nayaindia Sharadiya Navratri 2022 पाप खत्म, इच्छी पूरी की अभीष्ट नवदुर्गा
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पाप खत्म, इच्छी पूरी की अभीष्ट नवदुर्गा

चैत्र, आषाढ़, आश्विन और पौष के शुक्ल पक्ष की नवरात्रि में  प्रतिपदा से नवमी तक अर्थात नौ दिन तक भगवती के नौ स्वरूपों का पूजन किया जाता है । शक्ति की अधिष्ठात्री देवी जगदम्बा की उपासना के पर्व नवरात्र के दिनों को तीन भागों में बांटा गया है- प्रथम तीन दिवस  में तमस को जीतने की आराधना, अगले तीन दिन रजस और आखिरी तीन दिन सत्व को जीतने की अर्चना के माने गए हैं। ऋतु परिवर्तन के द्योतक नवरात्र के पहले दिन ही अपनी सामर्थ्य के अनुसार नौ, सात, पांच अथवा तीन दिन पूजा करने व व्रत रखने का संकल्प लिया जाता है ।

पौराणिक मान्यतानुसार शक्ति की अधिष्ठात्री देवी भगवती दुर्गा अर्थात पार्वती के नौ (नव) रूपों को नौदुर्गा (नवदुर्गा) की संज्ञा से अभिहित किया गया है। नौदुर्गा को समस्त पापविनाशिनी कहा जाता है और इन सभी स्वरूपों के पृथक- पृथक वाहन व अस्त्र- शस्त्र व पूजन विधियाँ हैं, परन्तु सब एक माने गये है । देवी से सम्बन्धित दुर्गा सप्तशती ग्रन्थ के अंतर्गत देवी कवच स्तोत्र में नवदुर्गा के नाम निम्नांकित क्रम में अंकित हैं – शैलपुत्री, ब्रह्म चारिणी, चन्द्रघंटा, कूष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। पौराणिक ग्रन्थों में देवी दुर्गा के इन नौ स्वरूपों का पृथक- पृथक नाम, गुण , स्मरण, पूजन विधि, महिमा और इनसे सम्बद्ध कथाओं का विशद वर्णन अंकित प्राप्य हैं। इन स्वरूपों के आराधना- उपासना से प्राप्त होने वाली फलों का विशद चित्रण करते हुए इनकी पूजन की महता बताई गई है ।

चैत्र, आषाढ़, आश्विन और पौष के शुक्ल पक्ष की नवरात्रि में  प्रतिपदा से नवमी तक अर्थात नौ दिन तक भगवती के नौ स्वरूपों का पूजन किया जाता है । शक्ति की अधिष्ठात्री देवी जगदम्बा की उपासना के पर्व नवरात्र के दिनों को तीन भागों में बांटा गया है- प्रथम तीन दिवस  में तमस को जीतने की आराधना, अगले तीन दिन रजस और आखिरी तीन दिन सत्व को जीतने की अर्चना के माने गए हैं। ऋतु परिवर्तन के द्योतक नवरात्र के पहले दिन ही अपनी सामर्थ्य के अनुसार नौ, सात, पांच अथवा तीन दिन पूजा करने व व्रत रखने का संकल्प लिया जाता है । इस दौरान व्रती को एक समय भोजन व नियम-संयम युक्त दिनचर्या का पालन करना जरूरी माना गया है । यह व्रत आबाल-वृद्ध कोई भी कर सकता है । माँ दुर्गा के इक्यावन शक्तिपीठ माने गए हैं । जहाँ विशेष अर्चना की जाती है । कहीं -कहीं बावन शक्तिपीठों की बात भी आती है ।

पौराणिक मान्यता है कि भगवती दुर्गा की नौ दिनों तक उनकी नौ स्वरूपों की साधना से अनेक प्रकार के मनोरथ पूर्ण होकर भक्त को अंत में सर्व सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं और सिद्धिदात्री की कृपा से कठिन से कठिनतर कार्य क्षणमात्र में सम्पन्न हो जाते हैं। सर्व सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी का हिमाचल के नंदापर्वत पर प्रसिद्ध तीर्थ है। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आदि आठ सिद्धियां इस देवी की सत्य हृदय – मन से विधि -विधान से उपासना-आराधना करने से प्राप्त की जा सकती हैं। भगवान शिव ने भी इस देवी की कृपा से यह तमाम सिद्धियां प्राप्त कर अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए।

विधि-विधान से नौ दिन तक भगवती दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना करने से सभी मनोरथ पूर्ण हों अष्ट सिद्धियां व नौ निधियां प्राप्त होती हैं, तथा लौकिक और परलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। इसके लिए नवरात्र के पहले दिन घट स्थापन कर दुर्गा की प्रतिमा की स्थापना कर पूरे नौ दिन व्रत और दुर्गा सप्तशती का पाठ का विधान है। सम्पूर्ण नवरात्र काल में अखंड दीप जलाकर माता की स्तुति की जाती और उपवास रखा जाता है । नवरात्र के अंतिम दिन कन्याओं को भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा देकर व्रत का समापन किया जाता है। मान्यता है कि माता दुर्गा के चरणों में शरणागत होकर निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उपासना, नाम जप,स्मरण, ध्यान, पूजन इस संसार की असारता का बोध कराते हैं और अमृत पद की ओर ले जाते हैं।

पौराणिक ग्रन्थों में देवी के नौ स्वरूपों को विविध प्रकार से व्याख्यायित व परिभाषित कर उनकी महिमा मंडन की गई है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार भगवती दुर्गा के नौ स्वरूपों को विष्णु के दशावतार की भांति मानव विकास क्रम से संयुक्त कर भी परिभाषित किया गया है। मान्यतानुसार सम्पूर्ण जड़ पदार्थों को भगवती दुर्गा का प्रथम स्वरूप शैलपुत्री माना जाता है। मृदा, जल, वायु, अग्नि, आकाश सभी देवी के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री के प्रथम स्वरूप हैं। इनके पूजन का अर्थ सभी जड़ पदार्थ में परमात्मा को महसूस करना है। जड़ में ज्ञान का प्रस्फुरण, चेतना का संचार भगवती के द्वितीय स्वरूप ब्रह्मचारिणी का प्रादुर्भाव है। इस जड़- चेतन के संयोग को प्रत्येक अंकुरण में इसे देखा सकता है। जीव में वाणी रूप में भगवती का तृतीय स्वरूप चन्द्रघंटा प्रकट होती है जिसकी अंतिम परिणिति मनुष्य में बैखरी (वाणी) है। अंडे को धारण करने वाली, स्त्री और पुरुष की गर्भधारण, गर्भाधान शक्ति भगवती का चतुर्थ स्वरूप कुष्मांडा है, जिसे समस्त प्राणीमात्र में देखा जा सकता है।

पुत्रवती माता-पिता का स्वरूप भगवती का पंचम स्वरूप स्कन्दमाता है। प्रत्येक पुत्रवान माता-पिता स्कन्द माता के रूप हैं। भगवती का षष्ठम स्वरूप कात्यायनी के रूप में भगवती कन्या की माता-पिता हैं। भगवती के सप्तम स्वरूप कात्यायनी से सब जड़ चेतन मृत्यु को प्राप्त होते हैं ओर मृत्यु के समय सब प्राणियों को इस स्वरूप का अनुभव होता है। भगवती के इन सात स्वरूपों के दर्शन सबको प्रत्यक्ष सुलभ होते हैं परन्तु आठवां ओर नौवां स्वरूप सुलभ नहीं है। भगवती का आठवां स्वरूप महागौरी गौर वर्ण का है। यह ज्ञान अथवा बोध का प्रतीक है, जिसे जन्म जन्मांतर की साधना से पाया जा सकता है। इसे प्राप्त कर साधक परम सिद्ध हो जाता है। इसलिए इसे सिद्धिदात्री कहा है।

एक अन्य मत के अनुसार ब्रह्मा के दुर्गा कवच में वर्णित नवदुर्गा नौ विशिष्ट औषधियों में विराजमान हैं। वराह पुराण और  मार्कण्डेय पुराण आदि पौराणिक ग्रन्थों में देवी के नौ स्वरूपों को नौ औषधियों के रूप में परिभाषित करते हुए इनके गुणों का वृहद उल्लेख अंकित प्राप्य है। इन ग्रन्थों के अनुसार कई प्रकार के रोगों में काम आने वाली औषधि हरड़ हिमावती है, जो देवी के प्रथम शैलपुत्री का ही एक रूप है। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है। यह पथया, हरीतिका, अमृता, हेमवती, कायस्थ, चेतकी और श्रेयसी सात प्रकार की होती है। ब्रह्मचारिणी अर्थात ब्राह्मी आयु व याददाश्त बढ़ाकर, रक्तविकारों को दूर कर स्वर को मधुर बनाती है। इसलिए इसे सरस्वती भी कहा जाता है। चंद्रघंटा अर्थात चंदुसूर एक ऎसा पौधा है, जो धनिये के समान है। यह औषधि मोटापा दूर करने में अत्यंत लाभप्रद होने के कारण इसे चर्महंती भी कहते हैं।

कूष्मांडा अर्थात पेठा नामक औषधि से पेठा मिठाई बनती है। इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो रक्त विकार दूर कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिक रोगों में यह अमृत समान है। अलसी देवी स्कंदमाता औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त व कफ रोगों की नाशक औषधि है। देवी कात्यायनी को आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका व अम्बिका। इसके अलावा इन्हें मोइया भी कहते हैं। यह औषधि कफ, पित्त व गले के रोगों का नाश करती है। देवी कालरात्रि नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती हैं। यह सभी प्रकार के रोगों में लाभकारी और मन एवं मस्तिष्क के विकारों को दूर करने वाली औषधि है। महागौरी अर्थात तुलसी सात प्रकार की होती है- सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरूता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र। ये रक्त को साफ कर हृदय रोगों का नाश करती है। दुर्गा का नौवां रूप सिद्धिदात्री है जिसे नारायणी शतावरी कहते हैं। यह बल, बुद्धि एवं विवेक के लिए उपयोगी है।

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