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सरदार पटेल-इन्दिरा गांधी और 31 अक्तूबर का महत्व

भोपाल। इस दिवस का देश के इतिहास और उसके वर्तमान नक्शे में महत्वपूर्ण योगदान है। इस दिन सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म दिन है -तो वहीं यह देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की शहादत का दिन है। पटेल को सरदार की उपाधि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने दी थी। दोनों ही राष्ट्र के गौरव हैं। पटेल ने देश को एक सूत्र में बांधने की कोशिश की। वहीं इन्दिरा गांधी ने देश विभाजक ताकतों से टक्कर लेकर खालिस्तानी आतंकवादियो का मुंहतोड़ जवाब दिया। सिखों के एक वर्ग द्वारा पाकिस्तान की तर्ज पर ‘खालिस्तान’ निर्माण की मांग करने वाले भिंडरनवाले ,जो अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में छुपा बैठा था उसको समाप्त कर आतंकवाद को खत्म किया। परंतु सिख अंगरक्षकों द्वारा उनकी इसी दिन हत्या कर दी गयी थी। उन्होंने प्राण देकर भी देश की अखंडता की रक्षा की, नमन है – इन दोनों विभूतियों को!

देश के आज़ाद होने के बाद देश की 225 देशी रियासतों और -रजवाड़ों को भारतीय संघ में लाकर एक राष्ट्र का स्वरूप देने की कोशिश, वैसे तो नेहरू मंत्रिमंडल का और काँग्रेस पार्टी का फैसला था। परंतु उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्रालय का प्रभारी होने के कारण सरदार बल्लभ भाई पटेल के नेत्रत्व में इस काम को अंजाम दिया गया। वैसे मणिपुर और त्रिपुरा जैसी रियासते ं आजादी के बाद संघ में विलय हुआ। परंतु इन रियासतों के विलय के बाद, पहले मैसूर, जयपुर, ग्वालियर, इंदौर, ट्रावंकोर, कोचीन जैसी बड़ी रियासतों को संघ में विलय के लिए शुरुआती समय में इन रियासतों के महाराजाओं को राज प्रमुख का दर्जा दिया गया, जो िक गवर्नर के समकच्छ था। वर्तमान राजस्थान में जयपुर और उदयपुर की रियासतों में इस पद को साझा किया गया। अर्थात छह माह के लिए एक और उसके बाद दूसरे को यह पद दिया गया। कारण था इन रियासतों के आपसी संबंधों में सहजता का अभाव होना।
खैर, ब्रिटिश इंडिया और देसी रियासतों से बने इस भू-भाग को एकजुट करने में पटेल का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस विलय के लिए उन्हे तरह – तरह के उपाय अपनाने पड़े। तत्कालीन केंद्रीय सचिव मेनन के संस्मरणों में इनका वर्णन किया हैं।

2. आजादी के बाद
वर्तमान राष्ट्र का स्वरूप राज्य पुनर्गठन आयोग के बाद हुआ। तब सरदार पटेल राजनीतिक परिद्रश्य से जा चुके थे। यह सब पंडित नेहरू के समय में हुआ। बंबई का विभाजन और मध्यप्रदेश का उदय भी इसी समय हुआ। पुर्तगाली क्षेत्रों गोवा -दमन -दियू का विलय भी नेहरू काल में हुआ। फ्रेंच कालोनी -पांडिचेरी और माहे भी वर्तमान भारत के अंग बने और आज के भारत का नक्शा उसी समय उदय हुआ।

3. इन्दिरा गांधी काल
इन्दिरा गांधी ने भी इस देश की सीमाओं को फैलाये जिनकी आतंकवाद के िवरुध लड़ाई के कारण हत्या हुई, वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के बाद ऐसी घटना थी जिसने देश को आक्रोश में भर दिया। कुछ हिंसा भी हुई। अगर महात्मा की हत्या के लिए मराठी ब्राह्मणों को जनता का कोप भुगतना पड़ा, तो देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री की हत्या का जन आक्रोश देश के विभिन्न भागों में सिख धर्मावलंबियों पर बिता। यह बहुत ही दुखद समय था।

इन्दिरा गांधी ने भी देश के नक्शे में सिक्किम राज्य का विलय किया। जो आजादी के समय भूटान के समान एक स्वतंत्र रियासत थी। उनका दूसरा महत्वपूर्ण योगदान बांग्ला देश का निर्माण कराना था। आजादी के बाद बंगाल के मुस्लिम बाहुल्य वाले क्षेत्र को पूर्वी पाकिस्तान के नाम से उदय हुआ। जो इस्लामाबाद की सरकार के एक प्रांत की हैसियत रखता था। परंतु पंजाबी और पठान मुसलमानो द्वारा बंगाल के मुसलमानों का शोषण किया जाता था। उनकी भाषा और सान्कृतिक विरासत को यहां तक उनकी “नस्ल “ को खत्म करने की भी कोशिश की जा रही थी। ऐसे में वहां की अवामी लीग पार्टी के शेख मुजीबुर रहमान ने आज़ादी की आवाज़ उठाई। पाकिस्तान के फौजी शासकों ने उनको सपरिवार जेल में डाल दिया। तब मुक्तिवाहिनी के लड़ाकों ने पाकिस्तान के फौजी शासकों और फौज के खिलाफ हथियार उठाए। पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल याहिया खान ने भारत पर बंगला देश के मुक्तिवाहिनी को मदद देने का आरोप लगाया। उसकी कोशिश में तत्कालीन राष्ट्रपति निकसन ने दौरे पर गयी प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी को को धमकी दी – पाकिस्तान पर हमला होने की दशा में अमेरिका चुप नहीं बैठेगा| इन्दिरा गांधी जी का अमेरिकी राष्ट्रपति को दिया गया करारा जवाब तत्कालीन सुरक्षा सलहकार किसिंगर ने लिखा हैं। इन्दिरा गांधी ने व्हाइट हाउस की संयुक्त पत्रकार वार्ता को रद्द कर दिया। उन्होंने कहा था िक हम भले ही विकासशील राष्ट्र हो, परंतु हम अपने देश के लोगों की ताकत को समझते हैं।
जनरल माणिक शॉ के नेत्रत्व में हुए युद्ध में 13 दिन में ही सारी पाकिस्तानी सेना के 90 हज़ार सैनिकों में मय हथियारों के आत्म समर्पण कर दिया था।

आज के कुछ अति बुद्धिमान विचारक और कालम लेखकों के अनुसार इन्दिरा जी को आत्म समर्पण नहीं स्वीकार करना चाहिए था ! तो फिर क्या विकल्प था ? क्या उन सभी को इसलिए मार दिया जाता िक वे मुसलमान थे? क्या यह हिटलर के यहूदी निर्मूलन जैसा अत्याचार नहीं होता ? वे भूल जाते हैं िक 90000 लोगों के शव बंगला देश को तो महामारी से नाश कर देते वरन हमारे देश के बंगाल – आसाम आदि भी भयानक महामारी से त्रस्त होते। शिमला समझौते के समय ऐसा दावा किया जाता है िक ज़ुल्फिकर अली भुट्टो ने यह कह कर वार्ता को तोड़ने की धमकी दी थी – यदि जीते हुए इलाके नहीं दिये गए तो –भारत युद्ध बंदी अपने पास रखे ! इन विचारवान लोगों से पूछना चाहूँगा की युद्धबंदियों को – वापस नहीं लाने की दशा में क्या वे अपने देश में सकुशल रह सकते थे ? हालांकि बाद में उनका अंत फौजी जनरल के कारण ही हुआ|

अंत में आज के दिन 31 अक्तूबर को सिर्फ सरदार पटेल को याद करने की मोदी सरकार की पहल अच्छी है परंतु इन्दिरा गांधी की आतंकवाद से लड़ाई में हुई शहादत की अनदेखी करना ना केवल उस व्यक्तित्व का अपमान है जिसे मोदी जी के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने “लोकसभा में बंगला देश की विजय के बाद दुर्गा कहा था।

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