क्या धर्म निरपेक्ष सिद्धांत हिन्दूराष्ट्र के मार्ग की बाधा है...?
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क्या धर्म निरपेक्ष सिद्धांत हिन्दूराष्ट्र के मार्ग की बाधा है…?

भोपाल। क्या समय बदलने के साथ सिद्धांत भी बदल जाते है। देश की आजादी के बाद प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू द्वारा प्रतिपादित ‘पंचशील’ सिद्धांत अब देश के लिये उपयोगी नहीं रहे? आज के सत्तारूढ़ दल व उनके संघी साथियों की भाषा से तो ऐसा ही प्रतीत होता है? आजादी के बाद देश के हुए विभाजन को अब पचहत्तर साल बाद कोसने का क्या मतलब है? आज से पचहत्तर साल पूर्व की स्थिति परिस्थिति का अनुमान आज कोई भी कैसे लगा सकता है? और फिर इसके लिए किसी को भी दोषी ठहराने का आज क्या मतलब है?

किंतु आज यही हो रहा है, सत्तारूढ़ दल के मार्गदर्शक माने जाने वाले संगठन के प्रमुख इस विवाद के आज मुखिया बने हुए है और आए दिन अपने उद्गार व्यक्त करने में व्यस्त है। संघ प्रमुख का यह कहना है कि- ‘‘भारत का विभाजन कभी न मिटने वाली वेदना है।’’ कहां तक सही है? साथ ही वे विभाजन को निरस्त करने की भी मांग कर रहे है, क्या यह अब मौजूदा हालातों में संभव है? आखिर ऐसी अर्थहीन बातों में वक्त को खराब किया जा रहा है? जो चीज अब संभव नहीं, उसे करने को क्यों कहा जा रहा है?

भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने तत्कालीन साम्प्रदायिक परिस्थिति का आंकलन कर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के परामर्श पर भारत का विभाजन कर पाकिस्तान बनाने की अनुमति दी थी और उसके बाद धर्मांधता को खत्म करने की गरज से ‘पंचशील’ सिद्धांतों को लागू किया था, जिसका महत्वपूर्ण अंग ‘धर्म निरपेक्षता’ थी, अर्थात् आजाद भारत धर्म निरपेक्ष राष्ट्र रहेगा और इसमें सभी धर्माें का समान रूप से सम्मान भी किया जाएगा, अर्थात् इस देश में रहने वाले सभी धर्माें के लोगों को सभी तरह की धार्मिक स्वतंत्रता रहेगी, पिछले सात दशक तक इन्ही सिद्धांतों पर यह देश चला और सभी धर्मों व उनके अनुयायियों को समान रूप से रहने की आजादी भी दी गई।

तत्कालीन नेहरू विरोधियों ने भी इस पंचशील सिद्धांत का समर्थन सम्मान किया था, किंतु पिछले कुछ सालों में उन्हीं नेहरू विरोधियों की मौजूदा पीढ़ी ने सत्ता में आने के बाद न सिर्फ पंचशील सिद्धांतों को सरकारी दस्तावेजों व संविधान से हटाया बल्कि अब उसके प्रमुख सिद्धांत धर्म निरपेक्षता का खुलकर विरोध किया जा रहा है। यही नहीं संघ प्रमुख तो ठीक केन्द्रीय सूचना आयुक्त उदय माहूरकर धर्म निरपेक्षता के सिद्धांत को ‘मीठा जहर’ बता रहे है तथा इसे देश के लिए घातक बताते हुए इससे हुए कथित नुकसान का उल्लेख कर रहे है।

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इस माहौल की वास्तविकता यह है कि देश में जब मौजूदा सरकार का गठन हुआ, तब इसके प्रणेताओं ने ‘अखण्ड भारत’ या ‘हिन्दू राष्ट्र’ का चीर प्रतीक्षित सपना साकार होने की उम्मीद जगाई थी, अब चंूंकि इस सरकार के आठ साल पूरे होने को है, और इस दिशा में कोई सार्थक कदम उठता नजर नहीं आ रहा है, इसलिए इस विचार के प्रणेता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इस मुद्दें को जागृत करने का प्रयास किया है और इसीलिए संघ प्रमुख इस विषय पर काफी मुखर हो रहे है। इसीलिए अब यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि ‘क्या धर्म निरपेक्षता हिन्दू राष्ट्र या अखण्ड भारत के मार्ग की बाधा बना हुआ है?’ और इसी गरज से पचहत्तर साल पहले हुए भारत के विभाजन का मुद्दा उठाया जा रहा है और फिर से भारत को आजादी के पूर्व का स्वरूप देने की गरज से विभाजन के फैसले को रद्द करने की बैतूकी मांग भी उठाई जा रही है और अपने तर्क के समर्थन में कहा जा रहा है कि उस विभाजन से न तो भारत के हिन्दू खुश है और न पाकिस्तान के मुसलमान ही। अपने तर्क के समर्थन में यह भी कहा जा रहा है कि भारत के मुसलमान पाकिस्तान के मुसलमानों से ज्यादा खुश व आजाद है।

किंतु यहां सबसे अहम् सवाल यह है कि क्या ऐसा माहौल बनाने और इस तरह के कुतर्क प्रस्तुत करने से भारत का भला हो सकेगा? और क्या यह मामला भारत की मौजूदा समस्याओं या जनहित के सवालों से सबसे अहम् है? हिन्दू राष्ट्र बने इसमें किसी को भी कोई ऐतराज नही है किंतु साथ ही धर्म निरपेक्षता के सिद्धांत को भी ठीक से समझना जरूरी है क्योंकि यह देश हिन्दूस्तान होने के साथ आर्यावर्त या भारत वर्ष भी है, जहां सभी निवासियों को समानता का अधिकार प्राप्त है।

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