संघ-परिवार का उतरता रंग

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शंकर शरणhttp://www.nayaindia.com
हिन्दी लेखक और राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। जे.एन.यू., नई दिल्ली से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी पर पीएच.डी.। महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में राजनीति शास्त्र के पूर्व-प्रोफेसर। ‘नया इंडिया’  एवं  ‘दैनिक जागरण’  के स्तंभ-लेखक। भारत के महान विचारकों, मनीषियों के लेखन का गहरा व बारीक अध्ययन। उनके विचारों की रोशनी में राष्ट्र, धर्म, समाज के सामने प्रस्तुत चुनौतियों और खतरों को समझना और उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए लेखन का शगल। भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन, मुसलमानों की घर वापसी; गाँधी अहिंसा और राजनीति;  बुद्धिजीवियों की अफीम;  भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद; जिहादी आतंकवाद;  गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग;  आदि कई पुस्तकों के लेखक। प्रधान मंत्री द्वारा‘नचिकेता पुरस्कार’ (2003) तथा मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नरेश मेहता सम्मान’(2005), आदि से सम्मानित।

इन दिनों संघ-परिवार पर हैरत बढ़ गई है। विशेषकर, शाहीनबाग पर सड़क कब्जा, जामिया-मिलिया से लेकर कई जगहों पर दिल्ली पुलिस पर हमले, लाल किला पर देश-विरोधी उपद्रव, और अब बंगाल में भाजपा समर्थकों का चुन-चुन कर मारा जाना, उन से लाखों रूपए की ‘जजिया’ वसूली, कुछ इलाकों को हिन्दुओं से खाली करा लेने, आदि पर संघ-भाजपा की निष्क्रियता ने सब को चकित कर दिया है।

हालाँकि, यह सब पहली बार नहीं हो रहा। हिन्दू समाज की अनदेखी, बढ़-चढ़कर मुस्लिम-तुष्टीकरण, और चर्च-तुष्टिकरण के लिए वाजपेई सरकार की भी खिंचाई हुई थी। हज सबसिडी की रकम स्वतः बढ़ाने, और ‘दो करोड़ उर्दू शिक्षकों’ को नौकरी देने, आदि बयानों के बाद वाजपेई को ‘हाजपेई’ कहा गया था।

परन्तु इस बार स्वयं रा.स्व.संघ के लोग भी सत्ता भोग रहे हैं। प्रधानमंत्री वाजपेई ने इन्हें सत्ता से दूर ही नहीं रखा, बल्कि उन की पूरी अनदेखी की थी। स्वयं संघ-प्रमुख कुप्प सुदर्शन ने शेखर गुप्ता के साथ टीवी इंटरव्यू में वाजपेई-अडवाणी की कड़ी आलोचना की थी। उस का पूरा पाठ इंटरनेट पर उपलब्ध है, जिसे पढ़ना चाहिए।

दूसरा फर्क कि स्थिति और गंभीर हो चुकी है। पर संघ-भाजपा नेतृत्व नीरो की तरह वंशी बजाते हुए सब को उपदेश दे रहे हैं। मानो उपदेश देने हेतु उन्हें सत्ता मिली थी! इस से संघ-परिवार के निचले नेता, कार्यकर्ता भी हतप्रभ हैं। बंगाल में अपने समर्थकों की हत्याओं, उन्हें उजाड़ कर मार-भगाने जैसी घटनाओं पर भाजपा साहबों ने बयान तक नहीं दिया। जाकर पीड़ितों से मिलना, सांत्वना, और जिहादियों को खत्म करने के लिए कुछ करना तो दूर रहा। जबकि वही साहब गोरक्षकों को जली-कटी सुनाते रहे हैं, किसी फिल्मी तारिका के पाँव में चोट लग जाने पर भी संवेदना बयान देते हैं। वोट लेने के उपक्रम में साहब दर्जनों बार बंगाल गए। पर अब बंगाल को अपने हाल पर छोड़ दिया! पीड़ितों के परिवारों को कोई सहायता भी घोषित न की। उलटे कुछ भाजपा नेता हिन्दुओं से ‘बलिदान’ की माँग कर रहे हैं। मानो संगठन-पार्टी को हिन्दुओं के लिए नहीं, बल्कि हिन्दुओं को ही उन के लिए मर जाना चाहिए!

दुर्भाग्य से, यह एक लंबी प्रक्रिया का अंग है। बीस-पच्चीस वर्ष पहले ही, केंद्रीय सत्ता की गंध मिलते ही भाजपा नेतृत्व और संघ हिन्दू समाज की चिन्ता से दूर होता गया है। वाजपेई सरकार की तरह विभिन्न भाजपा राज्य सरकारों ने भी हिन्दू हित का कोई कार्य नहीं किया। केवल अंगवस्त्र, टीका, आरती, जैसी सांकेतिक भंगमाओं से ही वे हिन्दुओं को ठगते रहे हैं। उन्होंने वैसी हिन्दू-विरोधी नीतियों को भी नहीं छुआ, जो राज्य सरकारों के कार्य-क्षेत्र में थी। जैसे, शिक्षा में हिन्दू-विरोधी सामग्री भरी रहना;  जनकल्याण योजनाओं में गैर-हिन्दुओं को अधिक सुविधाएं, आदि।

मधु किश्वर की चर्चित पुस्तक ‘मोदी, मुस्लिम्म एंड मीडिया: भ्वायसेज फ्रॉम गुजरात’ (2014) में इस के असंख्य अनायास प्रमाण मिलते हैं। भाजपा नेतृत्व ने हिन्दू हितों को उठाया तक नहीं, उस पर कुछ करना तो दूर रहा। उन की सत्ता ने आर्थिक विकास के काम पूरी निष्ठा से किए। अल्पसंख्यकों के प्रति विशेष उदारता रखी। हिन्दू-हित चिंता करने वाले कुछ संगठनों, नेताओं पर कड़ा लगाम लगाया। यही मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, आदि राज्यों में भी दिखा। भाजपा सत्ता ने कहीं हिन्दू चिन्ता नहीं रखी, बल्कि दूसरों को नई-नई सुविधाएं देने में वे कांग्रेस से आगे ही रहे। यह कई मुस्लिम नेताओं ने भी दसियों वर्ष पहले से ऑन-रिकॉर्ड कहा है। उन बातों पर संघ-परिवार गर्व करता था!

इस के बावजूद, संघ-परिवार की मुस्लिम-विरोधी और हिन्दूवादी छवि दोहरी विडंबना है। एक ओर, मुसलमानों को ‘’वोट-बैंक नहीं बल्कि इंसान मानने’’ और अपने को ‘‘सच्चा सेक्यूलर’’  प्रमाणित करने के लिए संघ-भाजपा हिन्दू समाज की हेठी और मुस्लिम-प्रेम दर्शाते रहे हैं। वचन-कर्म, दोनों में। जैसे, अब आर.एस.एस. अपनी ओर से मुस्लिम विधवाओं को पेंशन देने का काम कर रहा है।

दूसरी ओर, तमाम देशी-विदेशी हिन्दू विरोधी ताकतें तथा यहाँ अन्य राजनीतिक दल संघ-परिवार पर ‘मुस्लिम-विरोधी’ और ‘हिन्दू सांप्रदायिक’ होने का नियमित दुष्प्रचार करते हैं। इस से केवल हिन्दू भ्रमित होकर दोहरी, तिहरी चोट खाते रहे हैं। हिन्दू समाज के विरुद्ध दशकों से जारी राजकीय भेद-भाव दूर करना तो दूर, उलटे संघ-भाजपा नई-नई वंचनाएं लाने पर आमादा रहते हैं।

जैसे, देश के हजारों हिन्दू मंदिरों को सरकारी कब्जे से निकाल कर हिन्दू समाज के हाथ में सौंप कर दूसरों के समान धार्मिक अधिकार देने के बदले वे सारे मंदिरों पर सरकारी कब्जे की योजना बना रहे हैं। यही वंचना शिक्षा क्षेत्र में भी है। राजकीय एकाधिकार के कारण हिन्दू बच्चे अपने धर्म की शिक्षा से वंचित रह कर ज्ञान-शून्य बड़े हो जाते हैं। जबकि मुस्लिम, क्रिश्चियन बच्चे राजकीय सहयोग से मिलती औपचारिक शिक्षा में ही अपने मजहब-रिलीजन की पूरी सीख बाकायदा पाते हैं।

अब बंगाल में प्रत्यक्ष हिन्दू संहार, सामूहिक विस्थापन, पलायन रोकने में भी संघ-भाजपा में घोर उदासीनता है। मीडिया में उन के प्रवक्ता और प्रचार-सेना ध्यान बँटाने या हिन्दू समाज को ही दोष देने में लगी है। यह ठीक 1990 वाला दुहराव है, जब कश्मीर से हिन्दुओं को समूहिक मार भगाने पर कुछ नहीं किया गया। बल्कि उस का सच भी देश से छिपाया गया। क्योंकि तब भी केंद्रीय सत्ता भाजपा-समर्थित थी। सो, जब संघ-भाजपा भी चुप तो कश्मीरी हिन्दुओं का मामला कौन उठाता? अभी वही बंगाल में हो रहा है।

फिर, जैसे तब कश्मीरी हिन्दुओं को ही ‘कायर’ कहकर पल्ला झाड़ा गया; उसी तरह अभी बंगाली हिन्दुओ को कहा जा रहा है। कई संघ-भाजपा समर्थक प्रचारक बंगाली हिन्दुओं को ही बुरा-भला कहने में लगे हैं। कि वे अपनी करनी का फल भोग रहे हैं, कि उन्होंने कम्युनिस्टों को समर्थन दिया, आदि।

संघ-परिवार के विशाल संगठन, संसाधन, केंद्र और कई राज्यों की सत्ता हाथ में लेकर भी ऐसा भगोड़ापन छिप नहीं सकता। उन की चुप्पी व अकर्मण्यता अपनी कहानी स्वयं कह रही है। परन्तु उन की यह नीति दशकों से यथावत है। उन के लिए ‘हिन्दुत्व’ केवल वोट खींचने का औजार भर रहा है। जैसे कांग्रेस के लिए ‘समाजवाद’ या ‘गरीबी हटाओ’ रहा था।

वस्तुतः संघ-परिवार ने हिन्दू ‘एकता’ बनाने के बदले उसे तोड़ने का काम किया है। हिन्दू समाज को तोड़ने का सब से बड़ा साधन पार्टी-बंदी है। चूँकि राजनीतिक पार्टियाँ सत्ता-संधान में लगी रहती हैं, इसलिए स्वभावतः सत्ताकांक्षी उस से जुड़ते हैं। उन्हें पहला और एक मात्र दिया जाता है: दूसरे दलों के खिलाफ हवा बनाना। झूठ-सच जैसे भी हो। यह निस्संदेह समाज को विभाजित करता है। जितनी पार्टियाँ, जितना पार्टी-प्रचार, उतना विभाजन। भाजपा साहबान और क्या कर रहे हैं?

यह ध्यान से विचारना चाहिए कि जाति-बिरादरी, भाषा, सांस्कृतिक विविधता, आदि हिन्दू समाज को संगठित करने के काम करती थी। जबकि राजनीतिक पार्टियाँ उसे विखंडित करती हैं। इस का सब से दुखद प्रमाण है कि स्वतंत्र भारत में सभी पार्टियों ने हिन्दू समाज के मूलाधार को चोट पहुँचाई है। धर्म-शिक्षा के बजाए हिन्दू-विरोधी ‘सेक्यूलर’ शिक्षा, जाति-बिरादरी की अंधनिन्दा, तरह-तरह के विभाजक आरक्षण, अल्पसंख्यक चिन्ता के पीछे हिन्दुओं को तीसरे दर्जे के नागरिक बना देना, तरह-तरह के ‘अलग’ समूह बनाना और उन्हें सुविधाएं देना, उन के लिए अलग राजकीय निकाय, संस्थान, अनुदान, छात्रवृत्तियाँ, आदि – यह सब स्वतंत्र भारत में राजनीतिक पार्टिर्यों ने किये। यह सब विखंडक काम वोट के लिए किए गए, जो हिन्दू समाज की नींव ही खिसका रही है। कृपया नोट करें, इन में से कई काम अंग्रेज शासकों ने भी नहीं किए थे।

इस प्रकार, हिन्दू समाज को ‘संगठित’ करने के नाम पर उसे तरह-तरह से तोड़ना, अधिकारविहीन, असहाय, दल-सरकार मुखापेक्षी बनाना – दरअसल यह हुआ है। आज दल-बंदी हिन्दू समाज का कोढ़ है। इसे यदि समय रहते न समझा गया, तो सीताराम गोयल की भविष्यवाणी सच होगी कि ‘‘आर.एस.एस. हिन्दू समाज को ऐसे फंदे की ओर ले जा रहा है जिस से अब संभवतः वह निकल नहीं सकेगा।’’

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साभार - ऐसे भी जानें सत्य

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