संघ परिवार: सीताराम गोयल की चेतावनी

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शंकर शरणhttp://www.nayaindia.com
हिन्दी लेखक और राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। जे.एन.यू., नई दिल्ली से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी पर पीएच.डी.। महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में राजनीति शास्त्र के पूर्व-प्रोफेसर। ‘नया इंडिया’  एवं  ‘दैनिक जागरण’  के स्तंभ-लेखक। भारत के महान विचारकों, मनीषियों के लेखन का गहरा व बारीक अध्ययन। उनके विचारों की रोशनी में राष्ट्र, धर्म, समाज के सामने प्रस्तुत चुनौतियों और खतरों को समझना और उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए लेखन का शगल। भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन, मुसलमानों की घर वापसी; गाँधी अहिंसा और राजनीति;  बुद्धिजीवियों की अफीम;  भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद; जिहादी आतंकवाद;  गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग;  आदि कई पुस्तकों के लेखक। प्रधान मंत्री द्वारा‘नचिकेता पुरस्कार’ (2003) तथा मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नरेश मेहता सम्मान’(2005), आदि से सम्मानित।

सीताराम गोयल ने लिखा था कि, ‘‘किसी संगठन के जीवन में एक बिन्दु आता है जब अपनी ही चिन्ता करने में उस के मूल लक्ष्य ओझल हो जाते हैं।’’ उन्होंने चेतावनी दी थी: ‘‘आर.एस.एस. हिन्दू समाज को ऐसे फन्दे की ओर ले जा रहा है जिस से इस का निकल सकना शायद संभव न हो सकेगा।’’ (1994) जिन्हें वह चेतावनी बेढब लगे, वे जानें कि यह ऐसे संत-स्वरूप ज्ञानी योद्धा की है जिस ने पाँच दशक से भी अधिक समय तक, विपरीत परिस्थितियों में, हिन्दू समाज के सभ्यतागत शुत्रओं से लोहा लिया।

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सीताराम गोयल (1921-2003) की तुलना महान रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन से हो सकती है। एक मामले में यहाँ उन की स्थिति वैसी ही रही, जैसे सोवियत (कम्युनिस्ट) रूस में सोल्झेनित्सन की थी। उन की बातों का लोहा लगभग सभी जानकार मानते थे, किन्तु सत्ता का रुख देख चुप रहते थे।

बहरहाल, समाज में पूर्व-निर्धारित कुछ नहीं होता। 1917 ई. की रूसी क्रांति पर सोल्झेनित्सिन की ग्रंथ-माला ‘लाल चक्र’ वास्तविक इतिहास पर आधारित है। उसे पढ़ कर्मयोग की सीख पूर्ण सत्य लगती है। एक व्यक्ति का भी कर्म, विकर्म या अकर्म घटनाक्रम को प्रभावित कर सकता है। विशेष अवसर पर वह पूरी सभ्यता के लिए मर्मांतक/जीवन-रक्षक बन सकता है।

हम भारत में ही 1947 में देख चुके कि तीन-चार व्यक्तियों के निर्णय ने करोडों हिन्दुओं को तबाह कर दिया। बाद में भी लाखों उस की मार झेलते रहे हैं। देश-विभाजन अनिवार्य न था। वह न होता तो क्या होता, अब यह कल्पना वृथा है; क्योंकि परिणाम अनेक तत्वों से बनते हैं। सो, केवल एक चीज हाथ में बचती है: अपना कर्तव्य। न उसे हल्के से लें, न गलत काम करें। यही सोल्झेनित्सिन और सीताराम गोयल, दोनों का आदर्श भी था।

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अब प्रश्न है कि क्या संघ-भाजपा शासनों में हिन्दुओं की स्थिति बेहतर हुई? दशकों सत्ता में रहकर भी उन्होंने हिन्दुओं के हाथ में अपनी शिक्षा, और मंदिर तक नहीं दिए, जो दूसरे समुदायों को हासिल है। यह सब से बुनियादी और सब से सरल काम भी था! आज तो देश में असंख्य स्थानों से हिन्दू-पलायन हो रहे हैं। जबकि यहाँ गैर-हिन्दुओं को ही ‘वंचित’ करने का आरोप विश्व भर में है। इन सब पर अकर्मण्यता संबंधी संघ-परिवार के बहाने कभी खत्म न होंगे! सत्ता में वे अपने नाकारापन और घातक कामों के लिए नए-नए बहाने लाते हैं। वह भी ऑफ-रिकॉर्ड; जिम्मेदारी लेकर किसी मुद्दे पर कुछ नहीं कहते। केवल विपक्ष में होने पर उन का प्रचार सत्ता के विरुद्ध मुड़ता है। मानो, सत्ता जब दूसरों के हाथ हो तो नीतियों के लिए जबावदेह है। किन्तु जब संघ-परिवार सत्ताधारी हो, तो हर जबावदेही से मुक्त हैं!

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सो, प्रश्न उठता है: भाजपा राज में हिन्दुओं की हालत सुधरती है या बिगड़ती? कुछ मानते हैं कि सुधरती है, क्योंकि महत्वपूर्ण संस्थाएं संघ-भाजपा के हाथ आ जाती है। लेकिन वे करती क्या हैं? वे सेक्यूलर-वामपंथी नीतियाँ ही पूर्ववत् जारी रखती हैं। कुछ मामलों में तो उन के नेता कांग्रेस को मात देता हुआ तुष्टीकरण, और सामाजिक विभेद बढ़ाते हैं।

यानी मर्मभूत हिन्दू-विरोधी नीतियाँ जारी रहती हैं। पर उन के समर्थक बौद्धिक चुप रहते हैं कि ‘अपने’ लोगों के कर्म, विकर्म, अकर्म की निंदा कैसे करें? इस का फायदा उठा कर हिन्दू-विरोधी तत्व चुपचाप नई-नई स्कीमों, योजनाओं की माँग करते हैं। जिसे खुशी-खुशी मान कर संघ-सत्ताधारी अपनी उदारता दिखाने में लगे रहते हैं, जो कहलाना उन की उत्कट चाह है। इस के लिए वे हिन्दू-हितों की उसी तरह बलि देते रहते हैं जो गाँधी ने किया था।

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यही सब देख कर सीताराम गोयल ने लिखा था कि, ‘‘किसी संगठन के जीवन में एक बिन्दु आता है जब अपनी ही चिन्ता करने में उस के मूल लक्ष्य ओझल हो जाते हैं।’’ किन्तु मौखिक रूप से उन्होंने इसे बेलाग रखा था। कई गणमान्य लोगों की उपस्थिति में उन्होंने कहा था कि ‘‘पूरे विश्व-इतिहास में, वज्रमूर्खों, ‘डफर्स’ का सब से बड़ा एकत्रित संगठन रा.स्व.संघ है।’’ (1989)। उन्होंने चेतावनी दी थी: ‘‘आर.एस.एस. हिन्दू समाज को ऐसे फन्दे की ओर ले जा रहा है जिस से इस का निकल सकना शायद संभव न हो सकेगा।’’ (1994)

संभवतः उसी वर्ष दिल्ली के विट्ठलभाई पटेल भवन में एक गोष्ठी हुई थी जिस में संघ सरकार्यवाह श्री सुदर्शन,  के.आर. मलकानी,  वसंतराव ओक,  राम स्वरूप, सीताराम गोयल,  जोशी जी, देवेन्द्र स्वरूप, अरुण जेटली, सहित लगभग तीस लोग थे। अपनी बारी में सीताराम जी ने स्पष्ट स्वरों मे कहा: ‘‘मैं इस मंच से घोषणा करता हूँ कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से राष्ट्र का अहित होगा,  अहित होगा, अहित होगा।’’  यह प्रत्यक्षदर्शी विवरण एक प्रबुद्ध संघ कार्यकर्ता ने ही दिया है। अपने जीवन के अंतिम वर्ष में सीताराम जी ने यहाँ तक कहा कि ‘‘यदि संघ-भाजपा का पतन नहीं होता, तो हिन्दू समाज का पतन तय है।’’ (2003)

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इतनी गंभीर बातें किसी क्षणिक आवेश में नहीं कही गईं। कितनी भयंकर चेतावनी – कि जिस हिन्दू समाज ने सदियों इस्लामी साम्राज्यवाद को झेल कर हरा दिया, जिस ने चर्च-मिशनरियों के आघात सहकर उन्हें विफल रखा – वह संघ-परिवार के चक्कर में नष्ट हो जा सकता है! संघ-परिवार की ‘बड़ी’ ढाल का लाभ उठाकर इस्लामी, चर्च साम्राज्यवादी तथा वामपंथी उसे इतना बाँध दे सकते हैं कि उन्हें फिर हरा सकने लायक हिन्दू समाज इस बार बचेगा ही नहीं। क्या इस चेतावनी पर विचार करना किसी नेता/संगठन की अहर्निश वाहवाही करने से कम जरूरी है? मगर अधिकांश लोग इस पर मुँह नहीं खोलते। यह हालत भी सीताराम गोयल की चेतावनी की पुष्टि ही है।

जिन्हें वह चेतावनी बेढब लगे, वे जानें कि यह ऐसे संत-स्वरूप ज्ञानी योद्धा की है जिस ने पाँच दशक से भी अधिक समय तक, विपरीत परिस्थितियों में, हिन्दू समाज के सभ्यतागत शुत्रओं से लोहा लिया। साथ ही, पूरे दौरान समय-समय पर संघ-परिवार को निःस्वार्थ सहयोग भी दिया। उस के साथ निकट से विचार-व्यवहार किया। अतः सीताराम जी का आकलन दीर्घ अनुभव पर आधारित है। उस की उपेक्षा करना हिन्दू-घाती है। कराची, लाहौर, ढाका, श्रीनगर, आदि इस के जीवन्त उदाहरण हैं कि समाज ही प्रमुख है, संघ गौण। जबकि संघ अपने सदस्यों को ठीक उलटी सीख देता है! फलतः उस के ‘थिंक-टैंक’ भी संघ-संघ रटने से अधिक कुछ नहीं जानते। उन के अधिकांश लोग आँख, कान, मस्तिष्क रखने वाले दृष्टिहीन बधिर मतिहीन हैं। उन की कथनी-करनी के रिकॉर्ड से, अथवा उन से किसी भी बिन्दु पर बातचीत करके कोई भी इस की परीक्षा कर सकता है!

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ऐसी नासमझी से ही दशकों से सत्ताएं हाथ में रखकर भी संघ-भाजपा के काम हिन्दू-हित खाते में शून्य दिखाते हैं। उन का सबसे बड़ा गुमान, और दलील, अपना संगठन ‘बढ़ते’ जाना है। बाकी काम वही कांग्रेसी-वामपंथी-जातिवादी, जो उन के समर्थक गिनाते हैं। उन में सड़क, बिजली, शौचालय, वर्ग-भेदी स्कीमें, आदि हैं, किन्तु धर्म एवं शिक्षा गायब है। फलतः हिन्दू समाज निरंतर दुर्बल हो रहा है। वामपंथी काम ही ‘ईमानदारी’ से कर के संघ-सत्ताधारी स्वयं झूमते हैं। वे हिन्दू समाज पर कसते फन्दे के अस्तित्व से ही अबोध हैं! ‘डफर’ और किसे कहेंगे?

हिन्दू समाज की बिगड़ रही स्थिति पर असलियत दिखाते ही संघ कार्यकर्ता हिन्दुओं को ही दोष देकर पल्ला झाड़ते हैं:- हिन्दुओं में ‘एकता नहीं’, ‘धर्माचार्य निकम्मे हैं’, बंगाली लोग ‘क्षेत्रवादी’ हैं, आदि। मनगढ़ंत बातें। कहीं प्रमाणिकता की परवाह नहीं। बने-बनाए जुमले आलोचक के मुँह पर ईँट-पत्थर की तरह फेंक दिए जाते हैं।

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इस प्रकार, दशकों से सत्ता हाथ में रखने वालों को यह भी समझ नहीं कि हिन्दू-विरोधी स्थितियाँ बदलना सत्ता का काम है, क्योंकि उसी माध्यम से वे बनी थी। इस में अन्य प्रयास ऊँट के मुँह में जीरा जैसे हैं। फिर, वैसे प्रयास सत्ताहीन लोग करते हैं। दूसरे, संघ-भाजपा अपने रिकॉर्ड की समीक्षा के बजाए हिन्दू समाज को ही कोसते हैं जिस ने उन्हें सत्ता दिलाई। यह डफरता के साथ कृतघ्नता भी है।

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संघ परिवार सत्ता-प्राप्ति को ही आदि-अंत, व अपनी उपलब्धि मानता है। उस में हिन्दू समाज की भूमिका गौण समझता है। जबकि समाज-रक्षा की जिम्मेदारी वह बाकियों की मानता है। अपने लिए बस गरीब-दलित-अल्पसंख्यक वाला ‘विकांस’, या ‘सेवा’ करते हुए आत्म-प्रशंसा की जुगत बनाता है। यह उस की नीतियों, भाषणों, और निर्णयों में साफ-साफ दिखता है। अतः सीताराम गोयल की चेतावनी यथावत सही है। अच्छे-भले हिन्दू नेताओं, कार्यकर्ताओं, साधनवान लोगों का यह न समझना भी उस की पुष्टि ही है।

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1 COMMENT

  1. बहुत ही तथ्यात्मक और दृष्टिसंपन्न लेख है जिसके मूल में हिंदूहित चिंता और राष्ट्रप्रेम है। संघ का व्यवहार उस महिला की तरह है जो उस व्यक्ति से अपने चरित्र का प्रमाणपत्र माँगकर खुश होती है जिसने कपट से उसका शीलभंग किया है।

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