शव-साधकों के दौर का महामृत्युंजय मंत्र

अपने सियासी आराध्यों के जुग-जुग जीने की दुआएं तो आराधक हमेशा से करते रहे होंगे, मगर मुझे नहीं लगता कि सियासी अनुचरों के भीतर नफ़रत का ऐसा पतनाला कभी भरभर गिरता रहा हो कि वे सोशल मीडिया पर ‘‘हाय-हाय-बुढ़िया-तू-मर-जा’’का हैशटैग चस्पा कर उस पर गरबा करते घूमें। आपका आप जानें, मगर इस बृहस्पतिवार ट्विटर पर महिषासुरों की यह लठैती देख कर अपने जनतंत्र की ताज़ा पतन-कहानी पर मेरा सिर तो शर्म से नीचे लटक गया।

लेकिन फिर मैं ने अपने को यह कह कर संबल बंधाने की कोशिश की कि नफ़रत की बुआई में माहिर व्यवस्थापकों ने जब 73 बरस पहले एक बूढ़े के सीने में तीन गोलियां उतार देने वाले पंजे उगाने का करतब कर दिखाया था तो उनके लिए कोई बुढ़िया तो चीज़ ही क्या है? जिन्हें बेइंतिहा घृणा के व्यवसाय का हुनर आता है, उनके लिए किसी बूढ़े की महात्माई और किसी बुढ़िया की तिल-तिल रीतती ज़िंदगी के भला क्या मायने? हुक़ूमत पर कब्ज़ा करने और फिर उसे अपने चंगुल में बनाए रखने के लिए, छल-प्रपंचों के हवस डूबे बिस्तर पर, जितने आसन हमने इन सात वर्षों में आकार लेते देखे हैं, क्या पहले कभी देखे थे?

सो, किसी बुढ़िया के मरने का उच्चाटन-मारण जाप करने वालों के प्रत्युत्तर में मैं उनके आराध्य के दीर्घजीवी होने का महामृत्युंजय पाठ करता हूं। किसी की बद्दुआओं से लोग सिधार रहे होते और किसी की दुआओं से वे विराज रहे होते तो फिर बात ही क्या थी? कलियुग में श्राप और आशीर्वाद के प्रतिफल भी, लगता है, उलट गए हैं। वरना रायसीना की पहाड़ियों पर उलटबांसी के इतने मटमैले बादल इस क़दर कैसे छाते? सियासी इल्ज़ामों के शब्दकोष में फूहड़ता-सने जितने नए शब्दों का प्रवेश इस दौर के असंस्कारी सत्ताधीशों की वज़ह से हुआ है, क्या वह आपको बेजोड़ नहीं लगता?

आज भले ही मार्गदर्षक मंडल के एक उम्रदराज़ सदस्य समेत सारे बरी हो गए हैं, मगर क्या इससे यह तथ्य धुल जाएगा कि हिंदू तन-मन और हिंदू जीवन में अतिवाद की शिराएं पिरोने के लिए 31 साल पहले रथ यात्रा किसने निकाली थी? तब रथी के चरणों में बैठा सारथी कौन था? उस रथ यात्रा के साए तले अहमदाबाद से ले कर बड़ौदा तक और हैदराबाद से ले कर जयपुर-जोधपुर तक भड़के 166 सांप्रदायिक दंगों को हम किसकी देन मानें? रथ यात्रा के बारह बरस बाद साबरमती नदी के किनारे तक पसरी घटनाओं को क्या आप ऐसे ही बिसरा सकते हैं? अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी से उठती हूक क्या आज भी आपको चैन से सोने देती है? क्या मोरजारी और चारोड़िया चौक की रुलाई आपकी नींद नहीं उड़ाती? क्या नारोड़ा-पाटिया की सामूहिक क़ब्र का दृश्य आप अगले जनम में भी भूल पाएंगे?

हुक़ूमत हासिल करने के लिए की गई इस अनवरत शव-साधना की पृष्ठभूमि में देखें तो आपको लगेगा कि कापालिक-मंडली का ‘हाय-हाय बुढ़िया तू मर जा’ गायन तो लोरी गाने जैसा है। यही क्या कम है कि वे सिर्फ़ हैशटैग गढ़ कर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। वरना उन्हें यह मामला सीधे अपने हाथ में ले लेने से भी कौन रोक लेगा? जब कोतवाली सैंया के कब्ज़े में हो तो रक्षिताओं की तो पांचों उंगलियां घी में होती हैं। ऐसे में ये उंगलियां क्या कोई स्वेटर बुनने के लिए हुआ करती हैं? ये उंगलियां तो बंदूक का घोड़ा दबाने को ललकती हैं। मौत की सौदागरी का ख़ून जब एक बार मुंह से लग जाता है तो रक्त-पिपासा बढ़ती जाती है, घटती नहीं। इसीलिए ये ज़ुबानें 73 साल से लपलपा रही हैं। इनकी बढ़ती लपलपाहट का ही नतीजा है कि भारतीय जनतंत्र आज ओंधे मुंह पड़ा है और हम में से कोई इस डर से उसे उठाने आगे नहीं आ रहा है कि बाद में कोतवाल साहब के सवालों से कैसे निज़ात मिलेगी और वह अदालत हम कहां से लाएंगे, जो खुल कर कह दे कि समय कोतवाल से बड़ा होता है?

दूर से देखने पर यह हैशटैग इतनी बड़ी घटना नहीं लगती है, जिस पर ऐसे झर-झर आंसू बहाए जाएं। मगर आप इसकी शव-परीक्षा करेंगे तो पाएंगे कि भारतीय राजनीति की शिराओं में जानबूझ कर टप-टप टपकाए जा रहे इस नुनखरे द्रव्य के पीछे की मंशा इतनी मासूम नहीं है। यह नए राजनीतिक व्याकरण के प्रति आपको अनुकूलन-प्रक्रिया में ढालने का तरीका है। जब धीरे-धीरे ऐसी करतूतों की अनदेखी करने की आदत आपको हो जाएगी तो कापालिकों का काम और आसान होता जाएगा। वे चाहते ही यह हैं कि एक दिन ऐसा आए कि उनके क़त्लों की चर्चा करना हम-आप बंद कर दें।

आपने महसूस किया या नहीं कि पिछले दस महीनों में आप शासकीय-प्रशासकीय आदेशों का पालन बिना मीन-मेख निकाले जितने अनुशासित-भाव से करने लगे हैं, पहले नहीं किया करते थे। पहले आप हर फ़रमान को मानने से पहले उसके गुण-दोष के बाट-तराजू लेकर बैठ जाया करते थे। मगर एक महामारी के बहाने आपकी परिस्थिति-अनुकूलता का स्तर हमारे हुक़्मरान वहां ले आए, जहां वे दशकों के हथकंडों से भी नहीं ला पाते। हमारे देशद्रोहीपन के इतने उपादान इकट्ठे कर दिए गए हैं कि अपनी देशभक्ति साबित करते रहना ही हमारा एकमात्र काम रह गया है। हमारा उठाया हर सवाल देशद्रोह के दायरे में आता है। हालत यह है कि आनन-फानन बाज़ार में लाए गए किसी टीके की गुणवत्ता और दाम के बारे में प्रश्न करना भी आपको काला पानी श्रेणी में डाल सकता है।

आपदा में भी अवसर तलाश लेने की यह कला सब नहीं जानते। इसलिए, जो जानते हैं, आप पर राज कर रहे हैं। वे तब तक आप पर राज करते रहेंगे, जब तक आप उन्हें आपदा में अवसर प्रदान करते रहेंगे। अब उन्हें अवसर पाते रहने के लिए आपदाएं गढ़ते रहने का काम भर करना है। वे आपदाएं उपजाने के सफल प्रयोग आप पर कर चुके हैं। वे अपने प्रयोग आधी रात करते हैं। आपने एक नहीं, कई-कई बार उनकी प्रयोगशाला में कृतंक परिवार की विनम्र प्रजाति की तरह अपनी भूमिका का निर्वाह पिछले कुछ साल में किया है। इसलिए अगर वे बार-बार अपने प्रयोगों का विस्तार कर रहे हैं तो अब आपके छाती पीटने से क्या हो जाएगा?

सो, मेरी बात मानिए। यह समय छोटी-से-छोटी बात पर बड़ी-से-बड़ी नज़र रखने का है। इसलिए कि जो बात छोटी दिखाई देती है, वह दरअसल आजकल इतनी छोटी होती नहीं है। हमारे हुक़्मरान इन दिनों ऐसे फ़राख़दिल लोग नहीं हैं, जिनकी बाहें सब के लिए एक-सी खुली हों। वे ऐसे लोग हैं, जिनके जीवन-दर्शन में असहमतियों के लिए कोई जगह नहीं है। उनका मानना है कि जो उनके साथ नहीं हैं, वे गद्दार हैं। और, गद्दारों की एक ही सज़ा होती है कि उन्हें चौराहे पर घसीट कर लाया जाए। आप के आसपास पड़ने वाले हर चौराहे पर उनका पहरा है। उस चौराहे पर भी, जहां आ कर पचास दिनों बाद वे ख़ुद खड़े होने की पेशकश कर रहे थे। चौराहों के इस चक्रव्यूह में अगर आपको नहीं फंसना है तो अनुकूलन की इस प्रयोगशाला से जल्दी बाहर आइए। स्वयं को प्रयोगों के हवाले करने से खुल कर इनकार करिए। प्रयोगों पर प्रश्नचिह्न लगाइए। प्रयोगों की चीरफाड़ कीजिए। प्रयोगों का दासत्व त्यागिए। अपने को अपने अनुकूल बनाइए, उनके नहीं। जिस दिन आप यह कर लेंगे, शव-साधकों से मुक्त हो जाएंगे। वरना कापालिकों का अट्टहास सुनते रहने को अभिशप्त रहेंगे। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक हैं।)

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