nayaindia sat aur asat
गेस्ट कॉलम | लाइफ स्टाइल | धर्म कर्म| नया इंडिया| sat aur asat

सत और असत

India secular country

इस वास्तविक जगत में सब कुछ कारणयुक्त है, व्यक्त जगत में हम जो कुछ देखते हैं, उसका कारण है। कैसे बना ? उसका कारण है। खोजने से कारण मिल जाएंगे । परिणाम देखने के बाद मनुष्य जब कारण की तरफ चलने लगता है, तब चलते-चलते मूल कारण तक पहुंच जाता है। इसके बाद और कोई कारण नहीं पाता है, वह जहाँ पहुँच जाता है, वही है परमात्मा, परन्तु परमात्मा के साथ ही जीवात्मा अर्थात आत्मा और प्रकृति भी अविनाशी, अजर – अमर, अपरिणामी हैं।

व्यावहारिक जगत में लौकिक रूप अर्थात लौकिक भाव में सत् (सत) का अर्थ लिया जाता है अच्छा, सज्जन। आध्यात्मिक अर्थ है अपरिणामी, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। असत् (असत) परिणामी है अर्थात जिसमें परिवर्तन होता है। सत् (सत) वस्तु एक ही है और जितनी वस्तुएं है सब असत् (असत) हैं। असत वस्तु का अर्थ खराब नहीं, प्रत्युत्त परिवर्तनशील है। प्रकृति जहां क्रियाशील है वहां देश-काल-पात्रगत भेद है। किसी भी वस्तु में जब दैशिक, कालिक अथवा पात्रिक भेद आ जाता है, तब वह परिवर्तित हो जाती है। अर्थात पूर्व रूप नहीं रहती है।

इस वास्तविक जगत में सब कुछ कारणयुक्त है, व्यक्त जगत में हम जो कुछ देखते हैं, उसका कारण है। कैसे बना ? उसका कारण है। खोजने से कारण मिल जाएंगे । परिणाम देखने के बाद मनुष्य जब कारण की तरफ चलने लगता है, तब चलते-चलते मूल कारण तक पहुंच जाता है। इसके बाद और कोई कारण नहीं पाता है, वह जहाँ पहुँच जाता है, वही है परमात्मा, परन्तु परमात्मा के साथ ही जीवात्मा अर्थात आत्मा और प्रकृति भी अविनाशी, अजर – अमर, अपरिणामी हैं।

वैदिक ग्रंथों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि सत उन पदार्थों को कहा गया है ,जो अनादि तथा अजर (अमर) होते हैं। असत उनको कहते हैं जो जिस रूप में दिखाई देते हैं उस रूप में सदा नहीं रहते तथा नहीं रहें हों।

सत और असत का अन्तर स्पष्ट करते हुए श्रीमदभगवदगीता के अध्याय 2 श्लोक 16 में कहा है –

नासतो विद्यते भावों नाभावो विद्यते सतः ।

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ।।

–  श्रीमदभगवदगीता अध्याय 2, श्लोक 16

अर्थात – जो वस्तु असत (अनुपस्थित) था, उसका होना नहीं हो सकता और जो सत अर्थात उपस्थित है, उसका न होना नहीं हो सकता l ज्ञानी पुरुषों द्वारा इन दोनों को ही तत्व से देखा गया है l

उदाहरणतः लकड़ी का एक बैठने का स्टूल है। यह असत है। स्टूल को तोड़- फोडकर लकड़ी के टुकड़ों में विभाजित किया जा सकता है अथवा इसको चिर – फाडकर उसमें से चौकी बनायी जा सकती है। अतः स्टूल असत है। चौकी अथवा लकड़ी के टुकड़े भी तोड़े – फोड़े जा सकते हैं। लकड़ी को अग्नि में जलाकर राख किया जा सकता है। अतः लकड़ी के टुकड़े भी असत् हैं।

जब लकड़ी जला दी जाती है, तो वह कार्बनडाई ऑक्साईड में परिवर्तित हो अर्थात बदल जाती है। इस कारण लकड़ी भी असत है।

जल में से विद्युत की तरंगें गुजारे जाएँ तो जल दो प्रकार की वायुओं – ऑक्सीजन और हाइड्रोजन  में बदल जाता है। इसी प्रकार कार्बनडाई ऑक्साईड भी दो वायुओं – कार्बन और ऑक्साईड में बदल जाते हैं। अभिप्राय यह है कि जल तथा कार्बनडाई ऑक्साईड भी असत हैं। कार्बन के बहुत छोटे – छोटे कण होते हैं, जिन्हें परिमण्डल कहा जाता है। जिसे  आज के आंग्ल वैज्ञानिक भाषा में एटम कहते हैं । इसी प्रकार ऑक्सीजन के भी परिमण्डल होते हैं। ये परिमण्डल वस्तुतः कार्बन तथा ऑक्सीजन ही हैं । कारण यह कि उन्हीं के गुण वाले होते हैं, परन्तु इन परिमण्डलों का भी विखण्डन होता है। सब प्रकार  के परिमण्डल तीन प्रकार के कणों अर्थात पार्टिकल्स में बँट जाते हैं। उनको वैकारिक अहंकार (प्रोटोन्स), तैजस अहंकार (इलेक्ट्रोन्स) और भूतादि अहंकार (न्युट्रोन्स) कहते हैं।

इस प्रकार परिमण्डल भी असत है। ये कण भी टूट सकते हैं और फिर टूटकर परमाणु बन जाते है। सांख्य दर्शन में परमाणु साम्यावस्था में कहे गए हैं। यही प्रकृति कहलाती है।

सांख्य दर्शन में इसके स्वरुप का स्पष्ट वर्णन अंकित है। अतः इलेक्ट्रोन इत्यादि कण भी असत हैं, परन्तु परमाणु (अल्टीमेट पार्टिकल्स) का विखंडन नहीं हो सकता। इस कारण परमाणु सत हैं। वैदिक साहित्यों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि पदार्थों के परमाणु सत् हैं, वे नष्ट नहीं हो सकते। उनकी रूप – राशि स्थिर है। जब वे अकेले – अकेले होते हैं, तब भी और जब वे मिलकर अहंकार-परिमण्डल तथा संसार के भिन्न – भिन्न पदाढ़ बनाते हैं, तब भी वे (उनकी रूप-राशि) नहीं बदलती। वे भिन्न – भिन्न प्रकार के परिमण्डलों में भिन्न – भिन्न संख्या में भिन्न-भिन्न प्रकार से संयुक्त होकर संसार के सब पदार्थ बनाते हैं।

श्रीमदभगवदगीता के अगले ही श्लोक अध्याय 2 के ही श्लोक 17 में नाश रहित और अविनाशी अर्थात असत् का वर्णन करते हुए कहा है कि –

अविनाशी तु तद्विद्वि येन सर्वमिदं ततम्  ।

विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति। ।

-श्रीमदभगवदगीता अध्याय 2 श्लोक 17

अर्थात – नाशरहित उसको जानो जो जो यह सब जगत में उपस्थित (ओत – प्रोत) है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई समर्थ नहीं।

“इदं सर्वमिदं ततम्” का अर्थ है यह सब संसार।

यह परमाणु रूप प्रकृति पूर्ण संसार में व्याप्त है। यह सत है। इसी कारण इसे अविनाशी कहा है। इस अविनाशी (परमाणु रूप प्रकृति) का कोई नाश नहीं कर सकता। छान्दोग्योपनिषद 6-2-1 में कहा है –

सदेव सोम्येदमग्र आसदेकमेवाद्वितीयम् । तर्द्धक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयमतास्माद्सतः सज्जायत।

-छान्दोग्योपनिषद 6-2-1

अर्थात – हे सौम्य ! आरंभ में यह एकमात्र सत् ही था। उसके विषय में ऐसा भी कहा गया है कि आरम्भ में वह एकमात्र असत ही था। उस असत से सबकी उत्पत्ति हुई।

छान्दोग्योपनिषदकार कहता है कि सत से असत और असत से सत ऐसा कहा जाता है। कौन पहले और कौन बाद में, कुछ नहीं कहा जा सकता। जगत से परमाणु और परमाणु से पुनः जगत आदिकाल से यह क्रम चला आया है ।

संयोग-वियोग एक दूसरे के उपरान्त चलता रहता ही, परन्तु जो बात विशेष है वह यह कि किसी एक पदार्थ के परमाणु उस पदार्थ के टूटने के उपरान्त पुनः उसी प्रकार मिलेंगे, नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार बने पदार्थ असत हैं। गीता के कुछ भाष्यकार उपरोक्त मन्त्र में “इदं सर्वमिदं ततम्” का अर्थ यह सब संसार तो मानते हैं, परन्तु तद्विद्वि का अर्थ परमात्मा करते, लगाते हैं। वैदिक विद्वानों के अनुसार यह अशुद्ध है, क्योंकि यहाँ प्रकृति का वर्णन हो रहा है, परमात्मा का नहीं। उअर आत्मा का क्षेत्र यह शरीर है। शरीर से बाहर नहीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यहाँ सत – असत प्रकृति के दो रूपों का वर्णन हो रहा है। जो सत है वह सब स्थान पर है । यह प्रकृति का वह स्वरुप है जो नित्य है अर्थात परमाणु रूप है।

इसके आगे के श्लोक अर्थात श्रीमदभगवदगीता  अध्याय 2, श्लोक 18 में मनुष्य अथवा प्राणियों के शरीर को नाशवान अर्थात असत और शरीर में वास करने वाले जीवात्मा को नित्य कहा है –

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।

अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युद्यस्व भारत ।।

-श्रीमदभगवदगीता अध्याय 2 श्लोक 18

अर्थात – अप्रमेय तथा नित्य शरीरी (जीवात्मा) के ये शरीर नाश होने वाले कहे गए हैं।

इस श्लोक का अभिप्राय यह है कि जो शरीर है। वह असत है, शरीर का रूप नष्ट होता है। इसका वह स्वरुप जो मूलप्रकृति का है, नष्ट नहीं होता।  वह सदा बन रहता है। इसलिए हे भातृत ! युद्ध कर।  सत और असत का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को श्रीमदभगवद गीता के अध्याय दो में बताया है कि शरीर तो नष्ट होने वाला है तो फिर इसका नाश हो जाने से कुछ हानि नहीं होगी क्योंकि यह कभी नष्ट नहीं होता।

Tags :

Leave a comment

Your email address will not be published.

ten − seven =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
‘सुप्रीम’ के प्रति ‘सुप्रीम’ की नाराजी….!
‘सुप्रीम’ के प्रति ‘सुप्रीम’ की नाराजी….!