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लडखड़ाते पैर, प्यासी जुबान, नम आंखें और मासूम चेहरे..!

आत्मनिर्भरता के नारे को भी मजदूरों ने गंभीरता से लिया और निकल पडें विना किसी आस और सहारे के अपने परिवार के साथ पूरी घर की गृहस्थी लेकर अपने मंजिल की ओर। भूखे, प्यासे, नंगे पैर अपने बच्चों को गोद में लेकर चले मजदूरों का सहारा सिर्फ चिलचिलाती धूप और सितारों से भरा आसमान।

किसी की रेल की पटरी पर आराम करने की कोशिश में आई नींद की झपकी उसकी जिंदगी ले गई। कई को बसों का सहारा मिला पर कुछ दूर चलते हैं उनकी क्षणिक खुशी मातम में बदल गई।

इस एेतिहासिक विस्थापन के दौरान में हुई हृदयविदारक घटनाओं को शायद ही कोई याद रखें।  लेकिन सवाल यह है कि इस कठिन दौर में अगर देश में लोकसभा चुनाव या राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले होते तो क्या तब भी इन लोगों को आत्मनिर्भरता का नारा देकर मरने के लिए छोड़ दिया जाता ?

चुनाव के दौरान इनके वोट के लिए आधुनिक संसाधनो से इन्हें बुलाया जाता है, भोजन पानी एवं वापसी की भी व्यवस्था की जाती है। चुनावी रैलियों में इन्हें बसों से सभास्थल लाया जाता है लेकिन ये पूछपरख सिर्फ चुनावी दौर तक ही सीमित रहती है। देश के सारे राजनैतिक दल सिर्फ इस मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं, जहॉ देश की सबसे बड़ी और ताकतवर पार्टी ने सरकार के माध्यम से 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज का जुमला दिया वहीं विपक्ष ने भारी तादाद में बसों को राज्य की सीमा पर लाकर खड़ी कर दी, लेकिन दोनों का फायदा इन्हें नहीं मिला।

आरोप-प्रत्यारोप, बयानबाजी का दौर देश में चरम पर है। सभी दल अपनी राजनैतिक रोटियंा संेकना चाहते हैं लेकिन इन रोटियों पर न जाने कितने मजदूरों का खून-पसीना होगा ये तो समय ही बतायेगा। आत्मनिर्भरता की ऐसी भी परिभाषा होगी ऐसा किसी न सोचा होगा।

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