्र और व्यक्तित्व उनके टेनिस खेल की तरह ही उंचा और सर्वश्रेष्ठ रहा है। अनुकरणीय रहा। टेनिस कोर्ट से बाहर भी फेडरर सौम्यता, शालीनता और सद्भाव के शहंशाह ही दिखे। उनको टेनिस खेलते, खेल में व्यवहार करते देखने पर ही हजारों बच्चों ने टेनिस खेलने की ठानी होगी। फेडरर जैसे श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही खेल का, और जीवन का भी आदर्श गढ़ते हैं। जिनका कोई सानी नहीं, वे समाज के ऐसे प्रणेता रहे। फेडरर जीतने पर भी हारने वाले का सम्मान करना नहीं भूलते थे। और हारने पर भी सभी का दिल जीतना जानते थे। उनके लिए खेलना ही हार-जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण था। फेडरर खेल में स्थितप्रज्ञता की मूर्ति थे।

आखिरी बार 2017 के आस्ट्रेलियन ओपन के फाइनल में दोनों का आमना-सामना हुआ था। दोनों लंबे संघर्ष के बाद अच्छा खेल कर फाइनल में पहुंचे थे। फाइनल में दोनों ने गजब का टेनिस खेला। फेडरर ने नडाल को फाइनल जीतने के बाद चोट से उभरने, और शानदार खेलने के लिए बधाई दी। नडाल से कहा, “मैं तुम्हारे लिए खुश हूं। फाइनल इतना शानदार था कि मैं हारता, तो भी खुशी ही होनी थी।“ फिर फेडरर बोले, “टेनिस कठोर खेल है और इसमें ड्रा या बराबरी पर नहीं रह सकते हैं। अगर ड्रा की गुंजाईश होती तो आज रात मैं यह ट्राफी खुशी से नडाल के साथ बांट लेता।“ वह फाइनल तो फेडरर जीते ही, मगर उनके साथ ही टेनिस और बाकि खेल भी जीत गए।

रॉजर फेडरर जैसे खिलाड़ियों से टेनिस या अन्य खेल ही नहीं, पूरा समाज भी समृद्ध होता है। रॉजर फेडरर को सभी का “लव ऑल।“

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